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पार्वती का जन्म और तपस्या – माता की अद्भुत कथा
बहुत समय पहले की बात है, जब हिमालय पर्वत के राजा हिमवान और उनकी पत्नी मैनावती का घर खुशियों से भरा हुआ था। उनके यहाँ एक अत्यंत सुंदर कन्या का जन्म हुआ था, जिसका नाम पार्वती रखा गया।
पार्वती का जन्म कोई साधारण घटना नहीं थी। वे स्वयं आदिशक्ति माता दुर्गा का अवतार थीं। जब वे छोटी थीं, तो उनकी माता मैनावती अक्सर कहती थीं, “यह कन्या कोई साधारण बालिका नहीं है। इसमें दिव्य शक्ति का वास है।”
बचपन से ही पार्वती में भगवान शिव के प्रति अगाध प्रेम था। वे अक्सर अपनी सखियों से कहती थीं, “मैं केवल भोलेनाथ से ही विवाह करूंगी। वे ही मेरे प्राणनाथ हैं।”
जब पार्वती युवा हुईं, तो उन्होंने अपने पिता हिमवान से कहा, “पिताजी, मैं भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या करना चाहती हूँ।”
हिमवान ने चिंतित होकर कहा, “पुत्री, भगवान शिव तो महायोगी हैं। वे संसार से विरक्त रहते हैं। तुम्हारी यह इच्छा पूरी होना कठिन है।”
लेकिन पार्वती का निश्चय दृढ़ था। उन्होंने अपनी माता से कहा, “माता, मेरा मन केवल शिवजी में ही लगता है। मैं उनके बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकती।”
पार्वती की तपस्या का आरंभ
पार्वती ने अपने महल का सुख-वैभव त्यागकर वन में जाकर कठोर तपस्या आरंभ की। वे प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर गंगा में स्नान करतीं और शिवलिंग पर जल चढ़ाती थीं।
प्रारंभ में पार्वती फल-फूल खाकर तपस्या करती थीं। फिर उन्होंने केवल पत्ते खाने का नियम बनाया। कुछ समय बाद वे केवल जल पीकर रहने लगीं। अंत में उन्होंने जल भी त्याग दिया और निराहार रहकर तपस्या करने लगीं।
पार्वती की इस कठोर तपस्या को देखकर सभी देवता चिंतित हो गए। ब्रह्माजी ने कहा, “यदि पार्वती की तपस्या इसी प्रकार चलती रही, तो तीनों लोकों में हाहाकार मच जाएगा।”
अग्नि परीक्षा
भगवान शिव ने पार्वती की परीक्षा लेने का निश्चय किया। वे एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके पार्वती के पास आए और बोले, “बेटी, तुम व्यर्थ में इतनी कठोर तपस्या कर रही हो। शिव तो रूद्र हैं, क्रोधी हैं। वे तुम्हारे योग्य नहीं हैं।”
पार्वती ने दृढ़ता से उत्तर दिया, “हे ब्राह्मण देव, आप भगवान शिव को नहीं जानते। वे करुणा के सागर हैं, भक्तों के कल्याणकारी हैं। मैं उनके अतिरिक्त किसी और को पति रूप में स्वीकार नहीं कर सकती।”
वृद्ध ब्राह्मण ने और भी कई प्रकार से पार्वती को समझाने का प्रयास किया, लेकिन पार्वती अपने निश्चय पर अडिग रहीं। अंततः भगवान शिव ने अपना वास्तविक रूप प्रकट किया।
शिव-पार्वती का मिलन
भगवान शिव ने प्रसन्न होकर कहा, “हे पार्वती, तुम्हारी भक्ति और तपस्या से मैं अत्यंत प्रभावित हूँ। तुम्हारा प्रेम सच्चा है और तुम्हारी तपस्या निष्कलंक है।”
पार्वती ने आनंद से भरकर कहा, “प्रभु, आपने मेरी तपस्या स्वीकार की। अब मेरा जीवन सफल हो गया।”
भगवान शिव ने आशीर्वाद देते हुए कहा, “पार्वती, तुम मेरी अर्धांगिनी बनोगी। हम दोनों मिलकर संसार का कल्याण करेंगे।”
विवाह की तैयारी
जब हिमवान को पता चला कि भगवान शिव ने पार्वती की तपस्या स्वीकार कर ली है, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, “आज मेरा भाग्य खुल गया है। मेरी पुत्री को स्वयं महादेव पति रूप में मिले हैं।”
मैनावती ने खुशी से कहा, “मैं जानती थी कि हमारी पुत्री कोई साधारण कन्या नहीं है। उसकी तपस्या अवश्य सफल होगी।”
सभी देवता, ऋषि-मुनि और गंधर्व इस शुभ समाचार से प्रसन्न हुए। विष्णु भगवान ने कहा, “यह विवाह तीनों लोकों के कल्याण के लिए आवश्यक था।”
संदेश और शिक्षा
पार्वती की तपस्या से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची भक्ति और दृढ़ संकल्प के आगे कोई भी बाधा टिक नहीं सकती। उन्होंने अपने प्रेम और तपस्या से यह सिद्ध कर दिया कि जब मन में सच्ची श्रद्धा हो, तो भगवान अवश्य कृपा करते हैं।
पार्वती माता ने अपनी तपस्या के द्वारा यह भी दिखाया कि स्त्री शक्ति कितनी महान है। वे आदिशक्ति हैं और उनकी शक्ति से ही संसार का संचालन होता है।
इस प्रकार पार्वती का जन्म और तपस्या की यह पावन कथा हमें सिखाती है कि धैर्य, दृढ़ता और सच्ची भक्ति से हर असंभव कार्य संभव हो जाता है। माता पार्वती का यह त्याग और तपस्या आज भी हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है।सच्ची भक्ति और दृढ़ संकल्प के महत्व को समझते हुए, हम भी अपने जीवन में आगे बढ़ सकते हैं।











