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धन्वंतरि अवतार की कथा – आयुर्वेद के देवता

बहुत समय पहले की बात है, जब देवता और असुर दोनों अमृत पाने की इच्छा से समुद्र मंथन कर रहे थे। यह एक ऐसी घटना थी जिसने पूरे ब्रह्मांड को हिला दिया था। भगवान विष्णु के दस अवतारों में से एक धन्वंतरि अवतार की यह अद्भुत कथा है।

देवराज इंद्र के अभिमान के कारण ऋषि दुर्वासा ने देवताओं को श्राप दे दिया था। इस श्राप के कारण देवता अपनी शक्ति खो बैठे थे और असुर उन पर हावी हो गए थे। देवता परेशान होकर भगवान विष्णु के पास गए।

“हे प्रभु! हमारी रक्षा करिए। असुर हमें सता रहे हैं और हमारी शक्ति चली गई है,” देवताओं ने विनती की।

भगवान विष्णु ने मुस्कराते हुए कहा, “चिंता मत करो। समुद्र मंथन करके अमृत निकालना होगा। लेकिन यह काम अकेले नहीं हो सकता। तुम्हें असुरों से मित्रता करनी होगी।”

देवताओं को यह बात अजीब लगी, लेकिन भगवान विष्णु की आज्ञा मानकर उन्होंने असुरों से संधि की। मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया और वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया।

समुद्र मंथन शुरू हुआ। पहले हलाहल विष निकला जिसे भगवान शिव ने पी लिया। फिर एक के बाद एक चौदह रत्न निकले – कामधेनु गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष, अप्सराएं, लक्ष्मी देवी, वारुणी, चंद्रमा, शंख, धनुष, और अंत में अमृत कलश

जब अमृत कलश समुद्र से निकला, तो एक अद्भुत दृश्य दिखाई दिया। एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ जो अमृत कलश लेकर खड़ा था। उनके हाथों में चार वस्तुएं थीं – अमृत कलश, शंख, चक्र और जलूका (जोंक)।

“यह कौन है?” देवता और असुर दोनों आश्चर्य से पूछने लगे।

भगवान विष्णु ने बताया, “यह मेरा धन्वंतरि अवतार है। यह आयुर्वेद के देवता हैं और सभी रोगों के निवारण की शक्ति इनमें है।”

धन्वंतरि भगवान ने देवताओं और असुरों से कहा, “मैं आयुर्वेद का ज्ञान लेकर आया हूं। यह विद्या मानव जाति के कल्याण के लिए है। जो भी इस विद्या को सीखेगा, वह सभी रोगों का इलाज कर सकेगा।”

असुर अमृत देखकर लालच में आ गए और उसे छीनने की कोशिश करने लगे। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लिया और चतुराई से सारा अमृत देवताओं को पिला दिया।

धन्वंतरि भगवान ने पृथ्वी पर जन्म लेने का निश्चय किया। वे काशी के राजा दिवोदास के पुत्र के रूप में अवतरित हुए। बचपन से ही उनमें अद्भुत शक्तियां थीं।

एक दिन राजकुमार धन्वंतरि जंगल में घूम रहे थे। उन्होंने देखा कि एक हिरण घायल पड़ा है और दर्द से कराह रहा है। धन्वंतरि के मन में दया आई।

“हे प्रभु! इस निर्दोष प्राणी की पीड़ा कैसे दूर करूं?” उन्होंने मन ही मन प्रार्थना की।

अचानक उनके मन में आयुर्वेद का ज्ञान प्रकट हुआ। उन्होंने जंगल की जड़ी-बूटियों को पहचाना और हिरण का इलाज किया। कुछ ही देर में हिरण स्वस्थ होकर खुशी से नाचने लगा।

इस घटना के बाद धन्वंतरि ने आयुर्वेद की गहरी साधना शुरू की। वे दिन-रात जड़ी-बूटियों का अध्ययन करते, रोगियों का इलाज करते और नई औषधियों की खोज करते।

