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सबसे ज्यादा प्रेम में अंधा कौन था? – बेताल पच्चीसी – इक्कीसवीं कहानी
राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लादे हुए घने जंगल से गुजर रहे थे। रात का समय था और चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। अचानक बेताल ने अपनी कर्कश आवाज में कहा, “राजन्! आज मैं तुम्हें एक ऐसी कहानी सुनाता हूँ जो प्रेम की शक्ति और अंधेपन के बारे में है।”
विक्रम चुपचाप सुनने लगे। बेताल ने कहानी शुरू की:
“कई वर्ष पहले मगध देश में राजा चंद्रगुप्त का शासन था। उनकी राजधानी में तीन मित्र रहते थे – ब्राह्मण पुत्र देवदत्त, क्षत्रिय पुत्र वीरसेन और वैश्य पुत्र धनपाल। तीनों बचपन से ही घनिष्ठ मित्र थे।”
एक दिन तीनों मित्र नगर के बाहर घूमने निकले। वहाँ उन्होंने एक अत्यंत सुंदर कन्या को देखा। उसका नाम सुंदरी था और वह एक धनी सेठ की पुत्री थी। उसकी सुंदरता देखकर तीनों के होश उड़ गए।
देवदत्त ने कहा, “मित्रों, मैंने इससे सुंदर कन्या कभी नहीं देखी। मैं इससे विवाह करूंगा।”
वीरसेन बोला, “नहीं देवदत्त! यह कन्या मेरी होगी। मैं इसके लिए अपना जीवन भी दे सकता हूँ।”
धनपाल ने कहा, “तुम दोनों गलत कह रहे हो। यह कन्या केवल मेरी है। मैं इसके बिना जी नहीं सकता।”
तीनों में विवाद हो गया। प्रेम के कारण उनकी मित्रता में दरार आ गई। वे सुंदरी के प्रेम में इतने अंधे हो गए कि अपनी मित्रता भूल गए।
देवदत्त ने सोचा कि वह अपनी विद्या से सुंदरी को प्रभावित करेगा। वह दिन-रात शास्त्रों का अध्ययन करने लगा और कई नई विद्याएँ सीखीं।
वीरसेन ने निश्चय किया कि वह अपनी वीरता से सुंदरी का दिल जीतेगा। वह कठोर अभ्यास करने लगा और युद्ध कलाओं में निपुण हो गया।
धनपाल ने सोचा कि धन से सब कुछ मिल सकता है। वह दिन-रात व्यापार में लगा रहने लगा और अपार धन संचय करने लगा।
समय बीतता गया। एक दिन सुंदरी अचानक बीमार पड़ गई। उसकी हालत बहुत गंभीर हो गई। वैद्यों ने हार मान ली। अंततः सुंदरी की मृत्यु हो गई।
यह समाचार सुनकर तीनों मित्र बहुत दुखी हुए। सबसे ज्यादा प्रेम में अंधा कौन था – यह प्रश्न अब और भी गहरा हो गया था।
देवदत्त ने कहा, “मैं संसार त्यागकर वन में जाकर तपस्या करूंगा। सुंदरी के बिना यह जीवन व्यर्थ है।” वह तुरंत वन की ओर चल दिया.
वीरसेन बोला, “मैं सुंदरी की समाधि के पास रहकर उसकी रक्षा करूंगा।” वह श्मशान में जाकर रहने लगा.
धनपाल ने कहा, “मैं सुंदरी की अस्थियों को लेकर गंगा जी में विसर्जन करूंगा।” वह अस्थियाँ लेकर गंगा की ओर चल दिया.
कुछ दिन बाद देवदत्त को वन में एक ऋषि मिले। ऋषि के पास एक दिव्य मंत्र था जो मृत व्यक्ति को जीवित कर सकता था। देवदत्त ने ऋषि से वह मंत्र सीखा.
उधर वीरसेन श्मशान में सुंदरी की रक्षा कर रहा था। एक रात डाकुओं ने आकर समाधि को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की। वीरसेन ने अकेले ही सभी डाकुओं से युद्ध किया और उन्हें भगा दिया.
धनपाल गंगा के तट पर पहुँचा। वहाँ उसने अपना सारा धन दान कर दिया और सुंदरी की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की.
संयोग से तीनों मित्र एक ही दिन वापस लौटे। देवदत्त के पास मंत्र था, वीरसेन के पास सुंदरी का शरीर सुरक्षित था, और धनपाल के पास पुण्य था.
देवदत्त ने मंत्र का जाप किया। “ॐ मृत संजीवनी मंत्र!” अचानक सुंदरी जीवित हो गई.
अब तीनों में फिर विवाद शुरू हो गया। देवदत्त बोला, “मैंने इसे जीवित किया है, इसलिए यह मेरी पत्नी है।”
वीरसेन कहने लगा, “मैंने इसके शरीर की रक्षा की है, इसलिए यह मेरी है।”
धनपाल बोला, “मैंने इसकी आत्मा की शांति के लिए पुण्य किया है, इसलिए यह मेरी पत्नी है।”
बेताल ने कहानी समाप्त करके पूछा, “राजन्! बताओ कि इन तीनों में सबसे ज्यादा प्रेम में अंधा कौन था? और सुंदरी किसकी पत्नी बनी होगी?”
विक्रम ने सोचकर उत्तर दिया, “बेताल! तीनों ही प्रेम में अंधे थे, लेकिन सबसे ज्यादा अंधा वीरसेन था। देवदत्त ने विद्या सीखी जो उसके काम आई। धनपाल ने धन कमाया और दान किया। लेकिन वीरसेन ने अपना पूरा जीवन श्मशान में बिताया। वह सबसे ज्यादा प्रेम में अंधा था। और सुंदरी धनपाल की पत्नी बनी होगी क्योंकि उसने सुंदरी की आत्मा के लिए पुण्य किया था।”
“गलत उत्तर!” बेताल चिल्लाया और हवा में उड़कर पेड़ पर जा लटका.
इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि प्रेम में अंधापन हानिकारक होता है। सच्चा प्रेम वह है जो त्याग और सेवा में दिखता है, अधिकार जताने में नहीं।
इससे हमें यह भी समझ में आता है कि सच्चे मित्रता का मूल्य क्या होता है।
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