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महागौरी माता की अद्भुत कथा – शिव प्रेम की गाथा

बहुत समय पहले की बात है, जब पर्वतराज हिमालय के महल में एक अत्यंत सुंदर कन्या का जन्म हुआ। इस कन्या का नाम था पार्वती। पार्वती का रूप इतना मनमोहक था कि देवता भी उसकी सुंदरता की प्रशंसा करते थे।

पार्वती बचपन से ही भगवान शिव की परम भक्त थी। वह दिन-रात शिव जी का ध्यान करती और उनकी आराधना में लीन रहती। माता पार्वती का एक ही सपना था – भगवान शिव को अपना पति बनाना।

एक दिन नारद मुनि पार्वती के पास आए और बोले, “हे देवी! यदि आप सच में शिव जी को पति रूप में पाना चाहती हैं, तो आपको कठोर तपस्या करनी होगी।”

पार्वती ने तुरंत कहा, “मुनिवर! मैं किसी भी कष्ट को सहने के लिए तैयार हूं। बताइए मुझे क्या करना होगा?”

नारद जी ने समझाया कि उन्हें हिमालय की सबसे ऊंची चोटी पर जाकर घोर तपस्या करनी होगी। पार्वती ने अपने माता-पिता से आज्ञा ली और तपस्या के लिए निकल पड़ीं।

हिमालय की बर्फीली चोटी पर पहुंचकर पार्वती ने अपनी तपस्या शुरू की। वह दिन-रात शिव जी का जाप करती रहती। गर्मी हो या सर्दी, बारिश हो या तूफान, पार्वती अपनी तपस्या में लीन रहती।

हजारों वर्ष बीत गए। पार्वती की तपस्या इतनी कठोर थी कि उनका सुंदर गोरा रंग काला पड़ गया। उनके बाल बिखर गए और शरीर दुबला हो गया। लेकिन उनकी भक्ति में कोई कमी नहीं आई।

एक दिन भगवान शिव ने सोचा कि पार्वती की परीक्षा लेनी चाहिए। वह एक बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण करके पार्वती के पास आए।

बूढ़े ब्राह्मण ने कहा, “हे कन्या! तुम व्यर्थ में इतनी कठोर तपस्या कर रही हो। शिव तो एक अजीब देवता है। वह श्मशान में रहता है, सांप पहनता है, और भूत-प्रेतों के साथ नाचता है। तुम जैसी सुंदर कन्या के लिए कोई और अच्छा वर मिल सकता है।”

यह सुनकर पार्वती को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने कहा, “हे ब्राह्मण देव! आप शिव जी के बारे में ऐसा मत कहिए। वह सबसे महान हैं। मैं केवल उन्हीं को अपना पति बनाऊंगी, चाहे मुझे कितनी भी तपस्या करनी पड़े।”

पार्वती की इस दृढ़ता को देखकर भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए। वह अपने असली रूप में प्रकट हुए और बोले, “हे पार्वती! मैं तुम्हारी भक्ति और दृढ़ता से बहुत प्रभावित हूं। तुम्हारी तपस्या सफल हुई।”

लेकिन शिव जी ने देखा कि तपस्या के कारण पार्वती का रंग काला पड़ गया है। उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति से पार्वती के शरीर को गंगा जल से धोया। इस दिव्य स्नान के बाद पार्वती का रंग दूध की तरह सफेद और चमकदार हो गया।

इसी कारण उन्हें ‘महागौरी’ कहा जाने लगा। ‘महा’ का अर्थ है महान और ‘गौरी’ का अर्थ है गोरी या सफेद। महागौरी माता का रूप अत्यंत सुंदर और दिव्य था।

महागौरी माता सफेद वस्त्र पहनती हैं और सफेद कमल पर विराजमान रहती हैं। उनका वाहन सफेद बैल है। उनके हाथों में त्रिशूल और डमरू है। महागौरी माता की पूजा करने से सभी पाप धुल जाते हैं और मन शुद्ध हो जाता है।

भगवान शिव ने महागौरी से विवाह किया और वह शिवानी कहलाईं। उनका विवाह बहुत धूमधाम से हुआ। सभी देवता, ऋषि-मुनि और गंधर्व इस दिव्य विवाह में सम्मिलित हुए।

महागौरी माता की कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और दृढ़ संकल्प से कोई भी लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की और अंत में अपना मनचाहा वर पाया।

नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी माता की पूजा की जाती है। इस दिन भक्त सफेद वस्त्र पहनकर माता की आराधना करते हैं। महागौरी माता की कृपा से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और उनका जीवन खुशियों से भर जाता है।

महागौरी माता का यह संदेश है कि धैर्य, भक्ति और दृढ़ता के साथ किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता। जो व्यक्ति सच्चे मन से माता की आराधना करता है, माता उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।

इस प्रकार महागौरी माता की यह अद्भुत कथा समाप्त होती है, जो हमें भक्ति और समर्पण का महत्व सिखाती है।

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