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अगतसुर का वध – श्री कृष्ण की वीरता की कहानी
बहुत समय पहले की बात है, जब भगवान श्री कृष्ण अपने सखाओं के साथ वृंदावन की हरी-भरी भूमि पर गायों को चराया करते थे। उस समय कृष्ण जी की आयु मात्र सात वर्ष की थी, परंतु उनमें दिव्य शक्तियां विद्यमान थीं।
एक दिन प्रातःकाल का समय था। सूर्य देव अपनी स्वर्णिम किरणों से धरती को नहला रहे थे। कृष्ण अपने प्रिय सखा बलराम और अन्य ग्वाल-बालों के साथ गायों को लेकर जंगल की ओर निकले। वे सभी अपनी मधुर आवाज में गीत गाते हुए और हंसी-खुशी से बातें करते हुए आगे बढ़ रहे थे।
“आज हम किस दिशा में जाएंगे कन्हैया?” एक ग्वाल-बाल ने पूछा।
“चलो मित्रों, आज हम यमुना के उस पार वाले वन में चलते हैं। वहां की हरी घास गायों को बहुत पसंद आएगी,” कृष्ण ने मुस्कराते हुए कहा।
जैसे ही वे सभी यमुना नदी के किनारे पहुंचे, अचानक आकाश में काले बादल छा गए। हवा तेज चलने लगी और पेड़-पौधे हिलने लगे। सभी ग्वाल-बाल डर गए और एक-दूसरे के पास आ गए।
तभी अचानक एक विशालकाय अजगर प्रकट हुआ। यह कोई साधारण सांप नहीं था, बल्कि राक्षस अगतसुर था जो सांप का रूप धारण करके आया था। उसका शरीर इतना लंबा था कि उसका सिर पहाड़ की चोटी तक पहुंचता था और पूंछ दूर तक फैली हुई थी।
अगतसुर का मुंह एक विशाल गुफा की तरह खुला था। उसकी लाल आंखें आग की तरह जल रही थीं और उसकी सांस से जहरीली हवा निकल रही थी।
“हे बालकों! मैं अगतसुर हूं। मैं बहुत भूखा हूं। तुम सभी मेरे मुंह में आ जाओ, मैं तुम्हें खा जाऊंगा,” राक्षस ने गर्जना की।
सभी ग्वाल-बाल भयभीत हो गए। वे कांपने लगे और कृष्ण के पास आकर छुप गए। गायें भी डर से रंभाने लगीं।
“डरो मत मित्रों। मैं हूं न यहां। यह दुष्ट राक्षस हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता,” कृष्ण ने अपने सखाओं को धैर्य बंधाया।
परंतु अगतसुर बहुत चालाक था। उसने अपना मुंह और भी चौड़ा कर लिया और एक मीठी सुगंध छोड़ी। इस सुगंध से सभी ग्वाल-बालों को लगा जैसे यह कोई सुंदर फूलों से भरा बगीचा हो।
“देखो मित्रों, यह कितना सुंदर स्थान है। चलो इसमें चलकर खेलते हैं,” एक ग्वाल-बाल ने कहा।
कृष्ण समझ गए कि यह राक्षस का जाल है। उन्होंने तुरंत अपने दिव्य ज्ञान से अगतसुर की चाल को पहचान लिया।
“रुको सखाओं! यह कोई बगीचा नहीं, बल्कि उस दुष्ट राक्षस का मुंह है। वह हमें धोखा दे रहा है,” कृष्ण ने चेतावनी दी।
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अगतसुर ने अपनी सांस की शक्ति से सभी ग्वाल-बालों और गायों को अपने मुंह में खींच लिया। केवल कृष्ण बाहर रह गए थे।
कृष्ण के हृदय में अपने प्रिय सखाओं के लिए चिंता हुई। उन्होंने सोचा कि अब क्या करना चाहिए।
“हे दुष्ट अगतसुर! तूने मेरे प्रिय मित्रों को कैद कर लिया है। अब मैं तुझे सबक सिखाऊंगा,” कृष्ण ने दृढ़ता से कहा।
यह कहकर कृष्ण भी अगतसुर के मुंह में चले गए। राक्षस बहुत खुश हुआ कि उसे अपना मुख्य शिकार मिल गया।
अगतसुर के पेट के अंदर अंधेरा था। सभी ग्वाल-बाल डरे हुए थे और रो रहे थे। गायें भी परेशान थीं।
“कन्हैया, अब हमारा क्या होगा? हम यहां से कैसे निकलेंगे?” एक सखा ने पूछा।
“चिंता मत करो मित्र। अब मैं इस दुष्ट का अंत करूंगा,” कृष्ण ने कहा।
अब कृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति का प्रयोग किया। उन्होंने अपने शरीर का आकार बढ़ाना शुरू किया। वे इतने बड़े हो गए कि अगतसुर के गले में अटक गए।
राक्षस को सांस लेने में कठिनाई होने लगी। उसका गला घुटने लगा। वह तड़पने लगा और जमीन पर लोटने लगा।
“अब समझा दुष्ट! निर्दोष बालकों को सताने का यही फल होता है,” कृष्ण ने कहा।
अगतसुर की सांस रुकने लगी। उसकी आंखें बाहर निकलने लगीं। अंततः अगतसुर का वध हो गया और वह मर गया।
जैसे ही राक्षस मरा, उसका मुंह खुल गया और सभी ग्वाल-बाल तथा गायें बाहर निकल आईं। सभी खुशी से नाचने लगे।
“जय हो कन्हैया! आपने हमारी रक्षा की। आप सच में भगवान हैं,” सभी सखाओं ने एक साथ कहा।
आकाश से देवताओं ने फूलों की वर्षा की। पूरा वन खुशी से गूंज उठा। पक्षी चहकने लगे और हवा में मधुर सुगंध फैल गई।
इस प्रकार भगवान कृष्ण ने अगतसुर का वध करके अपने प्रिय सखाओं की रक्षा की।
जब वे सभी वापस गोकुल पहुंचे तो माता यशोदा और नंद बाबा को पूरी कहानी सुनाई। सभी ग्रामवासी कृष्ण की वीरता की प्रशंसा करने लगे।
शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि बुराई पर हमेशा अच्छाई की जीत होती है। हमें कभी भी धोखेबाजों के जाल में नहीं फंसना चाहिए और मुसीबत के समय धैर्य रखना चाहिए। भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। इससे जुड़ी एक और कहानी में भी हमें धैर्य और बुद्धिमानी की सीख मिलती है।












