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सीता माता की खोज में हनुमान जी की वीरता
बहुत समय पहले की बात है, जब त्रेता युग में भगवान श्री राम का राज्य था। एक दिन दुष्ट रावण ने छल-कपट से माता सीता का हरण कर लिया और उन्हें लंका ले गया। जब श्री राम को इस बात का पता चला, तो वे बहुत दुखी हुए।
“हे लक्ष्मण! हमें तुरंत सीता माता की खोज में निकलना होगा,” श्री राम ने अपने भाई से कहा। “बिना सीता के यह संसार मेरे लिए अंधकारमय है।”
श्री राम और लक्ष्मण जी सीता माता की खोज में निकलना चाहते थे, परंतु वे नहीं जानते थे कि सीता माता कहाँ हैं। वे जंगल-जंगल भटकते रहे, हर पेड़, हर पत्थर से सीता माता के बारे में पूछते रहे।
एक दिन वे किष्किंधा पहुंचे, जहाँ वानर राज सुग्रीव रहते थे। सुग्रीव ने श्री राम से मित्रता की और उनकी सहायता का वचन दिया। सुग्रीव ने अपनी पूरी वानर सेना को सीता माता की खोज में निकलना का आदेश दिया।
“हे वानरों! आप सभी अलग-अलग दिशाओं में जाकर सीता माता को खोजिए,” सुग्रीव ने कहा। “जो भी सीता माता का पता लगाएगा, उसे बहुत बड़ा पुरस्कार मिलेगा।”
इस समय हनुमान जी भी वहाँ उपस्थित थे। वे पवन पुत्र थे और उनमें अद्भुत शक्ति थी। जब उन्होंने सुना कि सीता माता की खोज में निकलना है, तो उनका हृदय श्री राम की सेवा के लिए उमंग से भर गया।
“प्रभु राम! मैं दक्षिण दिशा में जाकर सीता माता को खोजूंगा,” हनुमान जी ने विनम्रता से कहा। “आपकी भक्ति की शक्ति से मैं अवश्य सफल होऊंगा।”
श्री राम ने हनुमान जी को अपनी अंगूठी दी और कहा, “हे हनुमान! यह अंगूठी सीता को दिखाना, जिससे वे जान जाएंगी कि तुम मेरे दूत हो।”
हनुमान जी ने अंगरक और जामवंत के साथ दक्षिण दिशा में यात्रा शुरू की। वे पर्वतों को पार करते गए, नदियों को लांघते गए। रास्ते में उन्हें एक बूढ़ी गिद्ध मिली, जिसका नाम संपाति था।
“हे वानरों! मैंने समुद्र के पार लंका में एक सुंदर स्त्री को रोते हुए देखा है,” संपाति ने बताया। “वह अशोक वाटिका में कैद है।”
यह सुनकर हनुमान जी का हृदय खुशी से भर गया। अब वे जानते थे कि सीता माता की खोज में निकलना सफल होने वाला है। परंतु समुद्र बहुत विशाल था। कैसे पार करें?
जामवंत जी ने हनुमान जी से कहा, “हे पवन पुत्र! तुम में अपार शक्ति है। तुम अपने पिता पवन देव की तरह उड़ सकते हो। केवल अपनी शक्ति को याद करो।”
हनुमान जी ने अपनी शक्ति को पहचाना। वे पर्वत के शिखर पर खड़े हुए और “जय श्री राम” का उच्चारण करते हुए आकाश में उड़ गए। उनका विशाल रूप देखकर सभी वानर आश्चर्यचकित हो गए।
समुद्र पार करते समय रास्ते में सुरसा नामक राक्षसी आई। उसने हनुमान जी को रोकने की कोशिश की, परंतु हनुमान जी की बुद्धि और भक्ति के आगे वह हार गई।
अंततः हनुमान जी लंका पहुंचे। रात के समय वे छोटे रूप में अशोक वाटिका में गए। वहाँ उन्होंने देखा कि सीता माता एक पेड़ के नीचे बैठी हुई श्री राम का नाम जप रही थीं।
“हे माता! मैं श्री राम का दूत हूँ,” हनुमान जी ने विनम्रता से कहा और राम जी की अंगूठी दिखाई। सीता माता की आँखों में खुशी के आंसू आ गए।
“हे हनुमान! क्या सच में राम जी कुशल हैं?” सीता माता ने पूछा।
“हाँ माता! प्रभु राम आपकी खोज में दिन-रात व्याकुल रहते हैं। वे शीघ्र ही आपको मुक्त कराने आएंगे,” हनुमान जी ने आश्वासन दिया।
सीता माता ने अपनी चूड़ामणि हनुमान जी को दी और कहा, “यह राम जी को दे देना, जिससे वे जान जाएंगे कि तुमने मुझसे भेंट की है।”
हनुमान जी ने लंका में तहलका मचाया, अशोक वाटिका को नष्ट किया, और रावण के पुत्र अक्षयकुमार को परास्त किया। अंत में वे वापस राम जी के पास पहुंचे।
“प्रभु! मैंने सीता माता को खोज लिया है। वे लंका की अशोक वाटिका में हैं और आपकी प्रतीक्षा कर रही हैं,” हनुमान जी ने खुशी से बताया।
श्री राम का चेहरा खुशी से चमक उठा। उन्होंने हनुमान जी को गले लगाया और कहा, “हे हनुमान! तुमने असंभव कार्य को संभव बना दिया। तुम सच्चे भक्त हो।”
इस प्रकार हनुमान जी की भक्ति, साहस और बुद्धि के कारण सीता माता की खोज में निकलना सफल हुआ। उनकी इस वीरता की कहानी आज भी हमें प्रेरणा देती है।
शिक्षा: इस कहानी से हमें सिखाया जाता है कि सच्ची भक्ति, निष्ठा और साहस के साथ कोई भी कार्य असंभव नहीं है। हनुमान जी की तरह हमें भी कभी हार नहीं मानना चाहिए और हमेशा सत्य का साथ देना चाहिए।












