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ब्राह्मण और तीन ठग – बुद्धिमान बकरी की कहानी

बहुत समय पहले की बात है, एक गांव में पंडित विद्यानंद नाम का एक सीधा-सादा ब्राह्मण रहता था। वह बहुत ही भोला और दयालु था। उसके पास एक सुंदर सफेद बकरी थी जिसका नाम कमला था। कमला बहुत ही बुद्धिमान और समझदार थी।

एक दिन पंडित जी को पास के गांव में यज्ञ करने जाना था। उन्होंने कमला को रस्सी से बांधा और उसे लेकर चल पड़े। रास्ते में तीन ठग मिले – चतुर, धूर्त और कपटी। उन्होंने देखा कि ब्राह्मण के पास एक मोटी-ताजी बकरी है।

चतुर ठग ने कहा, “देखो भाइयों, यह ब्राह्मण कितना भोला लगता है। क्यों न हम इसकी बकरी हथिया लें?”

धूर्त ठग बोला, “हां, लेकिन कैसे? यह तो बकरी को कसकर पकड़े हुए है।”

कपटी ठग ने योजना बताई, “सुनो, हम तीनों अलग-अलग जगह से आकर इस ब्राह्मण को भ्रम में डाल देंगे। मैं पहले जाऊंगा।”

कमला बकरी ने यह सब सुन लिया था। वह बहुत चतुर थी और समझ गई कि ये तीनों ठग हैं।

पहला ठग आगे जाकर पंडित जी से मिला और बोला, “अरे पंडित जी! आप इस कुत्ते को लेकर कहां जा रहे हैं?”

पंडित जी चौंके, “कुत्ता? यह तो बकरी है!”

ठग बोला, “अरे नहीं पंडित जी, यह तो साफ कुत्ता दिख रहा है। शायद आपकी आंखों में कोई समस्या है।” यह कहकर वह चला गया।

पंडित जी परेशान हो गए। तभी कमला ने मिमिया-मिमिया करके उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन पंडित जी समझ नहीं पाए।

थोड़ी देर बाद दूसरा ठग आया और बोला, “पंडित जी, आप इस गधे को लेकर कहां जा रहे हैं? यज्ञ में तो बकरी चाहिए होती है।”

अब पंडित जी और भी परेशान हो गए। उन्होंने सोचा, “पहले व्यक्ति ने कुत्ता कहा, अब यह गधा कह रहा है। कहीं मुझे कोई भ्रम तो नहीं हो रहा?”

तीसरा ठग आया और चिल्लाकर बोला, “अरे पंडित जी! आप इस सुअर को लेकर कहां जा रहे हैं? यह तो बहुत अशुभ है। जल्दी इसे छोड़ दीजिए, नहीं तो आप पर कोई विपत्ति आ जाएगी!”

अब पंडित जी पूरी तरह घबरा गए। उन्होंने सोचा कि तीन अलग-अलग लोगों ने तीन अलग-अलग जानवर बताए हैं। जरूर कोई जादू-टोना हुआ है।

डर के मारे पंडित जी ने कमला की रस्सी छोड़ दी और भागने लगे। लेकिन कमला बहुत चतुर थी। उसने तुरंत समझ लिया कि यह तीनों का षड्यंत्र है।

कमला ने जोर से चिल्लाकर कहा, “पंडित जी रुकिए! ये तीनों ठग हैं। इन्होंने आपको धोखा दिया है। मैं आपकी कमला हूं, वही बकरी जिसे आप रोज दूध देकर प्यार करते हैं।”

पंडित जी रुक गए और पीछे मुड़कर देखा। कमला ने फिर कहा, “देखिए पंडित जी, ये तीनों एक साथ छुपकर खड़े हैं। अगर ये सच्चे होते तो अलग-अलग रास्ते जाते।”

पंडित जी ने ध्यान से देखा तो वाकई तीनों ठग एक पेड़ के पीछे छुपे हुए थे और आपस में बात कर रहे थे। उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ।

पंडित जी ने कमला को गले लगाया और कहा, “माफ करना कमला, मैंने तुम पर भरोसा नहीं किया। तुम्हारी बुद्धि ने आज मुझे बड़े धोखे से बचाया है।”

तीनों ठग यह देखकर कि उनकी चाल फेल हो गई है, वहां से भाग गए।

पंडित जी और कमला खुशी-खुशी यज्ञ करने चले गए। उस दिन के बाद पंडित जी ने कभी भी बिना सोचे-समझे किसी की बात पर भरोसा नहीं किया।

कहानी की सीख:

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी भी अजनबियों की बातों में आकर अपने विवेक को नहीं खोना चाहिए। जब कई लोग एक ही बात कहते हैं तो भी हमें अपनी आंखों और बुद्धि पर भरोसा रखना चाहिए। साथ ही यह भी सीख मिलती है कि सच्चे मित्र हमेशा हमारी मदद करते हैं, चाहे वे कितने भी छोटे या मूक क्यों न हों।

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