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किसका पुण्य बड़ा – बेताल पच्चीसी सातवीं कहानी
राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लिए हुए श्मशान की ओर चले जा रहे थे। रास्ते में बेताल ने फिर से एक कहानी सुनाने की इच्छा प्रकट की।
“राजन्! सुनिए एक और रोचक कथा।” बेताल ने कहा।
विक्रम मौन रहकर सुनने लगे।
बेताल की कहानी:
प्राचीन काल में कल्याणपुर नामक एक सुंदर नगर था। वहाँ राजा धर्मवीर का शासन था। उस नगर में तीन मित्र रहते थे – धनपाल, विद्यासागर और दानवीर।
धनपाल एक धनी व्यापारी था जो अपनी संपत्ति का उपयोग गरीबों की सहायता के लिए करता था। विद्यासागर एक महान विद्वान था जो निःशुल्क शिक्षा देता था। दानवीर एक साधारण किसान था जो अपनी मेहनत की कमाई से भूखों को भोजन कराता था।
एक दिन नगर में भयंकर अकाल पड़ा। लोग भूख से तड़पने लगे। तीनों मित्रों ने अपने-अपने तरीके से लोगों की सहायता करने का निश्चय किया।
धनपाल ने अपने धन से अनाज खरीदकर गरीबों में बाँटा। उसने अपना आधा खजाना खर्च कर दिया।
विद्यासागर ने अपनी विद्या का उपयोग करके वर्षा के लिए यज्ञ किया। उसने दिन-रात मंत्रों का जाप किया और देवताओं से प्रार्थना की।
दानवीर ने अपना एकमात्र बैल बेचकर अनाज खरीदा और भूखे बच्चों को खिलाया। उसके पास अब कुछ भी नहीं बचा था।
कुछ दिनों बाद आकाश से देवदूत उतरे। उन्होंने तीनों मित्रों के कार्यों को देखा था।
“हे धर्मात्माओं!” देवदूत ने कहा, “आप तीनों ने महान कार्य किए हैं। परंतु हमें यह निर्णय करना है कि इनमें से किसका पुण्य सबसे बड़ा है।”
पहले देवदूत ने कहा – “धनपाल का पुण्य सबसे बड़ा है क्योंकि उसने अपना धन त्यागकर हजारों लोगों की जान बचाई।”
दूसरे देवदूत ने कहा – “विद्यासागर का पुण्य महान है क्योंकि उसकी विद्या से वर्षा हुई और सभी का कल्याण हुआ।”
तीसरे देवदूत ने कहा – “दानवीर का पुण्य सर्वोपरि है क्योंकि उसने अपना सब कुछ त्यागकर भी दूसरों की सेवा की।”
तीनों देवदूत इस बात पर विवाद करने लगे कि किसका पुण्य बड़ा है। तभी आकाशवाणी हुई:
“सभी के पुण्य महान हैं, परंतु दानवीर का पुण्य सबसे बड़ा है। क्योंकि धनपाल के पास धन था, विद्यासागर के पास विद्या थी, परंतु दानवीर के पास कुछ भी नहीं था फिर भी उसने त्याग किया।”
यह सुनकर तीनों देवदूत दानवीर को स्वर्ग ले गए।
कहानी समाप्त करके बेताल ने पूछा – “राजा विक्रम! बताइए, वास्तव में किसका पुण्य बड़ा था और क्यों?”
विक्रम ने सोचा – यदि मैं उत्तर दूंगा तो बेताल फिर उड़ जाएगा, परंतु यदि नहीं दूंगा तो मेरा सिर फट जाएगा।
अंततः विक्रम ने कहा – “बेताल! आकाशवाणी सत्य थी। दानवीर का पुण्य सबसे बड़ा था। क्योंकि त्याग की महत्ता इस बात में नहीं है कि हमने कितना दिया, बल्कि इस बात में है कि हमारे पास कितना था और हमने कितना त्यागा।”
“धनपाल ने आधा धन दिया, विद्यासागर ने अपनी विद्या का उपयोग किया, परंतु दानवीर ने अपना सब कुछ दे दिया। जिसके पास कम है और वह सब कुछ दे दे, उसका त्याग सबसे महान होता है।”
विक्रम के उत्तर देते ही बेताल हंसकर फिर से पेड़ पर जा लटका। विक्रम को पुनः उसे लाने जाना पड़ा।
शिक्षा: सच्चा पुण्य और त्याग इस बात में नहीं है कि हमने कितना दिया, बल्कि इस बात में है कि हमारी क्षमता के अनुपात में हमने कितना त्यागा। छोटा त्याग भी यदि पूरे मन से किया जाए तो वह बड़े त्याग से भी महान हो सकता है।
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