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रबींद्रनाथ टैगोर: गुरुदेव की प्रेरणादायक कहानी

बहुत समय पहले, सन् 1861 में कलकत्ता के एक प्रसिद्ध परिवार में एक विशेष बालक का जन्म हुआ। इस बालक का नाम था रबींद्रनाथ टैगोर। उनके पिता देवेंद्रनाथ टैगोर एक महान दार्शनिक और समाज सुधारक थे, और माता शारदा देवी एक धार्मिक और संस्कारी महिला थीं।

छोटे रबींद्रनाथ बचपन से ही बहुत कुशाग्र बुद्धि के थे। वे अपने घर के बगीचे में बैठकर प्रकृति को निहारते रहते थे। पेड़-पौधों, फूलों, और पक्षियों को देखकर उनके मन में अनेक भाव उमड़ते रहते थे।

एक दिन की बात है, जब रबींद्रनाथ केवल आठ वर्ष के थे। वे अपने बड़े भाई ज्योतिरिंद्रनाथ के साथ बगीचे में टहल रहे थे।

“भैया, ये फूल इतने सुंदर क्यों हैं?” छोटे रबींद्रनाथ ने पूछा।

“क्योंकि प्रकृति में सुंदरता छुपी हुई है, रबि। जो इसे समझ लेता है, वह कवि बन जाता है,” ज्योतिरिंद्रनाथ ने मुस्कराते हुए कहा।

इस बात ने छोटे रबींद्रनाथ के मन में कविता के बीज बो दिए। वे रोज नई-नई कविताएं लिखने लगे।

जब रबींद्रनाथ चौदह वर्ष के हुए, तो उन्होंने अपनी पहली कविता “भानुसिंह” के नाम से प्रकाशित की। लोग इसे पढ़कर दंग रह गए कि इतनी छोटी उम्र में कोई इतनी सुंदर कविता कैसे लिख सकता है!

समय बीतता गया और रबींद्रनाथ टैगोर एक महान कवि, लेखक, और शिक्षाविद् बने। लेकिन उनके जीवन की सबसे बड़ी चुनौती तब आई जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन कर दिया।

सन् 1905 में जब लॉर्ड कर्जन ने बंगाल को दो हिस्सों में बांटने की घोषणा की, तो पूरे देश में रोष फैल गया। रबींद्रनाथ टैगोर का दिल भी दुख से भर गया।

एक दिन उन्होंने अपने मित्र आनंद मोहन बोस से कहा:

“आनंद, हमें अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठानी होगी। लेकिन हमारा तरीका अलग होगा। हम अहिंसा और एकता के रास्ते चलेंगे।”

रबींद्रनाथ टैगोर ने स्वदेशी आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने लोगों से कहा कि विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करें और अपने देश की चीजों का इस्तेमाल करें।

इसी दौरान उन्होंने एक अद्भुत गीत लिखा – “आमार सोनार बांग्ला” (मेरा सुनहरा बंगाल)। यह गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि बाद में यह बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना।

लेकिन रबींद्रनाथ टैगोर की सबसे बड़ी देन थी “जन गण मन” – हमारा राष्ट्रगान। सन् 1911 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में जब उन्होंने यह गीत गाया, तो सभी लोग भावविभोर हो गए।

“जन गण मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता…”

यह गीत सुनकर लोगों के दिलों में देशभक्ति की भावना जाग उठी।

रबींद्रनाथ टैगोर केवल कवि ही नहीं थे, बल्कि एक महान शिक्षाविद् भी थे। उन्होंने शांतिनिकेतन में एक अनोखा स्कूल बनाया जहां बच्चे प्रकृति के बीच शिक्षा पाते थे।

एक दिन शांतिनिकेतन में एक छोटा बच्चा रो रहा था। रबींद्रनाथ टैगोर उसके पास गए और पूछा:

“क्यों रो रहे हो, बेटे?”

“गुरुजी, मुझे गणित समझ नहीं आता,” बच्चे ने कहा।

रबींद्रनाथ टैगोर मुस्कराए और बोले: “चलो, मैं तुम्हें पेड़ों की पत्तियों से गणित सिखाता हूं।”

उन्होंने बच्चे को प्रकृति के माध्यम से गणित सिखाया। इस तरह उनकी शिक्षा पद्धति बिल्कुल अलग थी।

सन् 1913 में रबींद्रनाथ टैगोर को उनकी पुस्तक “गीतांजलि” के लिए नोबेल पुरस्कार मिला। वे नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय बने। जब यह खबर भारत पहुंची, तो पूरे देश में खुशी की लहर दौड़ गई।

लेकिन रबींद्रनाथ टैगोर का सबसे बड़ा योगदान था राष्ट्रीय एकता में। जब 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ, तो उन्होंने अंग्रेजों द्वारा दी गई “नाइटहुड” की उपाधि वापस कर दी।

उन्होंने वायसराय को पत्र लिखा: “मैं उस सरकार से कोई सम्मान स्वीकार नहीं कर सकता जो निर्दोष लोगों पर गोलियां चलाती है।”

यह घटना ने उन्हें एक सच्चे स्वतंत्रता सेनानी के रूप में स्थापित कर दिया।

रबींद्रनाथ टैगोर का मानना था कि शिक्षा ही सबसे बड़ा हथियार है। उन्होंने कहा था:

“शिक्षा का मतलब केवल किताबी ज्ञान नहीं है, बल्कि जीवन जीने की कला सीखना है।”

उनके शांतिनिकेतन से निकले छात्र आगे चलकर देश के महान नेता बने। इंदिरा गांधी भी उनकी शिक्षा से प्रभावित थीं।

रबींद्रनाथ टैगोर ने अपने जीवन में 2000 से अधिक गीत लिखे, सैकड़ों कहानियां और कविताएं रचीं। उन्होंने चित्रकारी भी की और नाटक भी लिखे।

जब वे बूढ़े हो गए, तो एक दिन उनके एक शिष्य ने पूछा:

“गुरुदेव, आपकी सबसे बड़ी इच्छा क्या है?”

रबींद्रनाथ टैगोर ने आंखें बंद करके कहा: “मैं चाहता हूं कि हमारा भारत स्वतंत्र हो और यहां के बच्चे खुशी से पढ़-लिख सकें।”

7 अगस्त 1941 को 80 वर्ष की आयु में गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर ने इस संसार को अलविदा कह दिया। लेकिन उनकी रचनाएं और उनके विचार आज भी हमारे दिलों में जिंदा हैं।

आज भी जब हम “जन गण मन” गाते हैं, तो हमें गुरुदेव की याद आती है। उन्होंने हमें सिखाया कि सच्ची देशभक्ति केवल नारे लगाने में नहीं, बल्कि अपने कर्मों से देश की सेवा करने में है।

शिक्षा: रबींद्रनाथ टैगोर की कहानी हमें सिखाती है कि ज्ञान, कला, और संस्कार के द्वारा हम अपने देश की सबसे बड़ी सेवा कर सकते हैं। उन्होंने दिखाया कि एक सच्चा देशभक्त वह है जो अपनी प्रतिभा का उपयोग समाज की भलाई के लिए करता है। आज भी हमें उनके आदर्शों पर चलना चाहिए और शिक्षा, कला, और संस्कृति के माध्यम से अपने देश को आगे बढ़ाना चाहिए। समाज सुधारक की कहानियों से प्रेरणा लेते हुए हमें अपने समाज में बदलाव लाना चाहिए।

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