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बाल गंगाधर तिलक: स्वराज्य के महान योद्धा

बहुत समय पहले, जब हमारा भारत अंग्रेजों के शासन में था, तब महाराष्ट्र की धरती पर एक ऐसा वीर पैदा हुआ जिसने पूरे देश को जगाने का काम किया। उस महान व्यक्ति का नाम था बाल गंगाधर तिलक

23 जुलाई 1856 को रत्नागिरी जिले के चिखली गांव में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में तिलक जी का जन्म हुआ। उनके पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक एक स्कूल शिक्षक थे और माता पार्वतीबाई एक धार्मिक महिला थीं।

बचपन की कहानी

छोटे बाल बहुत ही तेज़ बुद्धि के थे। जब वे मात्र 5 साल के थे, तो उन्होंने अपने पिता से पूछा, “पिताजी, हमारे देश पर विदेशी लोग क्यों राज कर रहे हैं?”

पिता गंगाधर जी ने प्यार से समझाया, “बेटा, अंग्रेज़ हमसे बहुत चालाक हैं। वे हमें आपस में लड़ाकर हम पर राज कर रहे हैं।”

इस बात ने छोटे बाल के मन में गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने मन में ठान लिया कि बड़े होकर वे अपने देश को आज़ाद कराएंगे।

शिक्षा और संस्कार

तिलक जी की प्रारंभिक शिक्षा पुणे में हुई। वे गणित और संस्कृत में बहुत तेज़ थे। उन्होंने डेक्कन कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने अपने मित्रों के साथ मिलकर एक गुप्त समिति बनाई थी।

एक दिन कॉलेज में अंग्रेज़ प्रोफेसर ने कहा, “भारतीय लोग अशिक्षित और असभ्य हैं। अंग्रेज़ों ने ही उन्हें सभ्यता सिखाई है।”

यह सुनकर युवा तिलक का खून खौल उठा। उन्होंने तुरंत खड़े होकर कहा, “सर, यह गलत है! हमारे पास वेद, उपनिषद, और महान ग्रंथ हैं। हमारी सभ्यता हज़ारों साल पुरानी है।”

पत्रकारिता की शुरुआत

1881 में बाल गंगाधर तिलक ने अपने मित्रों के साथ मिलकर “केसरी” और “मराठा” नामक दो अखबार शुरू किए। केसरी मराठी में था और मराठा अंग्रेजी में।

इन अखबारों के माध्यम से तिलक जी ने लोगों को जगाने का काम शुरू किया। वे लिखते थे, “स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा!”

यह वाक्य इतना प्रसिद्ध हुआ कि पूरे देश में इसकी गूंज सुनाई देने लगी।

गणपति उत्सव और शिवाजी जयंती

तिलक जी बहुत चतुर थे। उन्होंने समझ लिया था कि अंग्रेज़ भारतीयों को एक साथ इकट्ठा नहीं होने देते। इसलिए उन्होंने एक अनोखा तरीका सोचा।

1893 में उन्होंने सार्वजनिक गणेश उत्सव शुरू किया। पहले गणेश जी की पूजा केवल घरों में होती थी, लेकिन तिलक जी ने इसे सामुदायिक बना दिया।

उन्होंने कहा, “आओ, हम सब मिलकर गणपति बप्पा की पूजा करें। इससे हमारी एकता बढ़ेगी।”

इसी तरह उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती भी मनानी शुरू की। इन उत्सवों के बहाने लोग इकट्ठे होते और देश की आज़ादी की बात करते।

जेल की सज़ा

अंग्रेज़ सरकार को तिलक जी की बढ़ती लोकप्रियता से डर लगने लगा। 1897 में प्लेग की बीमारी फैली तो अंग्रेज़ अफसरों ने बहुत सख्त नियम बनाए। तिलक जी ने अपने अखबार में इसका विरोध किया।

इसके लिए उन्हें 18 महीने की सज़ा हुई। जेल में भी वे पढ़ते-लिखते रहे। उन्होंने “गीता रहस्य” नामक प्रसिद्ध पुस्तक जेल में ही लिखी।

1908 में उन्हें फिर से गिरफ्तार किया गया और इस बार 6 साल की सज़ा हुई। उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) के मांडले जेल में भेज दिया गया।

मांडले जेल में

मांडले जेल में तिलक जी ने हिम्मत नहीं हारी। वे रोज़ाना योग करते, पुस्तकें पढ़ते और लिखते रहे। उन्होंने वहां “आर्कटिक होम इन वेदाज़” नामक पुस्तक लिखी।

जेल के एक अंग्रेज़ अफसर ने एक दिन पूछा, “तिलक, तुम इतनी सज़ा भुगतने के बाद भी अपने विचार नहीं बदलोगे?”

तिलक जी ने मुस्कराते हुए कहा, “सर, सच्चाई कभी नहीं बदलती। स्वराज्य हमारा अधिकार है और रहेगा।”

होम रूल लीग

1916 में जेल से छूटने के बाद तिलक जी ने होम रूल लीग की स्थापना की। इसका मतलब था कि भारत को अपना शासन चाहिए।

वे गांव-गांव जाकर लोगों से कहते, “भाइयों, हमें अपने देश में अपना राज चाहिए। हम अपने घर में मेहमान नहीं बन सकते।”

अंतिम दिन

1 अगस्त 1920 को इस महान स्वतंत्रता सेनानी ने अंतिम सांस ली। मरते समय उनके मुंह से निकले अंतिम शब्द थे, “स्वराज्य… स्वराज्य…”

उनकी मृत्यु पर पूरा देश रो पड़ा। लाखों लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए आए।

तिलक जी की शिक्षा

बाल गंगाधर तिलक ने हमें सिखाया कि:

1. एकता में शक्ति है: उन्होंने त्योहारों के माध्यम से लोगों को एक साथ लाया।

2. शिक्षा सबसे बड़ा हथियार है: उन्होंने पढ़ाई-लिखाई को बहुत महत्व दिया।

3. अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए: उन्होंने कभी अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाया।

4. धैर्य और साहस: जेल की सज़ा के बावजूद वे अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे।

5. देश प्रेम सबसे बड़ा धर्म है: उन्होंने अपना पूरा जीवन देश की सेवा में लगा दिया।

निष्कर्ष

बाल गंगाधर तिलक सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि एक महान शिक्षक, लेखक, और समाज सुधारक भी थे। उन्होंने भारतीयों में आत्मविश्वास जगाया और उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ना सिखाया।

आज भी जब हम “स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है” सुनते हैं, तो हमें तिलक जी की याद आती है। उन्होंने दिखाया कि अगर हम एक साथ मिलकर किसी काम को करने की ठान लें, तो कोई भी ताकत हमें रोक नहीं सकती।

हमें भी तिलक जी की तरह पढ़ाई में मन लगाना चाहिए, अपने देश से प्यार करना चाहिए, और हमेशा सच्चाई का साथ देना चाहिए। यही है बाल गंगाधर तिलक की सबसे बड़ी शिक्षा। समाज सुधारक और शिक्षा के महत्व को समझने के लिए हमें उनकी शिक्षाओं को अपनाना चाहिए।

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