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चोर ज़ोर-ज़ोर से क्यों रोया और फिर हँसा? – बेताल पच्चीसी – चौदहवीं कहानी
राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लिए हुए श्मशान से निकलकर तांत्रिक के पास जा रहे थे। रास्ते में बेताल ने फिर से एक कहानी सुनाने की इच्छा प्रकट की।
“राजन्! सुनिए एक और रोचक कथा।” बेताल ने कहा। “यदि आप इसका उत्तर जानते हुए भी नहीं देंगे, तो आपका सिर फट जाएगा।”
विक्रमादित्य मौन रहे और बेताल ने अपनी कहानी आरंभ की।
“प्राचीन काल में कल्याणपुर नामक एक समृद्ध नगर था। वहाँ धनदत्त नाम का एक धनी सेठ रहता था। उसके पास अपार संपत्ति थी – सोने-चाँदी के भंडार, हीरे-जवाहरात और महंगे वस्त्र।”
एक रात्रि में चंद्रगुप्त नामक एक चतुर चोर धनदत्त के घर में चोरी करने पहुँचा। वह दीवार फाँदकर भीतर घुसा और सेठ के खजाने की तलाश में लगा।
अचानक उसे एक कमरे से आवाज़ सुनाई दी। वह चुपचाप उस कमरे के पास गया और देखा कि सेठ धनदत्त अपनी पत्नी से बात कर रहा था।
“प्रिये! कल मैं एक बड़ा व्यापार करने जा रहा हूँ। यदि यह सफल हो गया तो हमारी संपत्ति दोगुनी हो जाएगी।” सेठ ने कहा।
“किंतु स्वामी, यदि यह व्यापार असफल हो गया तो?” पत्नी ने चिंता से पूछा।
“तो हम कंगाल हो जाएंगे। मैंने अपनी सारी संपत्ति इस व्यापार में लगा दी है।” सेठ ने उदासी से कहा।
यह सुनकर चोर चंद्रगुप्त के मन में दया आ गई। उसने सोचा – “यदि मैं इस समय चोरी करूँगा और कल इनका व्यापार असफल हो गया, तो यह परिवार भूखा मर जाएगा।”
चोर ने निर्णय लिया कि वह चोरी नहीं करेगा। वह वापस जाने लगा, लेकिन अचानक उसका पैर एक बर्तन से टकरा गया और आवाज़ हुई।
सेठ धनदत्त जाग गया और चिल्लाया – “चोर! चोर! पकड़ो इसे!”
नौकरों ने चंद्रगुप्त को पकड़ लिया। सुबह होते ही उसे राजा के दरबार में पेश किया गया।
“तुमने चोरी क्यों की?” राजा ने पूछा।
“महाराज! मैंने कोई चोरी नहीं की है।” चंद्रगुप्त ने कहा।
“तो फिर तुम सेठ के घर में क्या कर रहे थे?”
चंद्रगुप्त ने सारी बात बताई कि कैसे उसने सेठ की बातें सुनकर दया के कारण चोरी नहीं की।
राजा ने सेठ से पूछा तो उसने भी पुष्टि की कि वास्तव में कुछ भी चोरी नहीं हुई थी।
यह सुनकर चंद्रगुप्त ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। “हाय! मैं कितना मूर्ख हूँ। मैंने अपना धर्म छोड़ दिया। एक चोर का धर्म है चोरी करना, लेकिन मैंने दया दिखाकर अपना धर्म भंग किया।”
फिर अचानक वह हँसने लगा। “लेकिन मैं खुश हूँ कि मैंने एक निर्दोष परिवार को बर्बाद होने से बचाया। भले ही मैं चोर हूँ, लेकिन मेरे दिल में दया है।”
राजा इस घटना से बहुत प्रभावित हुआ। उसने चंद्रगुप्त को मुक्त कर दिया और उसे अपने राज्य में एक सम्मानजनक काम दिया।
सेठ धनदत्त का व्यापार सफल हुआ और वह और भी धनी बन गया। उसने चंद्रगुप्त की दयालुता को याद करते हुए उसे उपहार भी दिए।
कहानी समाप्त करके बेताल ने पूछा – “राजा विक्रमादित्य! बताइए कि चोर ज़ोर-ज़ोर से क्यों रोया और फिर हँसा? यदि आप जानते हुए भी उत्तर नहीं देंगे तो आपका सिर फट जाएगा।”
विक्रमादित्य ने उत्तर दिया – “बेताल! चोर पहले इसलिए रोया कि उसने अपना धर्म छोड़ दिया था। एक चोर का धर्म चोरी करना है, लेकिन उसने दया दिखाकर चोरी नहीं की। फिर वह इसलिए हँसा कि उसे खुशी हुई कि उसके दिल में दया और करुणा है, जो उसे एक अच्छा इंसान बनाती है।”
“सही उत्तर!” बेताल ने कहा और फिर से पेड़ पर जा लटका।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि दया और करुणा सबसे बड़े धर्म हैं। चाहे व्यक्ति कैसा भी हो, यदि उसके दिल में दया है तो वह सुधर सकता है।
इस कहानी के समान समझदार बंदर की कहानी भी हमें दया और करुणा का महत्व सिखाती है।
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कहानी में चोर की दयालुता हमें यह भी याद दिलाती है कि व्यापारी का उदय और पतन भी एक महत्वपूर्ण शिक्षा है।










