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हातिम ताई और गरीब लकड़हारा की कहानी

बहुत समय पहले की बात है, जब अरब की धरती पर हातिम ताई नाम का एक महान दानवीर रहता था। उसकी दानवीरता और न्याय की कहानियाँ दूर-दूर तक फैली हुई थीं। हातिम ताई का दिल सोने से भी कीमती था और वह हमेशा गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता करता था।

एक दिन हातिम ताई अपने घोड़े पर सवार होकर जंगल से गुजर रहा था। अचानक उसके कानों में किसी के रोने की आवाज आई। आवाज का पीछा करते हुए वह एक पुराने पेड़ के नीचे पहुँचा, जहाँ एक गरीब लकड़हारा बैठकर फूट-फूटकर रो रहा था।

हातिम ताई ने अपना घोड़ा रोका और लकड़हारे के पास जाकर पूछा, “भाई, तुम क्यों रो रहे हो? क्या बात है?”

लकड़हारे ने आँसू पोंछते हुए कहा, “हे दयालु व्यक्ति, मैं एक गरीब लकड़हारा हूँ। मेरी पत्नी बहुत बीमार है और उसके इलाज के लिए मुझे सौ स्वर्ण मुद्राओं की जरूरत है। मैंने दिन-रात मेहनत की है, लेकिन केवल दस मुद्राएँ ही जुटा पाया हूँ।”

हातिम ताई का दिल लकड़हारे की दुःख भरी कहानी सुनकर पिघल गया। उसने तुरंत अपनी थैली से सौ स्वर्ण मुद्राएँ निकालीं और लकड़हारे को देते हुए कहा, “भाई, ये लो और अपनी पत्नी का इलाज कराओ। चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा।”

लकड़हारा हैरान रह गया। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि कोई अजनबी उसकी इतनी मदद करेगा। उसने हातिम ताई के पैर छूते हुए कहा, “आप कौन हैं महाराज? आपकी इस दया को मैं कैसे चुकाऊँगा?”

हातिम ताई ने मुस्कराते हुए कहा, “मैं हातिम ताई हूँ। और तुम्हें कुछ भी चुकाने की जरूरत नहीं है। बस अपनी पत्नी का ख्याल रखो और जब तुम्हारे पास सुविधा हो, तो किसी और जरूरतमंद की मदद करना।”

लकड़हारा खुशी से झूम उठा और दौड़कर अपने घर गया। उसने अपनी बीमार पत्नी का इलाज कराया और कुछ ही दिनों में वह स्वस्थ हो गई। लकड़हारे का परिवार हातिम ताई की दया से बहुत खुश था।

कुछ महीने बाद, हातिम ताई फिर उसी जंगल से गुजर रहा था। इस बार उसने देखा कि वही गरीब लकड़हारा एक छोटे बच्चे को खाना खिला रहा था। बच्चा बहुत भूखा लग रहा था और उसके कपड़े फटे हुए थे।

हातिम ताई ने लकड़हारे के पास जाकर पूछा, “यह बच्चा कौन है?”

लकड़हारे ने जवाब दिया, “हातिम साहब, यह एक अनाथ बच्चा है। इसके माता-पिता नहीं हैं और यह भूखा था। मैंने सोचा कि जैसे आपने मेरी मदद की थी, वैसे ही मुझे भी इस बच्चे की मदद करनी चाहिए।”

हातिम ताई का दिल गर्व से भर गया। उसने देखा कि उसकी दया का बीज अब फल दे रहा था। लकड़हारा अब दूसरों की मदद कर रहा था।

हातिम ताई ने लकड़हारे की पीठ थपथपाते हुए कहा, “तुमने बहुत अच्छा काम किया है। यही तो असली धर्म है – दूसरों की मदद करना।”

उस दिन के बाद, लकड़हारा हमेशा जरूरतमंदों की मदद करता रहा। वह अपनी मेहनत से कमाए पैसों में से कुछ हिस्सा हमेशा गरीबों के लिए रखता था। उसका यह काम देखकर गाँव के अन्य लोग भी प्रेरित हुए और वे भी दूसरों की सहायता करने लगे।

एक दिन गाँव में बहुत तेज़ बारिश हुई और कई घर बह गए। लकड़हारे ने अपना घर उन लोगों के लिए खोल दिया जिनके घर बह गए थे। उसने अपना खाना भी सबके साथ बाँटा।

जब हातिम ताई को इस बात का पता चला, तो वह बहुत खुश हुआ। उसने सोचा कि उसकी एक छोटी सी मदद ने कितना बड़ा बदलाव लाया था। गरीब लकड़हारा अब एक दानवीर बन गया था।

हातिम ताई ने लकड़ाहारे से मिलकर कहा, “तुमने मुझसे भी बड़ा काम किया है। तुमने सिखाया है कि दया और सहायता का सिलसिला कैसे चलता रहता है।”

लकड़हारे ने विनम्रता से कहा, “यह सब आपकी शिक्षा का फल है, हातिम साहब। आपने मुझे सिखाया कि खुशी बाँटने से बढ़ती है।”

इस तरह हातिम ताई और गरीब लकड़हारा की यह कहानी पूरे अरब में फैल गई। लोग समझ गए कि सच्ची दौलत पैसे में नहीं, बल्कि दूसरों की मदद करने में है। जो व्यक्ति दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझता है, वही सच्चा इंसान है।

आज भी जब कोई व्यक्ति किसी की निःस्वार्थ मदद करता है, तो लोग कहते हैं कि उसमें हातिम ताई जैसा दिल है। और जब कोई गरीब व्यक्ति अपनी कम आय में से भी दूसरों की मदद करता है, तो वह उस लकड़हारे की तरह महान बन जाता है।

सीख: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि दया और सहायता का कोई अंत नहीं होता। जब हम किसी की मदद करते हैं, तो वह व्यक्ति भी दूसरों की मदद करता है। इस तरह अच्छाई का सिलसिला चलता रहता है और दुनिया एक बेहतर जगह बनती है।सामाजिक दायित्व और सच्ची दानवीरता की कहानियाँ भी इसी तरह की हैं।

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