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गोपियों के वस्त्र चुराना – कृष्ण की लीला

बहुत समय पहले की बात है, जब भगवान श्रीकृष्ण वृंदावन में अपनी बाल लीलाओं से सभी को मुग्ध कर रहे थे। उस समय कार्तिक मास का पावन महीना था और गोकुल की गोपियां कात्यायनी देवी का व्रत रख रही थीं।

प्रतिदिन प्रातःकाल, जब सूर्य देव अपनी स्वर्णिम किरणों से धरती को जगाते थे, तब गोपियां यमुना नदी के तट पर स्नान करने जाती थीं। वे सभी मिलकर देवी कात्यायनी से प्रार्थना करती थीं कि उन्हें श्रीकृष्ण जैसा पति मिले।

“हे माता कात्यायनी! हमें ऐसा वर दो कि हमारा पति कन्हैया जैसा हो,” गोपियां मन ही मन प्रार्थना करती थीं।

एक दिन की बात है, जब गोपियां अपने नियमित स्नान के लिए यमुना तट पर पहुंचीं। उन्होंने अपने सुंदर वस्त्र नदी के किनारे रखे और पवित्र जल में स्नान करने लगीं। वे सभी आनंद से गा रही थीं और खेल रही थीं।

उसी समय, नटखट कन्हैया अपने सखाओं के साथ उधर से गुजर रहे थे। जब उन्होंने गोपियों को स्नान करते देखा, तो उनके मन में एक शरारत सूझी।

“सखा! देखो, गोपियां कितने प्रेम से माता कात्यायनी का व्रत कर रही हैं,” कृष्ण ने मुस्कराते हुए कहा। “आज हम उनकी परीक्षा लेंगे।”

चुपके-चुपके, कृष्ण और उनके सखा नदी के किनारे पहुंचे जहां गोपियों के सुंदर वस्त्र रखे थे। गोपियों के वस्त्र चुराना – यह कृष्ण की एक दिव्य लीला थी जो आने वाली पीढ़ियों तक याद रखी जाएगी।

कृष्ण ने धीरे से सभी वस्त्र उठाए और पास के कदंब वृक्ष पर चढ़ गए। वहां से वे गोपियों को देखने लगे और मुस्कराने लगे।

जब गोपियों ने स्नान पूरा किया और वापस आईं, तो वे अपने वस्त्र नहीं मिले। वे सभी घबरा गईं और इधर-उधर देखने लगीं।

“अरे! हमारे वस्त्र कहां गए?” एक गोपी ने चिंता से कहा।

“कोई शरारती लड़का होगा जिसने हमारे कपड़े छुपाए हैं,” दूसरी गोपी ने कहा।

तभी उन्होंने कदंब वृक्ष पर कृष्ण को बैठे देखा। उनके हाथों में सभी गोपियों के वस्त्र थे।

“कन्हैया! तुमने हमारे वस्त्र क्यों चुराए हैं? जल्दी वापस करो!” गोपियों ने पानी में खड़े होकर कहा।

कृष्ण ने हंसते हुए उत्तर दिया, “प्रिय गोपियों! यदि तुम सच में कात्यायनी माता का व्रत कर रही हो, तो तुम्हें किसी बात का भय नहीं होना चाहिए। पानी से बाहर आकर अपने वस्त्र ले जाओ।”

गोपियां बहुत लज्जा में थीं। वे समझ गईं कि यह कोई साधारण बालक नहीं है। उनके हृदय में एक अजीब सा प्रेम और श्रद्धा का भाव जाग रहा था।

“हे नटखट! हम कैसे पानी से बाहर आएं? तुम वहां से हट जाओ,” गोपियों ने निवेदन किया।

कृष्ण ने मुस्कराते हुए कहा, “नहीं प्रिय सखियों! तुमने जो व्रत रखा है, उसकी यह परीक्षा है। निर्भय होकर आओ और अपने वस्त्र ले जाओ। मैं तुम्हारा मित्र हूं, शत्रु नहीं।”

गोपियों ने आपस में सलाह की। वे समझ गईं कि यह कोई सामान्य बालक नहीं है। उनके मन में कृष्ण के प्रति अगाध प्रेम उमड़ रहा था।

अंततः, गोपियों ने हिम्मत जुटाई और एक-एक करके पानी से बाहर आकर अपने वस्त्र लिए। कृष्ण ने प्रेम से सभी को उनके वस्त्र वापस किए।

“तुम सभी का व्रत सफल हुआ,” कृष्ण ने मुस्कराते हुए कहा। “तुम्हारी भक्ति और प्रेम देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूं।”

उस दिन के बाद से, गोपियों के वस्त्र चुराना की यह लीला वृंदावन में प्रसिद्ध हो गई। यह घटना केवल एक शरारत नहीं थी, बल्कि भगवान कृष्ण का अपनी भक्तों के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने का तरीका था।

गोपियां समझ गईं कि कृष्ण कोई साधारण बालक नहीं हैं। वे स्वयं भगवान हैं जो उनकी भक्ति की परीक्षा ले रहे थे। उस दिन से गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम और भी गहरा हो गया।

यह लीला हमें सिखाती है कि भगवान अपने भक्तों की परीक्षा लेते हैं, लेकिन वे हमेशा उनका कल्याण ही चाहते हैं। निर्भयता, विश्वास और सच्ची भक्ति ही भगवान को प्रसन्न करती है।

आज भी जब भक्तजन इस कथा को सुनते हैं, तो उनके मन में कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम जाग उठता है। यह लीला दिखाती है कि भगवान कृष्ण अपने भक्तों के कितने करीब हैं और कैसे वे उनकी हर छोटी-बड़ी बात का ध्यान रखते हैं। यह कथा हमें यह भी सिखाती है कि भक्ति में सच्चाई और प्रेम होना चाहिए।

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