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पृथु अवतार की कथा – धरती माता का उद्धार
बहुत समय पहले की बात है, जब धरती पर अन्याय और अधर्म का राज था। राजा वेन एक क्रूर और अत्याचारी शासक था। वह प्रजा पर अत्याचार करता था और धर्म का विरोध करता था। उसके कारण धरती माता बहुत दुखी थीं।
राजा वेन के अत्याचारों से तंग आकर ऋषि-मुनियों ने उसका वध कर दिया। परंतु राजा के मरने के बाद धरती पर और भी बड़ी समस्या आ गई। धरती माता ने अन्न उगाना बंद कर दिया था। वे अपने भीतर सभी अनाज, फल और औषधियां छुपा कर बैठ गईं।
प्रजा भूख से तड़पने लगी। बच्चे रोने लगे, माताएं परेशान हो गईं। चारों ओर हाहाकार मच गया। ऋषि-मुनि समझ गए कि बिना राजा के राज्य नहीं चल सकता।
तब महर्षि भृगु और अन्य ऋषियों ने मिलकर राजा वेन के मृत शरीर का मंथन किया। इस मंथन से एक तेजस्वी और धर्मपरायण राजकुमार का जन्म हुआ। यह राजकुमार और कोई नहीं, भगवान विष्णु के अंश पृथु थे।
जब पृथु का जन्म हुआ, तो उनके हाथ में धनुष के निशान थे। देवताओं ने आकाशवाणी की – “यह बालक पृथु नाम से प्रसिद्ध होगा और धरती का कल्याण करेगा।”
पृथु बड़े होकर एक महान राजा बने। उन्होंने देखा कि प्रजा भूख से मर रही है और धरती माता अन्न नहीं दे रहीं। उन्होंने धरती माता से विनती की – “हे माता! कृपया अन्न दीजिए, प्रजा भूखी मर रही है।”
परंतु धरती माता ने कहा – “हे राजन! मैं राजा वेन के अत्याचारों से इतनी दुखी हूं कि अब अन्न नहीं दूंगी। मैंने सब कुछ अपने भीतर छुपा लिया है।”
यह सुनकर पृथु को बहुत दुख हुआ। उन्होंने धरती माता को समझाने की कोशिश की, परंतु वे नहीं मानीं। तब पृथु ने अपना धनुष उठाया और कहा – “यदि आप स्वेच्छा से अन्न नहीं देंगी, तो मैं आपको बाण से बींध दूंगा।”
धरती माता डर गईं और गाय का रूप धारण करके भागने लगीं। पृथु ने उनका पीछा किया। जहां-जहां धरती माता भागीं, वहां-वहां पृथु ने अपने धनुष से बाण चलाए। इससे धरती के ऊंचे-नीचे हिस्से समतल होने लगे।
अंत में धरती माता थक गईं और पृथु के सामने आकर बोलीं – “हे राजन! मैं आपकी शक्ति और दृढ़ता देखकर प्रभावित हूं। आप सच में प्रजा के हितैषी हैं।”
पृथु ने कहा – “माता! मैं आपका पुत्र हूं। एक पुत्र का धर्म है कि वह माता की सेवा करे, परंतु माता का भी धर्म है कि वह संतानों का पालन करे। आप मेरी प्रजा को अन्न दीजिए।”
धरती माता पृथु की बात से प्रभावित हुईं और बोलीं – “पुत्र! मैं अन्न दूंगी, परंतु एक शर्त है। आपको मुझे समतल करना होगा और कृषि की व्यवस्था करनी होगी।”
पृथु ने खुशी से यह शर्त मान ली। उन्होंने अपनी शक्ति से पृथ्वी को समतल करना शुरू किया। जहां पहाड़ थे, वहां मैदान बनाए। जहां गड्ढे थे, वहां मिट्टी भरी। इस प्रकार धरती एक समान हो गई।
फिर पृथु ने कृषि का आरंभ किया। उन्होंने लोगों को सिखाया कि कैसे बीज बोना है, कैसे खेत तैयार करना है, और कैसे फसल उगानी है। धरती माता ने अपना वचन निभाया और भरपूर अन्न दिया।
पृथु ने केवल कृषि ही नहीं सिखाई, बल्कि व्यापार, शिल्प, और अन्य कलाओं का भी विकास किया। उन्होंने नगरों का निर्माण कराया और सड़कें बनवाईं। उनके राज्य में सभी सुखी और समृद्ध थे।
एक दिन देवराज इंद्र पृथु से मिलने आए। उन्होंने कहा – “हे राजन! आपने जो कार्य किया है, वह अद्भुत है। आपने धरती को न केवल समतल किया है, बल्कि उसे उपजाऊ भी बनाया है।”
पृथु ने विनम्रता से कहा – “हे देवराज! यह सब भगवान विष्णु की कृपा है। मैं तो केवल उनका एक साधन हूं।”
इंद्र ने प्रसन्न होकर पृथु को आशीर्वाद दिया – “आपका नाम युगों-युगों तक अमर रहेगा। धरती आपके नाम से ‘पृथ्वी’ कहलाएगी।”
सच में, आज भी हमारी धरती को ‘पृथ्वी’ कहा जाता है, जो महाराज पृथु के नाम पर है। पृथु अवतार की कथा हमें सिखाती है कि एक सच्चा राजा वही है जो प्रजा के कल्याण के लिए कठिन से कठिन कार्य करने को तैयार रहता है।
पृथु ने अपने जीवनकाल में अनेक यज्ञ किए और धर्म की स्थापना की। उन्होंने सभी वर्णों और आश्रमों के लिए उचित नियम बनाए। उनके राज्य में कोई भूखा नहीं सोता था और कोई दुखी नहीं था।
जब पृथु का समय पूरा हुआ, तो वे अपने दिव्य धाम चले गए। परंतु उनके द्वारा स्थापित व्यवस्था आज भी चलती है। कृषि, व्यापार, और नगर निर्माण की जो नींव उन्होंने रखी थी, वह आज भी हमारी सभ्यता का आधार है।
इस प्रकार पृथु अवतार की कथा समाप्त होती है। यह कहानी हमें सिखाती है कि धैर्य, दृढ़ता और प्रजा के प्रति प्रेम से कोई भी असंभव कार्य संभव हो सकता है। पृथु ने दिखाया कि एक आदर्श राजा कैसा होना चाहिए – जो प्रजा के कल्याण के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दे।











