Summarize this Article with:

अकबर बीरबल और लाल मोर की कहानी
बादशाह अकबर के दरबार में एक दिन एक अजीब सी बात हुई। दरबार में सभी दरबारी अपनी-अपनी जगह बैठे हुए थे। अचानक एक व्यापारी दरबार में आया और बोला, “जहांपनाह, मैं आपके लिए एक अनमोल तोहफा लाया हूं।”
बादशाह अकबर ने उत्सुकता से पूछा, “क्या है वह तोहफा?”
व्यापारी ने कहा, “हुजूर, मैं आपके लिए एक लाल मोर लाया हूं। यह संसार में केवल एक ही है और इसकी सुंदरता देखते ही बनती है।”
यह सुनकर सभी दरबारी हैरान हो गए। सभी ने कहा, “लाल मोर? ऐसा कैसे हो सकता है? मोर तो हमेशा नीले और हरे रंग के होते हैं।”
व्यापारी मुस्कराया और बोला, “महाराज, यह कोई साधारण मोर नहीं है। यह जादुई लाल मोर है जो केवल सच्चे और बुद्धिमान व्यक्ति को ही दिखाई देता है।”
बादशाह अकबर बहुत खुश हुए और बोले, “जल्दी लाओ उस लाल मोर को। हम उसे देखना चाहते हैं।”
व्यापारी ने एक सुंदर पिंजरा सामने रखा। पिंजरा सोने से बना था और उसमें कीमती रत्न जड़े हुए थे। लेकिन पिंजरे के अंदर कुछ भी नजर नहीं आ रहा था।
व्यापारी ने कहा, “देखिए महाराज, कितना सुंदर लाल मोर है! इसके पंख कितने चमकदार हैं!”
बादशाह अकबर ने ध्यान से देखा लेकिन उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दिया। वे सोचने लगे कि कहीं वे बुद्धिमान नहीं हैं इसलिए उन्हें लाल मोर दिखाई नहीं दे रहा।
डर के मारे बादशाह ने कहा, “हां हां, बहुत सुंदर है यह लाल मोर। इसके लाल पंख कितने चमकदार हैं!”
यह देखकर सभी दरबारी भी डर गए कि कहीं बादशाह उन्हें मूर्ख न समझ लें। सभी ने कहा, “वाह महाराज! कितना अद्भुत लाल मोर है! हमने कभी इतना सुंदर मोर नहीं देखा।”
केवल बीरबल चुप बैठे थे और मुस्कराते रहे। व्यापारी ने कहा, “महाराज, यह लाल मोर बहुत कीमती है। इसकी कीमत एक लाख स्वर्ण मुद्राएं हैं।”
बादशाह अकबर तुरंत तैयार हो गए। उन्होंने कहा, “ठीक है, हम यह लाल मोर खरीद लेते हैं।”
तभी बीरबल खड़े हुए और बोले, “महाराज, क्या मैं इस लाल मोर को पास से देख सकता हूं?”
व्यापारी घबरा गया लेकिन बोला, “हां हां, जरूर देखिए।”
बीरबल ने पिंजरे के पास जाकर कहा, “महाराज, यह लाल मोर तो बहुत ही अनोखा है। यह इतना जादुई है कि यह अदृश्य भी हो सकता है।”
व्यापारी खुश होकर बोला, “बिल्कुल सही कहा आपने! यह लाल मोर अदृश्य हो सकता है।”
बीरबल मुस्कराए और बोले, “तो फिर महाराज, मैं इस अदृश्य लाल मोर के लिए अदृश्य स्वर्ण मुद्राएं दे देता हूं।”
यह सुनकर व्यापारी का चेहरा उतर गया। उसे समझ आ गया कि बीरबल उसकी चाल समझ गए हैं।
बीरबल ने आगे कहा, “महाराज, जैसे यह लाल मोर अदृश्य है, वैसे ही मेरी स्वर्ण मुद्राएं भी अदृश्य हैं। दोनों एक समान हैं।”
अब सभी दरबारियों को सच्चाई समझ आ गई। व्यापारी ने अपनी गलती मान ली और माफी मांगी।
बादशाह अकबर ने व्यापारी को माफ कर दिया लेकिन उसे चेतावनी दी कि वह फिर कभी किसी को धोखा न दे।
बादशाह ने बीरबल से पूछा, “बीरबल, तुम्हें कैसे पता चला कि यह लाल मोर नकली है?”
बीरबल ने जवाब दिया, “महाराज, सच्चाई यह है कि प्रकृति में लाल मोर होते ही नहीं हैं। मोर हमेशा नीले और हरे रंग के होते हैं। यह व्यापारी हमारे डर का फायदा उठाना चाहता था।”
“जब हमें लगता है कि कोई हमें मूर्ख समझेगा तो हम सच बोलने से डरते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि सच बोलना ही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।”
बादशाह अकबर को बीरबल की बात समझ आ गई। उन्होंने कहा, “बीरबल, तुमने आज हमें एक महत्वपूर्ण सबक सिखाया है। हमें कभी भी सच बोलने से नहीं डरना चाहिए।”
इस तरह बीरबल ने अपनी बुद्धिमानी से न केवल बादशाह को धोखे से बचाया बल्कि सभी को यह सिखाया कि सच्चाई ही सबसे बड़ी शक्ति है। चाहे कोई भी परिस्थिति हो, हमें हमेशा सच का साथ देना चाहिए।
आप बीरबल की अन्य कहानियाँ भी पढ़ सकते हैं जैसे समझदार बंदर की कहानी और व्यापारी का उदय और पतन।










