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सिद्धिदात्री माता की अद्भुत कथा – नवरात्रि की नौवीं देवी

बहुत समय पहले की बात है, जब संसार में अंधकार छाया हुआ था और असुरों का राज था। उस समय देवताओं को अपनी शक्तियों की आवश्यकता थी। तभी सिद्धिदात्री माता का प्राकट्य हुआ, जो सभी सिद्धियों की दाता हैं।

सिद्धिदात्री माता का रूप अत्यंत दिव्य और तेजस्वी था। उनके चार भुजाएं थीं – एक हाथ में कमल का फूल, दूसरे में गदा, तीसरे में शंख और चौथे हाथ से वे आशीर्वाद देती थीं। वे कमल के फूल पर विराजमान थीं और उनका वाहन सिंह था।

एक दिन देवराज इंद्र अपनी सभी समस्याओं के साथ सिद्धिदात्री माता के पास पहुंचे। उन्होंने कहा, “हे माता! असुरों ने हमारी सभी शक्तियां छीन ली हैं। हमें अपनी खोई हुई सिद्धियां वापस चाहिए।”

सिद्धिदात्री माता ने मुस्कराते हुए कहा, “पुत्र इंद्र! तुम्हारी भक्ति और सच्चे मन से की गई प्रार्थना मुझे प्रिय है। मैं तुम्हें वे सभी सिद्धियां प्रदान करूंगी जिनकी तुम्हें आवश्यकता है।”

माता ने अपने दिव्य हाथों से देवताओं को आशीर्वाद दिया। तुरंत ही देवताओं में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व – ये आठों सिद्धियां प्राप्त हो गईं।

इसी समय एक छोटा बालक राजकुमार अर्जुन भी वहां पहुंचा। वह बहुत परेशान था क्योंकि उसके राज्य में भयंकर अकाल पड़ा था। उसने सिद्धिदात्री की कथा सुनी थी और माता से प्रार्थना करने आया था।

बालक ने कहा, “हे माता! मेरी प्रजा भूख से तड़प रही है। कृपया हमारी सहायता करें।” उसकी आंखों में आंसू थे और मन में सच्ची भक्ति थी।

सिद्धिदात्री माता का हृदय बालक की सच्ची भक्ति देखकर पिघल गया। उन्होंने कहा, “वत्स! तुम्हारा मन निर्मल है और तुम्हारी प्रजा के लिए चिंता सच्ची है। मैं तुम्हें वह सिद्धि प्रदान करती हूं जिससे तुम अपनी इच्छा से वर्षा करा सकोगे।”

माता ने अपने कमल से बालक के सिर पर जल छिड़का। तुरंत ही बालक में दिव्य शक्ति का संचार हुआ। उसने आकाश की ओर हाथ उठाया और मन ही मन माता से प्रार्थना की।

अचानक आकाश में बादल घिर आए और मूसलाधार बारिश होने लगी। पूरे राज्य में खुशी की लहर दौड़ गई। किसान खुशी से नाचने लगे और बच्चे बारिश में खेलने लगे।

इसी बीच एक तपस्वी ऋषि भी वहां आए। वे कई वर्षों से कठोर तपस्या कर रहे थे लेकिन उन्हें मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो रही थी। उन्होंने सिद्धिदात्री माता से कहा, “हे देवी! मैं वर्षों से तपस्या कर रहा हूं परंतु मुझे सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं हो रहा।”

माता ने समझाया, “हे ऋषि! तपस्या केवल शरीर से नहीं, मन की शुद्धता से होती है। तुम्हारे मन में अहंकार है। पहले अपने अहंकार को त्यागो, फिर सच्चा ज्ञान प्राप्त होगा।”

ऋषि ने माता के वचनों को समझा और अपने अहंकार को त्याग दिया। तुरंत ही उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे मोक्ष को प्राप्त हुए।

तभी वहां एक गरीब किसान की पत्नी भी आई। उसका पति बीमार था और उसके पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे। उसने रोते हुए कहा, “माता! मेरे पति को बचा लीजिए। मैं आपकी सच्ची भक्त हूं।”

सिद्धिदात्री की कथा में यह दिखाया गया है कि माता सभी भक्तों की सुनती हैं। उन्होंने महिला को एक दिव्य जड़ी-बूटी दी और कहा, “इसे अपने पति को दो। वह स्वस्थ हो जाएगा।”

महिला ने घर जाकर वह जड़ी-बूटी अपने पति को दी। कुछ ही घंटों में उसका पति पूरी तरह स्वस्थ हो गया। पूरे गांव में माता की महिमा फैल गई।

इस प्रकार सिद्धिदात्री माता ने सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूरी कीं। देवताओं को उनकी शक्तियां मिलीं, राजकुमार को वर्षा की सिद्धि मिली, ऋषि को मोक्ष मिला और गरीब महिला के पति को स्वास्थ्य मिला।

माता ने सभी से कहा, “मैं सिद्धिदात्री हूं। जो भी सच्चे मन से मेरी पूजा करता है, मैं उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करती हूं। लेकिन याद रखो, सिद्धियों का उपयोग केवल भलाई के लिए करना।”

तब से सिद्धिदात्री की कथा पूरे संसार में फैल गई। लोग नवरात्रि के नौवें दिन माता की विशेष पूजा करने लगे। माता की कृपा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

आज भी जो भक्त सच्चे मन से सिद्धिदात्री माता की पूजा करते हैं, उन्हें अष्ट सिद्धियां और नव निधियां प्राप्त होती हैं। माता का आशीर्वाद पाकर भक्त जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं।

इस प्रकार सिद्धिदात्री माता की यह अद्भुत कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और निर्मल मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती। माता सदा अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं।

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