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पवन देव का आशीर्वाद – हनुमान जी की जन्म कथा

बहुत समय पहले की बात है, जब देवताओं और राक्षसों के बीच युद्ध चलते रहते थे। उस समय किष्किंधा नगरी में एक वानर राजा रहता था जिसका नाम केसरी था। केसरी बहुत ही वीर और धर्मपरायण राजा था। उसकी पत्नी अंजना एक अप्सरा थी जो श्राप के कारण वानर रूप में जन्मी थी।

अंजना बहुत दुखी रहती थी क्योंकि उसकी कोई संतान नहीं थी। वह रोज भगवान शिव की पूजा करती और संतान की कामना करती। एक दिन उसने कठोर तपस्या करने का निश्चय किया।

“हे प्रभु! मुझे एक ऐसा पुत्र दीजिए जो धर्म की रक्षा करे और भक्तों का कल्याण करे,” अंजना ने प्रार्थना की।

अंजना की भक्ति देखकर भगवान शिव प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, “हे देवी! तुम्हारी तपस्या से मैं प्रसन्न हूं। तुम्हें एक महान पुत्र की प्राप्ति होगी, लेकिन इसके लिए तुम्हें पवन देव की कृपा की आवश्यकता होगी।”

उसी समय अयोध्या में राजा दशरथ पुत्रेष्टि यज्ञ कर रहे थे। यज्ञ की समाप्ति पर अग्निदेव ने एक दिव्य खीर का कटोरा दिया। जब यह खीर रानियों में बांटी जा रही थी, तो एक चील ने खीर का एक भाग उड़ा लिया।

पवन देव ने देखा कि यह दिव्य खीर अंजना की तपस्या के कारण उसके लिए निर्धारित है। उन्होंने अपनी शक्ति से उस खीर को अंजना के हाथों में पहुंचा दिया।

“हे माता अंजना! यह दिव्य प्रसाद तुम्हारी भक्ति का फल है। इसे ग्रहण करो,” पवन देव ने कहा।

अंजना ने श्रद्धा से वह प्रसाद ग्रहण किया। पवन देव का आशीर्वाद पाकर उसके गर्भ में एक दिव्य बालक का जन्म हुआ। यह बालक और कोई नहीं, हनुमान जी थे।

जन्म के समय ही हनुमान जी में अद्भुत शक्तियां थीं। पवन देव का आशीर्वाद उन्हें मिला था, इसलिए वे हवा की तरह तेज़ उड़ सकते थे। उनमें अपार बल था और वे आकाश में विचरण कर सकते थे।

एक दिन बालक हनुमान ने सूर्य को एक लाल फल समझकर उसे पकड़ने के लिए आकाश में उड़ान भरी। उनकी गति इतनी तेज़ थी कि सभी देवता चकित रह गए।

“यह बालक तो असाधारण है! इसमें पवन देव की सारी शक्तियां हैं,” इंद्र देव ने कहा।

जब हनुमान जी सूर्य के पास पहुंचे तो राहु भी सूर्य ग्रहण लगाने आया था। हनुमान जी ने राहु को भी पकड़ने की कोशिश की। डरकर राहु इंद्र के पास गया।

इंद्र ने अपना वज्र हनुमान जी पर फेंका। वज्र लगने से हनुमान जी की ठुड्डी (हनु) में चोट लगी और वे बेहोश होकर पृथ्वी पर गिर गए। इसीलिए उनका नाम हनुमान पड़ा।

अपने पुत्र को घायल देखकर पवन देव बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने अपनी गति रोक दी जिससे सारे संसार में हवा रुक गई। सभी प्राणी परेशान हो गए।

“जब तक मेरे पुत्र को न्याय नहीं मिलेगा, तब तक मैं अपनी गति नहीं चलाऊंगा,” पवन देव ने कहा।

सभी देवता ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने हनुमान जी को जीवित किया और सभी देवताओं ने उन्हें विभिन्न वरदान दिए।

पवन देव ने कहा, “मेरा पुत्र हमेशा निरोगी रहेगा और उसमें मेरी सारी शक्तियां होंगी।”

इंद्र ने वरदान दिया कि वज्र भी उन्हें हानि नहीं पहुंचा सकेगा। अग्निदेव ने कहा कि अग्नि उन्हें जला नहीं सकेगी। सूर्यदेव ने आशीर्वाद दिया कि वे महान विद्वान बनेंगे।

इस प्रकार पवन देव का आशीर्वाद पाकर हनुमान जी ने अनेक महान कार्य किए। उन्होंने श्री राम की सेवा की, लंका दहन किया, और संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी के प्राण बचाए।

आज भी जब भक्त संकट में होते हैं तो हनुमान जी पवन देव की गति से उनकी सहायता के लिए पहुंच जाते हैं। उनकी शक्ति का स्रोत उनके पिता पवन देव का दिया गया आशीर्वाद ही है।

शिक्षा: इस कथा से हमें सिखाया जाता है कि सच्ची भक्ति और तपस्या का फल अवश्य मिलता है। माता अंजना की भक्ति और पवन देव का आशीर्वाद मिलकर संसार को एक महान भक्त और वीर योद्धा मिला। हमें भी धैर्य रखकर अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

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