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कल्कि अवतार की कथा – कलयुग के अंत की गाथा

बहुत समय पहले की बात है, जब धरती पर कलयुग का अंत होने वाला था। उस समय संसार में अधर्म, पाप और अन्याय का राज था। लोग भगवान को भूल गए थे और केवल स्वार्थ में डूबे हुए थे। चारों ओर झूठ, छल-कपट और हिंसा का बोलबाला था।

इस समय शंभल ग्राम में एक धर्मपरायण ब्राह्मण परिवार रहता था। पिता का नाम विष्णुयशा और माता का नाम सुमति था। वे दोनों भगवान विष्णु के परम भक्त थे और इस पापमय युग में भी धर्म के मार्ग पर चलते रहे।

एक दिन माता सुमति ने एक अद्भुत स्वप्न देखा। उन्होंने देखा कि भगवान विष्णु स्वयं उनके घर आए हैं और कह रहे हैं, “हे देवी! मैं तुम्हारे गर्भ में अवतार लूंगा। मैं कल्कि अवतार के रूप में जन्म लूंगा और इस धरती से सारे पाप और अधर्म का नाश करूंगा।”

कुछ समय बाद माता सुमति के गर्भ में एक दिव्य बालक का जन्म हुआ। जन्म के समय आकाश में देवताओं के फूल बरसे, दिव्य संगीत बजा और सारा शंभल ग्राम प्रकाश से भर गया। इस बालक का नाम कल्कि रखा गया।

कल्कि का बचपन अन्य बच्चों से बिल्कुल अलग था। वे बहुत तेजस्वी, बुद्धिमान और शक्तिशाली थे। उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकलता था। जब वे मुस्कराते तो लगता जैसे सूर्य की किरणें चमक रही हों।

एक दिन बालक कल्कि अपने पिता से पूछे, “पिताजी, यह संसार इतना दुखी क्यों है? लोग एक-दूसरे से इतनी घृणा क्यों करते हैं?”

विष्णुयशा ने उत्तर दिया, “पुत्र, यह कलयुग है। इस युग में धर्म का ह्रास हो गया है। लोग अधर्म के मार्ग पर चल रहे हैं। लेकिन चिंता मत करो, भगवान विष्णु ने वादा किया है कि वे कल्कि अवतार लेकर इस अधर्म का नाश करेंगे।”

यह सुनकर बालक कल्कि मुस्कराए और बोले, “पिताजी, वह समय आ गया है।”

जैसे-जैसे कल्कि बड़े होते गए, उनकी शक्तियां भी बढ़ती गईं। वे सभी शास्त्रों के ज्ञाता थे, युद्ध कला में निपुण थे और उनके पास दिव्य शक्तियां थीं। उनके गुरु परशुराम जी ने उन्हें सभी अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा दी।

एक दिन आकाश से एक सफेद घोड़ा उतरा। यह देवदत्त नामक दिव्य घोड़ा था, जो कल्कि अवतार का वाहन बनने के लिए स्वर्ग से आया था। इस घोड़े के पंख थे और वह हवा में उड़ सकता था।

अब समय आ गया था जब कल्कि अवतार को अपना कार्य शुरू करना था। उन्होंने अपने माता-पिता से आशीर्वाद लिया और अधर्म के नाश के लिए निकल पड़े।

सबसे पहले कल्कि ने उन राजाओं को हराया जो प्रजा पर अत्याचार करते थे। वे अपने दिव्य तलवार से दुष्टों का संहार करते गए। जहां भी वे जाते, वहां न्याय की स्थापना होती।

एक बार कल्कि एक गांव में पहुंचे जहां एक क्रूर राजा कलि का राज था। यह राजा लोगों से जबरदस्ती धन छीनता था और निर्दोष लोगों को सताता था। गांव के लोग बहुत परेशान थे।

कल्कि ने राजा कलि को युद्ध के लिए ललकारा। राजा कलि बोला, “तुम कौन हो जो मुझसे युद्ध करने का साहस कर रहे हो?”

कल्कि ने उत्तर दिया, “मैं कल्कि हूं, भगवान विष्णु का अवतार। मैं इस धरती से सारे अधर्म का नाश करने आया हूं। तुम्हारे पापों का अंत करने का समय आ गया है।”

यह सुनकर राजा कलि डर गया, लेकिन उसने युद्ध करने का निश्चय किया। भयंकर युद्ध हुआ। कल्कि अवतार ने अपनी दिव्य शक्तियों से राजा कलि और उसकी सेना का नाश कर दिया।

इसके बाद कल्कि ने सारे संसार में घूम-घूमकर सभी दुष्टों, पापियों और अधर्मियों का नाश किया। वे जहां भी जाते, वहां धर्म की स्थापना करते। लोग फिर से भगवान को मानने लगे और सच्चाई के मार्ग पर चलने लगे।

कल्कि अवतार ने न केवल बुरे लोगों को हराया, बल्कि अच्छे लोगों की रक्षा भी की। उन्होंने गरीबों की सहायता की, अनाथों का सहारा बना और धर्म के मार्ग पर चलने वालों को आशीर्वाद दिया।

एक दिन कल्कि के पास एक बूढ़ी औरत आई और बोली, “हे प्रभु! मेरा बेटा बहुत बीमार है। कृपया उसे ठीक कर दीजिए।”

कल्कि ने अपना हाथ उस बच्चे के सिर पर रखा और वह तुरंत ठीक हो गया। यह देखकर सभी लोग समझ गए कि कल्कि कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि स्वयं भगवान हैं।

इस प्रकार कल्कि अवतार की कथा में हम देखते हैं कि कैसे भगवान विष्णु ने कलयुग के अंत में अवतार लेकर धरती को पापों से मुक्त किया। उन्होंने सभी दुष्टों का नाश करके धर्म की स्थापना की।

कल्कि अवतार का कार्य पूरा होने के बाद, धरती पर फिर से सतयुग का आरंभ हुआ। लोग खुश रहने लगे, सभी में प्रेम और भाईचारा बढ़ा। चारों ओर शांति और समृद्धि का राज हुआ।

अंत में कल्कि अवतार ने सभी को आशीर्वाद दिया और कहा, “हे मनुष्यों! हमेशा धर्म के मार्ग पर चलना। सच बोलना, दूसरों की सहायता करना और भगवान को याद रखना। जब भी धरती पर अधर्म बढ़ेगा, मैं फिर से आऊंगा।”

यह कल्कि अवतार की कथा हमें सिखाती है कि बुराई कितनी भी बड़ी हो, अच्छाई हमेशा जीतती है। भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और धर्म की स्थापना करते हैं। हमें भी हमेशा सच्चाई और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए। धर्म की स्थापना और सच्चाई के महत्व को समझना चाहिए।

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