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हातिम ताई का तिलिस्मी जंगल और सुनहरा खजाना
बहुत समय पहले की बात है, जब दुनिया में जादू और तिलिस्म का राज था। उस समय हातिम ताई नाम का एक बहादुर और दयालु योद्धा रहता था। वह अपनी वीरता और न्याय के लिए पूरे अरब में प्रसिद्ध था।
एक दिन हातिम ताई के पास एक बूढ़ा व्यापारी आया। उसकी आँखों में आँसू थे और चेहरे पर गहरी चिंता की लकीरें थीं। “हे महान हातिम ताई!” वह रोते हुए बोला, “मेरी बेटी को एक दुष्ट जादूगर ने अपने तिलिस्मी जंगल में कैद कर लिया है। कृपया उसे बचा लीजिए!”
हातिम ताई का दिल पिघल गया। वह तुरंत बोला, “चिंता मत करो, मैं तुम्हारी बेटी को जरूर बचाऊंगा। बताओ, यह तिलिस्मी जंगल कहाँ है?”
बूढ़े व्यापारी ने कांपती आवाज में कहा, “वह जंगल यहाँ से सात दिन की यात्रा पर है। लेकिन सावधान रहना, उस जंगल में अनेक खतरे छुपे हुए हैं। जादूगर ने वहाँ ऐसे तिलिस्म बिछाए हैं कि कोई भी व्यक्ति आसानी से वापस नहीं लौट सकता।”
हातिम ताई ने अपनी तलवार कमर में बांधी, अपने विश्वसनीय घोड़े पर सवार हुआ और हातिम ताई का तिलिस्मी जंगल की खोज में निकल पड़ा। रास्ते में उसे कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन उसका साहस कभी नहीं टूटा।
सातवें दिन, हातिम ताई एक अजीब जंगल के सामने पहुंचा। यह जंगल बिल्कुल अलग था – यहाँ के पेड़ सुनहरे रंग के थे, फूल चांदी की तरह चमकते थे, और हवा में एक अजीब सी मिठास थी। “यही है हातिम ताई का तिलिस्मी जंगल!” वह मन में सोचा।
जैसे ही हातिम ताई जंगल में प्रवेश किया, अचानक रास्ता गायब हो गया। चारों तरफ घने पेड़ और झाड़ियाँ दिखाई देने लगीं। तभी एक मधुर आवाज सुनाई दी, “कौन है जो हमारे तिलिस्मी जंगल में आने का साहस कर रहा है?”
हातिम ताई ने देखा कि एक सुंदर परी उसके सामने खड़ी है। परी के पंख इंद्रधनुष की तरह रंग-बिरंगे थे। “मैं हातिम ताई हूँ,” उसने विनम्रता से कहा, “मैं एक मासूम लड़की को बचाने आया हूँ जिसे दुष्ट जादूगर ने कैद किया है।”
परी मुस्कराई और बोली, “तुम्हारा दिल साफ है, हातिम ताई। लेकिन इस तिलिस्मी जंगल में आगे बढ़ने के लिए तुम्हें तीन परीक्षाओं से गुजरना होगा। पहली परीक्षा है – लालच पर विजय।”
अचानक हातिम ताई के सामने सोने-चांदी का एक विशाल खजाना प्रकट हुआ। हीरे-जवाहरात की चमक से पूरा जंगल जगमगा उठा। एक आवाज गूंजी, “यह सब तुम्हारा है, बस इसे उठा लो और वापस चले जाओ।”
लेकिन हातिम ताई ने खजाने की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखा। वह बोला, “मैं यहाँ किसी मासूम की जान बचाने आया हूँ, खजाने के लिए नहीं।” खजाना तुरंत गायब हो गया और परी खुशी से मुस्कराई।
“दूसरी परीक्षा है – डर पर विजय,” परी ने कहा। तुरंत ही जंगल में अंधेरा छा गया और भयानक राक्षसों की आवाजें सुनाई देने लगीं। विशालकाय सांप और खूंखार शेर हातिम ताई को घेरने लगे।
