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बुद्धिमान गुलाम की चतुराई – अलिफ लैला
बहुत समय पहले, बगदाद शहर में एक धनी व्यापारी रहता था जिसका नाम अब्दुल रहमान था। उसके पास एक बुद्धिमान गुलाम था जिसका नाम हकीम था। हकीम न केवल बुद्धिमान था बल्कि उसमें अद्भुत चतुराई भी थी।
अब्दुल रहमान अपने गुलाम हकीम को बहुत कठोर काम करवाता था। सुबह से शाम तक हकीम को बाजार में सामान बेचना पड़ता, घर की सफाई करनी पड़ती और रात में भी मालिक की सेवा करनी पड़ती। लेकिन हकीम कभी शिकायत नहीं करता था क्योंकि वह जानता था कि धैर्य और बुद्धि से हर समस्या का समाधान मिलता है।
एक दिन शहर में एक बड़ा व्यापारी आया जो बहुत ही चालाक और धूर्त था। उसका नाम शैतान खान था। वह अब्दुल रहमान से मिला और बोला, “मैंने सुना है कि तुम्हारे पास एक बहुत बुद्धिमान गुलाम है। मैं उससे एक प्रतियोगिता करना चाहता हूं।”
अब्दुल रहमान ने पूछा, “कैसी प्रतियोगिता?”
शैतान खान ने कहा, “अगर तुम्हारा गुलाम मेरी तीन पहेलियों का जवाब दे दे, तो मैं तुम्हें सौ स्वर्ण मुद्राएं दूंगा। लेकिन अगर वह हार गया, तो तुम्हें मुझे अपना आधा धन देना होगा।”
लालची अब्दुल रहमान तुरंत राजी हो गया। उसने हकीम को बुलाया और कहा, “हकीम, तुम्हें इस प्रतियोगिता में जीतना ही होगा।”
हकीम ने विनम्रता से कहा, “जैसी आपकी इच्छा, मालिक।” लेकिन उसके मन में एक योजना बन रही थी।
अगले दिन प्रतियोगिता शुरू हुई। शैतान खान ने पहली पहेली पूछी: “वह क्या चीज है जो दिन में सोती है और रात में जागती है?”
हकीम ने तुरंत जवाब दिया, “तारे, क्योंकि वे दिन में दिखाई नहीं देते लेकिन रात में चमकते हैं।”
दूसरी पहेली थी: “वह कौन सा खजाना है जो बांटने से बढ़ता है?”
हकीम मुस्कराया और बोला, “ज्ञान, क्योंकि जितना बांटते हैं उतना ही बढ़ता जाता है।”
तीसरी और सबसे कठिन पहेली थी: “वह कौन सी चीज है जो राजा के पास भी है और भिखारी के पास भी, अमीर इसे फेंक देता है और गरीब इसे संभाल कर रखता है?”
हकीम ने थोड़ा सोचा और फिर बोला, “समय, महोदय। राजा हो या भिखारी, सबके पास चौबीस घंटे होते हैं। अमीर समय बर्बाद करता है और गरीब हर पल को कीमती समझता है।”
शैतान खान हैरान रह गया। उसे सौ स्वर्ण मुद्राएं देनी पड़ीं। लेकिन वह बहुत गुस्से में था। उसने अब्दुल रहमान से कहा, “तुम्हारा गुलाम बहुत चालाक है। मैं इसे खरीदना चाहता हूं।”
अब्दुल रहमान लालच में आकर बोला, “पांच सौ स्वर्ण मुद्राएं दो।”
हकीम का दिल टूट गया। वह समझ गया कि उसका मालिक उसे बेच देगा। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी।
जब शैतान खान पैसे लेकर आया, तो हकीम ने कहा, “मालिक, मैं आपसे एक अंतिम इच्छा पूरी करने की विनती करता हूं।”
“क्या?” अब्दुल रहमान ने पूछा।
हकीम ने कहा, “मुझे एक दिन का समय दीजिए। मैं आपके लिए एक ऐसा काम करूंगा जिससे आपको शैतान खान से कहीं ज्यादा फायदा होगा।”
अब्दुल रहमान राजी हो गया। हकीम रात भर जागकर एक योजना बनाता रहा।
अगली सुबह हकीम ने शहर के काजी के पास जाकर कहा, “महोदय, मैं आपको एक धोखाधड़ी की जानकारी देना चाहता हूं।”
हकीम ने काजी को बताया कि शैतान खान एक धोखेबाज है जो नकली स्वर्ण मुद्राएं बनाता है। उसने काजी को वे निशान भी बताए जिनसे नकली मुद्राएं पहचानी जा सकती हैं।
काजी ने तुरंत शैतान खान को गिरफ्तार करवा दिया। जांच में पता चला कि वास्तव में शैतान खान नकली मुद्राएं बनाता था। उसकी सारी संपत्ति जब्त कर ली गई।
काजी ने हकीम की बुद्धिमानी से प्रभावित होकर उसे दासता से मुक्ति दिलवाई और अब्दुल रहमान को आदेश दिया कि वह हकीम को आजाद कर दे।
हकीम को न केवल स्वतंत्रता मिली बल्कि काजी ने उसे अपना सलाहकार भी बनाया। चतुराई से जीत हासिल करने वाले हकीम ने अपनी बुद्धि का सदुपयोग करके न्याय की सेवा की।
अब्दुल रहमान को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने हकीम से माफी मांगी और कहा, “हकीम, मैंने तुम्हारी कद्र नहीं की। तुमने मुझे एक बड़े धोखे से बचाया है।”
हकीम ने कहा, “मालिक, मैंने केवल अपना कर्तव्य निभाया है। सच्चाई और न्याय की हमेशा जीत होती है।”
इस प्रकार बुद्धिमान गुलाम हकीम ने अपनी चतुराई और धैर्य से न केवल अपनी स्वतंत्रता पाई बल्कि समाज की भी सेवा की। उसकी कहानी आज भी लोगों को प्रेरणा देती है कि बुद्धि और सच्चाई के आगे कोई भी बुराई टिक नहीं सकती।
सीख: धैर्य, बुद्धि और सच्चाई के साथ हर कठिनाई को पार किया जा सकता है। चतुराई का उपयोग हमेशा भलाई के लिए करना चाहिए।
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