Summarize this Article with:

सरस्वती माता की अद्भुत कथा – ज्ञान की देवी

बहुत समय पहले की बात है, जब संसार में अंधकार छाया हुआ था। न कोई ज्ञान था, न कोई कला, न संगीत और न ही कोई विद्या। सभी प्राणी मूक थे और उनके पास अपने भावों को व्यक्त करने का कोई साधन नहीं था।

इस स्थिति को देखकर ब्रह्मा जी बहुत चिंतित हुए। उन्होंने सोचा कि बिना ज्ञान और वाणी के यह संसार कैसे चलेगा? तब उन्होंने अपनी शक्ति से एक दिव्य देवी को प्रकट किया।

यह देवी अत्यंत सुंदर थीं। उनके चार हाथ थे – एक में वीणा, दूसरे में पुस्तक, तीसरे में माला और चौथे में कमल का फूल। उनका वस्त्र श्वेत था जो पवित्रता का प्रतीक था। वे एक सुंदर हंस पर विराजमान थीं।

ब्रह्मा जी ने कहा, “हे देवी! आप ज्ञान, कला, संगीत और विद्या की अधिष्ठात्री हैं। आपका नाम सरस्वती होगा। कृपया इस संसार को अपने आशीर्वाद से भर दें।”

सरस्वती माता ने मुस्कराते हुए अपनी वीणा उठाई और उसके तार छेड़े। जैसे ही मधुर स्वर निकले, पूरा संसार संगीत से भर गया। पक्षियों ने गाना शुरू किया, हवा में मधुर आवाज़ें गूंजने लगीं।

फिर उन्होंने अपनी पुस्तक खोली और उसमें से अक्षर निकलकर हवा में तैरने लगे। ये अक्षर जहाँ भी गिरे, वहाँ ज्ञान का प्रकाश फैल गया। मनुष्यों को भाषा मिली, वे बोलने लगे, लिखने लगे।

एक दिन नारद मुनि सरस्वती माता के पास आए और बोले, “माता! मैं संगीत सीखना चाहता हूँ। कृपया मुझे अपना शिष्य बना लें।”

सरस्वती माता ने कहा, “वत्स नारद! संगीत सीखने के लिए धैर्य, अभ्यास और भक्ति चाहिए। क्या तुम तैयार हो?”

“हाँ माता! मैं पूरी लगन से सीखूंगा।” नारद जी ने उत्तर दिया।

सरस्वती माता ने नारद जी को वीणा बजाना सिखाया। दिन-रात अभ्यास करने से नारद जी महान संगीतकार बन गए। उनकी वीणा की आवाज़ से पूरे ब्रह्मांड में शांति फैल जाती थी।

इसी तरह व्यास मुनि भी सरस्वती माता के पास आए। उन्होंने कहा, “माता! मैं महाभारत जैसा महान ग्रंथ लिखना चाहता हूँ। कृपया मेरी सहायता करें।”

सरस्वती माता ने व्यास जी को आशीर्वाद दिया। उनकी कृपा से व्यास जी ने महाभारत जैसा अमर ग्रंथ लिखा जो आज भी संसार का मार्गदर्शन करता है।

एक बार राक्षस राज रावण भी सरस्वती माता के पास आया। वह बहुत अहंकारी था और सोचता था कि वह सबसे बड़ा विद्वान है।

रावण ने कहा, “देवी! मैं दस सिर वाला महान राक्षस हूँ। मुझे और भी ज्ञान दो ताकि मैं तीनों लोकों पर राज कर सकूं।”

सरस्वती माता ने शांत स्वर में कहा, “रावण! ज्ञान का उपयोग अहंकार के लिए नहीं, बल्कि संसार की भलाई के लिए करना चाहिए। तुम्हारा अहंकार तुम्हारा नाश करेगा।”

लेकिन रावण ने माता की बात नहीं मानी। अंत में उसका अहंकार ही उसके विनाश का कारण बना।

इसके विपरीत, जब छोटे बच्चे सच्चे मन से सरस्वती माता से प्रार्थना करते थे, तो वे तुरंत प्रसन्न हो जाती थीं। एक गरीब ब्राह्मण का बेटा था जो पढ़ना चाहता था लेकिन उसके पास पुस्तकें नहीं थीं।

वह रोज़ सरस्वती माता से प्रार्थना करता, “माता! मैं पढ़ना चाहता हूँ। कृपया मेरी सहायता करें।”

सरस्वती माता उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हुईं। उन्होंने उसे स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, “वत्स! कल सुबह नदी किनारे जाना। वहाँ तुम्हें एक पुस्तक मिलेगी।”

अगली सुबह बालक को वास्तव में एक दिव्य पुस्तक मिली। उस पुस्तक को पढ़कर वह महान विद्वान बन गया।

सरस्वती माता की कृपा से ही संसार में वेद, उपनिषद, पुराण और अन्य पवित्र ग्रंथों की रचना हुई। कवियों को काव्य की प्रेरणा मिली, कलाकारों को कला का ज्ञान मिला।

आज भी जब कोई बच्चा पहली बार स्कूल जाता है, तो माता-पिता सरस्वती माता से प्रार्थना करते हैं। वसंत पंचमी के दिन सभी लोग सरस्वती माता की पूजा करते हैं और उनसे ज्ञान का आशीर्वाद माँगते हैं।

सरस्वती माता हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करती हैं। वे उन्हें सही राह दिखाती हैं और बुराई से बचाती हैं। जो भी व्यक्ति सच्चे मन से उनकी आराधना करता है, उसे ज्ञान, बुद्धि और विवेक की प्राप्ति होती है।

इस प्रकार सरस्वती की कथा हमें सिखाती है कि ज्ञान ही सबसे बड़ी संपत्ति है। जो व्यक्ति विनम्रता से ज्ञान प्राप्त करता है, वह जीवन में सफल होता है। लेकिन जो अहंकार करता है, वह अपना नाश कर लेता है।

सरस्वती माता की जय! विद्या की देवी की जय!

Summarize this Article with:

About Me

Welcome to StoriesPub.com We started in 2019 with a simple idea to provide our readers with useful and interesting information. Our team is dedicated to curating a wide range of captivating content in different categories, including inspirational stories, funny tales, Parenting, Kids’ products, Educational AI content, Tech content, coloring books, how to draw, and more.