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हिमवान और मेनका की पावन कथा – शिव पुराण
बहुत समय पहले की बात है, जब पृथ्वी पर देवता और मनुष्य एक साथ रहते थे। उस समय हिमालय पर्वत के राजा हिमवान का शासन था। हिमवान एक धर्मपरायण और न्यायप्रिय राजा थे, जो अपनी प्रजा का बहुत ख्याल रखते थे।
हिमवान की पत्नी का नाम मेनका था। मेनका अप्सराओं में सबसे सुंदर और गुणवान थी। वह स्वर्ग से पृथ्वी पर आकर हिमवान से विवाह करके पर्वतराज की रानी बनी थी। हिमवान और मेनका का प्रेम सभी लोकों में प्रसिद्ध था।
एक दिन की बात है, जब मेनका अपने महल की छत पर खड़ी होकर हिमालय की सुंदर वादियों को निहार रही थी। अचानक आकाश से एक तेज प्रकाश आया और उसमें से ब्रह्मा जी प्रकट हुए।
“हे मेनका!” ब्रह्मा जी ने कहा, “मैं तुम्हें एक महत्वपूर्ण बात बताने आया हूं। तुम्हारे गर्भ से एक ऐसी कन्या जन्म लेगी जो संसार की कल्याणकारी होगी।”
मेनका ने हाथ जोड़कर पूछा, “हे प्रभु! कृपया मुझे और बताइए।”
ब्रह्मा जी मुस्कराते हुए बोले, “यह कन्या भगवान शिव की पत्नी बनेगी और जगत माता कहलाएगी। इसका नाम पार्वती होगा।”
यह सुनकर हिमवान और मेनका दोनों बहुत प्रसन्न हुए। वे समझ गए कि उनके घर में कोई दिव्य आत्मा जन्म लेने वाली है।
कुछ समय बाद, मेनका ने एक अत्यंत सुंदर कन्या को जन्म दिया। जैसे ही बच्ची का जन्म हुआ, पूरा हिमालय खुशी से झूम उठा। फूलों की बारिश होने लगी और देवताओं के वाद्य यंत्र अपने आप बजने लगे।
हिमवान ने अपनी बेटी को गोद में लेते हुए कहा, “हे मेनका! हमारी यह बेटी वास्तव में दिव्य है। देखो, इसके चेहरे पर कितना तेज है।”
मेनका ने प्रेम से अपनी बेटी को देखते हुए कहा, “हां स्वामी, यह निश्चित रूप से कोई साधारण बालिका नहीं है। इसकी आंखों में तो पूरा ब्रह्मांड दिखाई दे रहा है।”
बालिका का नाम पार्वती रखा गया। हिमवान और मेनका ने अपनी बेटी का पालन-पोषण बहुत प्रेम और सावधानी से किया। पार्वती बचपन से ही भगवान शिव की भक्त थी और हमेशा उनका ध्यान करती रहती थी।
जैसे-जैसे पार्वती बड़ी होती गई, उसकी सुंदरता और गुणों की चर्चा तीनों लोकों में होने लगी। वह न केवल रूप में सुंदर थी, बल्कि बुद्धि, करुणा और धैर्य में भी अद्वितीय थी।
एक दिन नारद मुनि हिमवान के दरबार में आए। उन्होंने हिमवान से कहा, “हे पर्वतराज! आपकी पुत्री पार्वती का विवाह भगवान शिव से होना निश्चित है, लेकिन इसके लिए उसे कठिन तपस्या करनी होगी।”
यह सुनकर मेनका चिंतित हो गई। उन्होंने पूछा, “हे मुनिवर! क्या मेरी बेटी को कष्ट उठाना पड़ेगा?”
नारद जी ने समझाया, “हे देवी! भगवान शिव महायोगी हैं। वे केवल उसी से विवाह करेंगे जो उनकी तरह तपस्वी हो। पार्वती को अपनी तपस्या से शिव जी को प्रसन्न करना होगा।”
पार्वती ने अपने माता-पिता से कहा, “माता जी, पिता जी! मैं भगवान शिव की तपस्या करने के लिए तैयार हूं। आप मुझे आशीर्वाद दीजिए।”
हिमवान और मेनका ने भारी मन से अपनी बेटी को तपस्या की अनुमति दे दी। पार्वती ने वन में जाकर कठोर तपस्या शुरू की। वह दिन-रात भगवान शिव का ध्यान करती रही।
कई वर्षों तक पार्वती की तपस्या चलती रही। हिमवान और मेनका रोज अपनी बेटी से मिलने जाते और उसका हौसला बढ़ाते रहते। वे देखते कि उनकी बेटी कितनी दृढ़ संकल्प के साथ अपनी साधना में लगी है।
अंततः भगवान शिव पार्वती की तपस्या से प्रसन्न हुए। उन्होंने पार्वती से विवाह करने की स्वीकृति दे दी। जब यह खुशखबरी हिमवान और मेनका को मिली, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं। पूरा हिमालय सज-धज गया। देवता, ऋषि-मुनि और सभी दिव्य आत्माएं इस पावन विवाह में सम्मिलित हुईं।
विवाह के दिन, जब भगवान शिव बारात लेकर आए, तो हिमवान ने बहुत सम्मान के साथ उनका स्वागत किया। मेनका ने अपनी बेटी को सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनाए।
“आज हमारा सबसे बड़ा सपना पूरा हो रहा है,” हिमवान ने मेनका से कहा।
मेनका ने आंसू पोंछते हुए कहा, “हां, हमारी बेटी आज जगत माता बनने जा रही है।”
इस प्रकार भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ। हिमवान और मेनका ने अपनी बेटी को विदा करते समय ढेर सारे आशीर्वाद दिए।
यह कथा हमें सिखाती है कि माता-पिता का प्रेम और आशीर्वाद कितना महत्वपूर्ण होता है। हिमवान और मेनका ने अपनी संतान के लिए हर कष्ट सहा और उसे सही राह दिखाई। उनके कारण ही माता पार्वती जगत की कल्याणकारी बन सकीं।
आज भी जब हम हिमालय को देखते हैं, तो हमें हिमवान और मेनका की कथा याद आती है। वे आदर्श माता-पिता के रूप में हमेशा पूजे जाते रहेंगे। यहाँ पर माता-पिता के प्रेम की एक और कहानी है जो आपको प्रेरित कर सकती है।













