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हातिम ताई और बूढ़े व्यक्ति की मदद
बहुत समय पहले की बात है, जब अरब की धरती पर हातिम ताई नाम का एक महान योद्धा रहता था। वह अपनी दानवीरता और दयालुता के लिए पूरे संसार में प्रसिद्ध था। हातिम ताई का हृदय सोने से भी कीमती था और वह हमेशा जरूरतमंदों की सहायता करने के लिए तैयार रहता था।
एक दिन हातिम ताई अपने घोड़े पर सवार होकर रेगिस्तान के बीच से गुजर रहा था। तेज धूप में रेत चमक रही थी और हवा में गर्मी की लहरें दिखाई दे रही थीं। अचानक उसे दूर से एक बूढ़े व्यक्ति की आवाज सुनाई दी।
“बेटा, कोई है जो इस बूढ़े की मदद कर सके?” वह कमजोर आवाज में पुकार रहा था।
हातिम ताई तुरंत अपने घोड़े को उस दिशा में मोड़ दिया जहाँ से आवाज आ रही थी। वहाँ उसने देखा कि एक बहुत बूढ़ा व्यक्ति एक पेड़ की छाया में बैठा हुआ था। उसके कपड़े फटे हुए थे और चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी।
हातिम ताई घोड़े से उतरकर बूढ़े व्यक्ति के पास गया और सम्मान से बोला, “दादाजी, आप यहाँ अकेले क्यों बैठे हैं? क्या मैं आपकी कोई सेवा कर सकता हूँ?”
बूढ़े व्यक्ति ने आँखें उठाकर हातिम ताई को देखा और कहा, “बेटा, मैं तीन दिन से भूखा हूँ। मेरे पास न तो खाने को कुछ है और न ही पानी। मैं अपने गाँव जाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन रास्ता भटक गया।”
यह सुनकर हातिम ताई का दिल दुख से भर गया। उसने तुरंत अपने थैले से खजूर, रोटी और पानी निकालकर बूढ़े व्यक्ति को दिया। “दादाजी, पहले आप कुछ खा-पी लीजिए। फिर मैं आपको आपके गाँव तक पहुँचा दूंगा।”
बूढ़े व्यक्ति की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने हातिम ताई के हाथों को चूमा और कहा, “भगवान तुम्हारा भला करे, बेटा। तुम सच में एक देवदूत हो।”
जब बूढ़े व्यक्ति ने खाना खाया और पानी पिया, तो उसमें थोड़ी शक्ति आई। हातिम ताई ने उसे अपने घोड़े पर बिठाया और पूछा कि उसका गाँव कहाँ है।
बूढ़े व्यक्ति ने बताया कि उसका गाँव यहाँ से बहुत दूर है और रास्ता भी कठिन है। लेकिन हातिम ताई ने कहा, “चिंता न करें दादाजी, मैं आपको सुरक्षित आपके घर पहुँचा दूंगा।”
पूरे दिन हातिम ताई ने बूढ़े व्यक्ति के साथ यात्रा की। रास्ते में जब भी बूढ़े व्यक्ति को प्यास लगती या वह थक जाता, हातिम ताई रुक जाता और उसकी देखभाल करता। वह बार-बार पूछता रहता कि कहीं उसे कोई तकलीफ तो नहीं हो रही।
शाम होते-होते वे बूढ़े व्यक्ति के गाँव पहुँच गए। गाँव के लोग बूढ़े व्यक्ति को देखकर बहुत खुश हुए क्योंकि वे उसकी तलाश में परेशान थे।
बूढ़े व्यक्ति ने सबको बताया कि कैसे हातिम ताई ने उसकी जान बचाई और उसे घर तक पहुँचाया। गाँव के सभी लोग हातिम ताई की प्रशंसा करने लगे।
गाँव के मुखिया ने हातिम ताई से कहा, “आपने हमारे बुजुर्ग की जान बचाई है। हम आपका कैसे धन्यवाद करें?”
हातिम ताई ने मुस्कराते हुए कहा, “मुझे किसी धन्यवाद की जरूरत नहीं। बुजुर्गों की सेवा करना हमारा धर्म है। यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि मैं इस महान व्यक्ति की सहायता कर सका।”
बूढ़े व्यक्ति ने हातिम ताई के हाथ पकड़े और कहा, “बेटा, तुमने मुझ पर जो दया दिखाई है, वह भगवान जरूर तुम्हें वापस देगा। तुम्हारी दानवीरता और दयालुता सदा याद रखी जाएगी।”
हातिम ताई ने बूढ़े व्यक्ति से विदा ली और अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गया। रास्ते में वह सोच रहा था कि आज उसने जो किया, वह कोई बड़ी बात नहीं थी। यह तो हर इंसान का कर्तव्य है कि वह जरूरतमंदों की मदद करे।
कुछ दिन बाद हातिम ताई को पता चला कि वह बूढ़े व्यक्ति कोई साधारण व्यक्ति नहीं था। वह एक महान संत था जो अपनी शक्तियों को छुपाकर लोगों की परीक्षा लेता रहता था। उसने हातिम ताई की दयालुता देखकर उसे आशीर्वाद दिया था।
उस दिन के बाद से हातिम ताई की ख्याति और भी बढ़ गई। लोग कहते थे कि जो व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद करता है, भगवान उसकी हमेशा रक्षा करता है।
हातिम ताई और बूढ़े व्यक्ति की मदद की यह कहानी आज भी लोगों को सिखाती है कि दया और सेवा ही सच्चा धर्म है। हमें हमेशा बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए और जरूरतमंदों की सहायता करनी चाहिए। इस तरह की अन्य कहानियाँ भी पढ़ें।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची महानता धन-दौलत में नहीं, बल्कि दूसरों की सेवा में है। जो व्यक्ति निस्वार्थ भाव से दूसरों की मदद करता है, वही सच्चा इंसान है।











