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उग्रसेन को राज्य वापसी – कृष्ण की न्याय गाथा
बहुत समय पहले मथुरा नगरी में राजा उग्रसेन का शासन था। वे एक न्यायप्रिय और दयालु राजा थे। प्रजा उनसे बहुत प्रेम करती थी। परंतु उनका पुत्र कंस बहुत ही क्रूर और अत्याचारी था।
एक दिन कंस ने अपने पिता उग्रसेन को बंदी बना लिया और स्वयं मथुरा का राजा बन गया। उग्रसेन को राज्य वापसी का सपना अब केवल एक सपना लग रहा था। कंस ने अपने पिता को कारागार में डाल दिया और प्रजा पर अत्याचार करना शुरू कर दिया।
कंस को एक भविष्यवाणी सुनाई गई थी कि देवकी का आठवां पुत्र उसका वध करेगा। इस डर से उसने देवकी और वासुदेव को भी कारागार में डाल दिया। जब भी देवकी के गर्भ से कोई संतान जन्म लेती, कंस उसे मार देता था।
आठवीं संतान के रूप में भगवान कृष्ण का जन्म हुआ। उसी रात चमत्कारिक रूप से वासुदेव कृष्ण को लेकर गोकुल पहुंच गए और नंद बाबा के घर छोड़ आए। वहां कृष्ण का पालन-पोषण हुआ।
“मैया, मैं कब मथुरा जाऊंगा?” छोटे कृष्ण अक्सर यशोदा मैया से पूछते थे।
“जब समय आएगा बेटा, तब तुम अपना कर्तव्य पूरा करने जाओगे,” यशोदा मैया प्रेम से कहती थीं।
समय बीतता गया और कृष्ण बड़े होते गए। उन्होंने गोकुल में अनेक लीलाएं कीं। पूतना, अघासुर, बकासुर जैसे राक्षसों का वध किया। गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर गोकुलवासियों की रक्षा की।
एक दिन कंस ने कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाया। उसकी योजना थी कि वह कुश्ती के बहाने उन्हें मरवा देगा। परंतु कृष्ण जानते थे कि यह उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण है।
मथुरा पहुंचकर कृष्ण ने सबसे पहले अपने माता-पिता देवकी और वासुदेव से भेंट की। फिर वे कारागार में बंद अपने दादाजी उग्रसेन से मिले।
“दादाजी, आपका पौत्र आ गया है। अब उग्रसेन को राज्य वापसी का समय आ गया है,” कृष्ण ने कहा।
उग्रसेन की आंखों में आंसू आ गए। वे बोले, “बेटा कृष्ण, कंस बहुत शक्तिशाली है। उसके पास महान योद्धा हैं।”
“दादाजी, जहां धर्म होता है, वहां विजय निश्चित है,” कृष्ण ने मुस्कराते हुए कहा।
अगले दिन कुश्ती का आयोजन हुआ। कंस ने चाणूर और मुष्टिक जैसे महान पहलवानों को कृष्ण और बलराम से लड़ने के लिए भेजा। परंतु दोनों भाइयों ने उन्हें हरा दिया।
यह देखकर कंस क्रोधित हो गया। वह स्वयं कृष्ण से लड़ने के लिए आया। भयंकर युद्ध हुआ। अंत में कृष्ण ने कंस का वध कर दिया।
कंस के मरते ही पूरी मथुरा में खुशी की लहर दौड़ गई। कृष्ण तुरंत कारागार गए और अपने दादाजी उग्रसेन को मुक्त कराया। उग्रसेन को राज्य वापसी का स्वप्न साकार हो गया।
“दादाजी, अब आप फिर से मथुरा के राजा हैं। न्याय और धर्म की स्थापना करें,” कृष्ण ने कहा।
उग्रसेन ने कृष्ण को गले लगाया और बोले, “पुत्र, तुमने न केवल मुझे राज्य दिलाया बल्कि धर्म की भी स्थापना की है।”
पूरी प्रजा ने उग्रसेन का स्वागत किया। मथुरा में फिर से शांति और खुशी का माहौल छा गया। उग्रसेन ने न्यायपूर्वक शासन किया और प्रजा सुखी रहने लगी।
इस प्रकार भगवान कृष्ण ने अपने दादाजी उग्रसेन को उनका खोया हुआ राज्य वापस दिलाया। यह कहानी हमें सिखाती है कि सत्य और धर्म की हमेशा विजय होती है। बुराई कितनी भी शक्तिशाली हो, अंत में अच्छाई की ही जीत होती है।
कृष्ण की यह लीला दिखाती है कि हमें अपने बड़ों का सम्मान करना चाहिए और अन्याय के विरुद्ध खड़े होना चाहिए। जब हम धर्म के पथ पर चलते हैं, तो भगवान हमारी सहायता करते हैं। यह कहानी भी हमें सिखाती है कि बुद्धिमानी से काम लेना हमेशा फायदेमंद होता है।