राजकुमार धन्वंतरि की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। लोग कहते, “काशी में एक ऐसे वैद्य हैं जो किसी भी रोग का इलाज कर सकते हैं।”

एक बार एक गरीब किसान अपने बीमार बेटे को लेकर आया। बच्चा बहुत बीमार था और किसी भी वैद्य से ठीक नहीं हो रहा था।

“राजकुमार! मेरे पास पैसे नहीं हैं, लेकिन कृपया मेरे बेटे को बचा लीजिए,” किसान ने रोते हुए कहा।

धन्वंतरि ने मुस्कराते हुए कहा, “चिंता मत करो। आयुर्वेद सबके लिए है, अमीर-गरीब का भेद नहीं।”

उन्होंने बच्चे का इलाज किया और कुछ ही दिनों में वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया। किसान की खुशी का ठिकाना नहीं था।

धन्वंतरि भगवान ने आयुर्वेद के आठ अंग बताए – कायचिकित्सा, शल्यचिकित्सा, शालाक्यतंत्र, कौमारभृत्य, अगदतंत्र, रसायनतंत्र, वाजीकरणतंत्र और भूतविद्या

उन्होंने अपने शिष्यों को सिखाया, “आयुर्वेद केवल रोग का इलाज नहीं है। यह जीवन जीने की कला है। स्वस्थ रहने के लिए संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, और मानसिक शांति जरूरी है।”

धन्वंतरि भगवान ने सुश्रुत को शल्य चिकित्सा सिखाई। सुश्रुत ने आगे चलकर ‘सुश्रुत संहिता’ लिखी जो आज भी आयुर्वेद का महत्वपूर्ण ग्रंथ है।

एक दिन एक राक्षस ने काशी पर आक्रमण किया। वह एक ऐसा जहर फैला रहा था जिससे लोग बीमार पड़ रहे थे। धन्वंतरि ने अपनी दिव्य शक्तियों से उस जहर का तोड़ बनाया और सभी लोगों को बचाया।

राक्षस गुस्से में आकर धन्वंतरि से लड़ने आया। धन्वंतरि ने अपना दिव्य रूप दिखाया – चार भुजाओं में अमृत कलश, शंख, चक्र और जलूका लिए हुए।

“मैं धन्वंतरि हूं, भगवान विष्णु का अवतार। मैं जीवन देता हूं, मृत्यु नहीं। तुम अपनी बुराई छोड़कर अच्छे काम करो,” धन्वंतरि ने कहा।

राक्षस को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने माफी मांगी। धन्वंतरि ने उसे भी आयुर्वेद की शिक्षा दी।

धन्वंतरि भगवान ने बताया कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन वे समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे। इस दिन को धन्वंतरि जयंती के रूप में मनाया जाता है।

उन्होंने कहा, “जो व्यक्ति इस दिन आयुर्वेद का अध्ययन करता है, जड़ी-बूटियों का सेवन करता है, और रोगियों की सेवा करता है, उसे मेरा आशीर्वाद मिलता है।”

धन्वंतरि भगवान ने अपने जीवन में अनगिनत लोगों का इलाज किया। उन्होंने सिखाया कि प्रकृति में हर रोग का इलाज मौजूद है, बस उसे पहचानना और सही तरीके से इस्तेमाल करना जरूरी है।

आज भी जब कोई डॉक्टर या वैद्य किसी मरीज का इलाज करता है, तो वह धन्वंतरि भगवान का ही आशीर्वाद है। आयुर्वेद के देवता धन्वंतरि हमेशा उन लोगों की मदद करते हैं जो दूसरों की सेवा करते हैं।

इस प्रकार धन्वंतरि अवतार की कथा हमें सिखाती है कि सच्ची सेवा और ज्ञान से हम किसी भी समस्या का समाधान कर सकते हैं। भगवान विष्णु का यह अवतार आज भी मानवता की भलाई के लिए कार्य कर रहा है।

“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” – यही धन्वंतरि भगवान का संदेश है कि सभी सुखी हों, सभी निरोग हों।

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