हातिम ताई ने अपनी तलवार निकाली, लेकिन फिर रुक गया। उसने समझ लिया कि यह सब माया है। वह शांत होकर बोला, “मैं किसी भी डर के आगे नहीं झुकूंगा। सच्चाई और न्याय मेरे साथ हैं।” सभी राक्षस और जानवर तुरंत गायब हो गए।
“तीसरी और अंतिम परीक्षा है – क्रोध पर नियंत्रण,” परी ने कहा। अचानक हातिम ताई के सामने वही दुष्ट जादूगर प्रकट हुआ जिसने लड़की को कैद किया था। जादूगर ने हातिम ताई का अपमान करना शुरू किया और उसे भला-बुरा कहने लगा।
हातिम ताई का गुस्सा भड़का, लेकिन उसने अपने आप को संयम में रखा। वह शांत स्वर में बोला, “मैं तुमसे लड़ने नहीं, बल्कि उस मासूम को बचाने आया हूँ। अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें भी सही रास्ता दिखा सकता हूँ।”
यह सुनकर जादूगर का रूप बदल गया और वह भी एक परी बन गई। दोनों परियों ने हातिम ताई से कहा, “तुमने सभी परीक्षाओं में सफलता पाई है। तुम्हारा दिल सच में साफ है।”
तभी हातिम ताई का तिलिस्मी जंगल में एक सुनहरा महल प्रकट हुआ। महल के अंदर वह लड़की सुरक्षित बैठी थी, लेकिन वह उदास थी। हातिम ताई ने उससे पूछा, “तुम उदास क्यों हो? अब तो तुम मुक्त हो।”
लड़की ने कहा, “यहाँ कोई दुष्ट जादूगर नहीं था। मैं अपने लालच के कारण यहाँ फंस गई थी। मैंने सुना था कि इस जंगल में बहुत खजाना है, इसलिए मैं यहाँ आई थी। लेकिन जब मैंने खजाना देखा तो मैं लालच में अंधी हो गई और यहीं फंस गई।”
हातिम ताई समझ गया कि यह सब एक परीक्षा थी। परियों ने उसे बताया, “यह तिलिस्मी जंगल उन लोगों की परीक्षा लेता है जो यहाँ आते हैं। जो लालच, डर और क्रोध पर विजय पा लेते हैं, वे यहाँ से मुक्त हो जाते हैं।”
हातिम ताई ने लड़की को समझाया, “बेटी, सच्चा खजाना सोने-चांदी में नहीं, बल्कि अच्छे कर्मों और साफ दिल में होता है। लालच हमेशा दुख लाता है।”
लड़की ने अपनी गलती मानी और हातिम ताई से माफी मांगी। परियों ने खुश होकर दोनों को जंगल से बाहर का रास्ता दिखाया। जाते समय उन्होंने हातिम ताई को एक जादुई अंगूठी दी और कहा, “यह अंगूठी तुम्हें हमेशा सच्चाई का रास्ता दिखाएगी।”
हातिम ताई और लड़की सुरक्षित घर वापस पहुंचे। बूढ़े व्यापारी ने अपनी बेटी को देखकर खुशी के आंसू बहाए। उसने हातिम ताई को धन्यवाद दिया और कहा, “आप सच में एक महान योद्धा हैं।”
हातिम ताई ने मुस्कराते हुए कहा, “असली वीरता दूसरों की मदद करने में है, अपनी शक्ति दिखाने में नहीं। और सबसे बड़ी जीत अपने मन के लालच, डर और क्रोध पर विजय पाना है।”
इस तरह हातिम ताई का तिलिस्मी जंगल का यह रोमांचक किस्सा समाप्त हुआ। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चा वीर वही है जो दूसरों की भलाई के लिए अपनी जान की परवाह नहीं करता और अपने मन पर नियंत्रण रखता है। लालच, डर और क्रोध से बचकर हमें हमेशा सच्चाई और न्याय का साथ देना चाहिए।
















