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भीष्म प्रतिज्ञा की कहानी – महाभारत की अमर गाथा

बहुत समय पहले की बात है, जब हस्तिनापुर में राजा शांतनु का राज था। वे एक न्यायप्रिय और दयालु राजा थे। उनका एक पुत्र था देवव्रत, जो बाद में भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह भीष्म प्रतिज्ञा की कहानी है जो आज भी हमें त्याग और समर्पण की शिक्षा देती है।

देवव्रत अपने पिता से बहुत प्रेम करता था। वह बचपन से ही बहुत बुद्धिमान, वीर और गुणवान था। गुरु परशुराम से उसने युद्ध कला सीखी थी और वह एक महान योद्धा बन गया था।

एक दिन राजा शांतनु यमुना नदी के किनारे घूमने गए। वहाँ उन्होंने एक अत्यंत सुंदर कन्या को देखा। उस कन्या का नाम सत्यवती था। वह एक मछुआरे की बेटी थी। राजा शांतनु उसके सौंदर्य पर मोहित हो गए और उससे विवाह करना चाहते थे।

राजा शांतनु ने सत्यवती के पिता दाशराज से उसका हाथ माँगा। लेकिन दाशराज ने एक शर्त रखी। उसने कहा, “महाराज, मैं अपनी बेटी का विवाह आपसे तभी करूँगा जब आप वचन दें कि सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा।”

यह सुनकर राजा शांतनु बहुत दुखी हुए। वे अपने प्रिय पुत्र देवव्रत का अधिकार कैसे छीन सकते थे? वे बिना कुछ कहे वापस महल लौट आए। दिन-प्रतिदिन राजा का दुख बढ़ता जा रहा था।

देवव्रत ने अपने पिता की यह दशा देखी। उसने अपने पिता से पूछा, “पिताजी, आप इतने उदास क्यों रहते हैं? क्या कोई समस्या है?”

राजा शांतनु ने अपनी समस्या अपने पुत्र को नहीं बताई। तब देवव्रत ने राज्य के मंत्रियों से पूछा। मंत्रियों ने उसे सारी बात बता दी। यह जानकर कि उसके पिता सत्यवती से प्रेम करते हैं लेकिन उसके कारण परेशान हैं, देवव्रत तुरंत दाशराज के पास गया।

देवव्रत ने दाशराज से कहा, “मैं अपने पिता की खुशी के लिए राजगद्दी का त्याग करता हूँ। सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा।”

लेकिन दाशराज अभी भी संतुष्ट नहीं था। उसने कहा, “यदि तुम राजा नहीं बनोगे तो तुम्हारे पुत्र राज्य पर अधिकार जमा सकते हैं।”

यह सुनकर देवव्रत ने एक और भी बड़ी प्रतिज्ञा की। उसने कहा, “मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा करता हूँ। मैं कभी विवाह नहीं करूँगा और न ही मेरी कोई संतान होगी।”

यह भीष्म प्रतिज्ञा सुनकर आकाश से फूलों की वर्षा हुई। देवताओं ने आकाशवाणी की, “धन्य है देवव्रत! तुम्हारी इस महान प्रतिज्ञा के कारण तुम ‘भीष्म’ कहलाओगे। तुम्हें इच्छा मृत्यु का वरदान मिलता है।”

भीष्म अपने पिता के साथ सत्यवती को लेकर हस्तिनापुर आए। राजा शांतनु ने सत्यवती से विवाह किया। उन्होंने अपने पुत्र के त्याग को देखकर उसे आशीर्वाद दिया कि वह तब तक जीवित रहेगा जब तक वह चाहेगा।

समय बीतने के साथ सत्यवती के दो पुत्र हुए – चित्रांगद और विचित्रवीर्य। चित्रांगद युवावस्था में ही युद्ध में मारा गया। विचित्रवीर्य का विवाह काशी की राजकुमारियों अंबा, अंबिका और अंबालिका से हुआ। लेकिन वह भी जल्दी ही बीमारी से मर गया।

राज्य में कोई उत्तराधिकारी नहीं था। सत्यवती ने भीष्म से कहा कि वे विवाह करके वंश चलाएं। लेकिन भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए मना कर दिया। उन्होंने कहा, “माता, मैं अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकता। यह मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है।”

अंत में व्यास मुनि के आशीर्वाद से धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म हुआ। भीष्म ने इन सभी का पालन-पोषण किया और उन्हें राजकाज सिखाया।

जब महाभारत का युद्ध हुआ, तो भीष्म को कौरवों की तरफ से लड़ना पड़ा। यद्यपि उनका दिल पांडवों के साथ था, फिर भी उन्होंने अपने कर्तव्य का पालन किया। युद्ध में वे शिखंडी के सामने अस्त्र नहीं उठा सके और अर्जुन के बाणों से घायल हो गए।

बाणों की शैया पर लेटे भीष्म ने अपनी मृत्यु का समय स्वयं चुना। उन्होंने उत्तरायण की प्रतीक्षा की और तब प्राण त्यागे। अंत तक उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा का पालन किया।

शिक्षा: भीष्म प्रतिज्ञा की यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम त्याग में है। माता-पिता की खुशी के लिए संतान कितना भी बड़ा त्याग कर सकती है। प्रतिज्ञा का पालन करना और अपने वचन पर दृढ़ रहना जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा है। भीष्म का चरित्र आज भी हमें प्रेरणा देता है कि कैसे व्यक्ति अपने सिद्धांतों पर अडिग रह सकता है।

सच्चा प्रेम त्याग में है और त्याग और समर्पण की शिक्षा हमें महाभारत की कहानियों से मिलती है।

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