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कैलाश पर्वत की महिमा – भगवान शिव का पवित्र धाम
बहुत समय पहले की बात है, जब पृथ्वी पर अनेक पर्वत थे, परंतु सभी में सबसे महान और पवित्र था कैलाश पर्वत। यह पर्वत केवल एक साधारण पहाड़ नहीं था, बल्कि स्वयं भगवान शिव का निवास स्थान था। कैलाश पर्वत की महिमा तीनों लोकों में प्रसिद्ध थी.
एक दिन देवर्षि नारद जी ब्रह्मलोक से पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए आए। वे विभिन्न तीर्थ स्थानों का दर्शन कर रहे थे। जब वे हिमालय की तराई में पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि एक विशाल और अद्भुत पर्वत आकाश को छू रहा था। इस पर्वत से एक दिव्य प्रकाश निकल रहा था.
नारद जी ने सोचा, “यह कौन सा पर्वत है जिसकी इतनी महिमा है?” वे उस पर्वत के पास गए और देखा कि वहाँ अनेक ऋषि-मुनि तपस्या कर रहे थे। पर्वत की चोटी पर एक अलौकिक तेज दिखाई दे रहा था.
तभी वहाँ महर्षि वशिष्ठ आए। नारद जी ने उनसे पूछा, “हे महर्षि! यह कौन सा पर्वत है जो इतना तेजस्वी और पवित्र लग रहा है?”
महर्षि वशिष्ठ ने मुस्कराते हुए कहा, “हे नारद! यह कैलाश पर्वत है। इसकी महिमा अपरंपार है। यह भगवान शिव का निवास स्थान है। यहाँ माता पार्वती के साथ भोलेनाथ निवास करते हैं।”
कैलाश पर्वत की महिमा सुनकर नारद जी बहुत प्रभावित हुए। वशिष्ठ जी ने आगे बताया, “यह पर्वत केवल पत्थर और बर्फ का नहीं है। यह शिव तत्व से भरपूर है। जो भी सच्चे मन से यहाँ आता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।”
नारद जी ने पूछा, “क्या मैं भगवान शिव के दर्शन कर सकता हूँ?” वशिष्ठ जी ने कहा, “अवश्य! परंतु पहले आपको कैलाश पर्वत की परिक्रमा करनी होगी और सच्चे भाव से भगवान शिव का स्मरण करना होगा।”
नारद जी ने कैलाश पर्वत की परिक्रमा शुरू की। जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते गए, उन्हें अनुभव हुआ कि यह पर्वत वास्तव में अलौकिक है। यहाँ की हवा में भी एक दिव्यता थी। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी शांत और प्रसन्न दिखाई दे रहे थे.
परिक्रमा के दौरान नारद जी ने देखा कि कैलाश पर्वत के चारों ओर चार पवित्र नदियां बह रही थीं। एक ऋषि ने बताया, “ये चारों नदियां भगवान शिव के चरणों से निकली हैं। इनका जल अमृत के समान पवित्र है।”
जब नारद जी ने परिक्रमा पूरी की, तो अचानक आकाश में मेघ गर्जना हुई। कैलाश पर्वत की महिमा से प्रभावित होकर स्वयं भगवान शिव प्रकट हुए। उनके साथ माता पार्वती, गणेश जी और कार्तिकेय भी थे.
भगवान शिव ने कहा, “हे नारद! तुमने सच्चे मन से मेरे धाम की परिक्रमा की है। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। कैलाश पर्वत केवल मेरा निवास स्थान नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड का केंद्र है।”
माता पार्वती ने कहा, “हे नारद! यह पर्वत तीनों लोकों को जोड़ता है। यहाँ से सभी दिशाओं में शुभता और कल्याण फैलता है।”
भगवान शिव ने आगे बताया, “जो भी व्यक्ति कैलाश पर्वत का स्मरण करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं। यह पर्वत योग और तपस्या का केंद्र है। यहाँ अनेक सिद्ध पुरुष निवास करते हैं।”
नारद जी ने पूछा, “हे प्रभु! क्या यह पर्वत सदैव इसी प्रकार रहेगा?” भगवान शिव ने मुस्कराते हुए कहा, “हाँ नारद! जब तक सृष्टि है, तब तक कैलाश पर्वत की महिमा बनी रहेगी। यह अविनाशी है।”
तभी गणेश जी ने कहा, “पिताजी! क्या आप नारद जी को कैलाश पर्वत का रहस्य भी बताएंगे?” भगवान शिव ने कहा, “अवश्य! हे नारद! यह पर्वत वास्तव में एक विशाल शिवलिंग है। इसकी आकृति शिवलिंग के समान है।”
कैलाश पर्वत की महिमा सुनकर नारद जी अभिभूत हो गए। उन्होंने कहा, “हे भगवन्! मैं इस महिमा को तीनों लोकों में फैलाऊंगा ताकि सभी को इसका लाभ मिल सके।”
भगवान शिव ने आशीर्वाद देते हुए कहा, “तथास्तु! जो भी व्यक्ति कैलाश पर्वत की महिमा सुनेगा या इसका स्मरण करेगा, उसे मेरी कृपा प्राप्त होगी।”
इसके बाद भगवान शिव अपने परिवार के साथ अंतर्धान हो गए। नारद जी ने तीनों लोकों में जाकर कैलाश पर्वत की महिमा का प्रचार किया। तब से लेकर आज तक यह पवित्र पर्वत भक्तों के लिए सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है.
इस प्रकार कैलाश पर्वत की महिमा सदैव अक्षुण्ण रही है। यह पर्वत आज भी भक्तों को शांति, सुख और मोक्ष प्रदान करता है। जो भी सच्चे मन से इसका स्मरण करता है, भगवान शिव उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।








