Summarize this Article with:

शिव पार्वती विवाह की अद्भुत कथा
बहुत समय पहले की बात है, जब देवताओं और असुरों के बीच निरंतर युद्ध चलता रहता था। उस समय एक महान असुर राजा था तारकासुर, जिसने ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया था कि उसे केवल भगवान शिव का पुत्र ही मार सकता है।
तारकासुर जानता था कि भगवान शिव तो सदा ध्यान में लीन रहते हैं और उनका कोई पुत्र नहीं है। इसलिए वह निडर होकर तीनों लोकों में अत्याचार करने लगा। देवताओं की स्थिति बहुत दयनीय हो गई थी।
इधर हिमालय राज के घर में एक अत्यंत सुंदर कन्या का जन्म हुआ था, जिसका नाम था पार्वती। वह वास्तव में माता सती का ही पुनर्जन्म थी। बचपन से ही पार्वती जी का मन भगवान शिव की भक्ति में लगा रहता था।
जब पार्वती जी युवा हुईं, तो उन्होंने अपने पिता से कहा, “पिता जी, मैं केवल भगवान शिव से ही विवाह करूंगी। कृपया मुझे उनकी तपस्या करने की अनुमति दें।”
हिमालय राज ने अपनी प्रिय पुत्री की बात मान ली। पार्वती जी ने कठोर तपस्या आरंभ की। वे दिन-रात भगवान शिव का ध्यान करतीं, फल-फूल त्यागकर केवल पत्ते खातीं, फिर वे भी छोड़ दिए।
इधर देवताओं की समस्या बढ़ती जा रही थी। वे सभी ब्रह्मा जी के पास गए और अपनी व्यथा सुनाई। ब्रह्मा जी ने कहा, “केवल शिव पार्वती विवाह से ही तुम्हारी समस्या का समाधान हो सकता है। उनके पुत्र ही तारकासुर का वध कर सकते हैं।”
तब देवताओं ने कामदेव से प्रार्थना की कि वे भगवान शिव के मन में प्रेम जगाएं। कामदेव अपनी पत्नी रति के साथ कैलाश पर्वत पहुंचे।
जब भगवान शिव ध्यान में बैठे थे, कामदेव ने अपना प्रेम बाण चलाया। भगवान शिव की समाधि टूट गई और वे क्रोधित हो गए। उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोला और कामदेव भस्म हो गए।
रति देवी रोने लगीं। भगवान शिव ने उन्हें आश्वासन दिया, “चिंता मत करो रति! जब मेरा विवाह होगा, तब कामदेव पुनः जीवित हो जाएंगे।”
पार्वती जी की तपस्या देखकर सप्तर्षि प्रभावित हुए। वे भगवान शिव के पास गए और बोले, “प्रभु, हिमालय की पुत्री पार्वती आपकी कठोर तपस्या कर रही हैं। आप उनकी परीक्षा लें।”
भगवान शिव एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके पार्वती जी के पास आए। उन्होंने कहा, “बेटी, तुम इतनी सुंदर हो, किसी अच्छे राजकुमार से विवाह क्यों नहीं कर लेतीं? शिव तो जटाधारी हैं, उनके गले में सांप हैं, वे श्मशान में रहते हैं।”
पार्वती जी ने दृढ़ता से उत्तर दिया, “ब्राह्मण देव, आप भगवान शिव को नहीं जानते। वे सर्वगुण संपन्न हैं, त्रिलोकीनाथ हैं। मैं केवल उन्हीं से विवाह करूंगी।”
भगवान शिव पार्वती जी की भक्ति और दृढ़ता देखकर प्रसन्न हो गए। वे अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और बोले, “पार्वती, मैं तुम्हारी तपस्या से प्रभावित हूं। मैं तुमसे विवाह करने को तैयार हूं।”
पार्वती जी की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने भगवान शिव के चरणों में प्रणाम किया।
हिमालय राज को जब यह समाचार मिला, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने शिव पार्वती विवाह की तैयारियां आरंभ कर दीं। सभी देवता, ऋषि-मुनि और गंधर्व इस शुभ अवसर पर आमंत्रित किए गए।
विवाह के दिन भगवान शिव अपनी विचित्र बारात लेकर आए। उनके साथ भूत-प्रेत, गण और सर्प थे। यह देखकर पार्वती जी की माता मैना देवी घबरा गईं।
परंतु पार्वती जी ने अपनी माता को समझाया, “माता जी, भगवान शिव के ये सभी गण उनके प्रिय हैं। हमें इनका स्वागत करना चाहिए।”
इस प्रकार अत्यंत धूमधाम से शिव पार्वती विवाह संपन्न हुआ। ब्रह्मा जी ने विवाह कराया, विष्णु भगवान ने आशीर्वाद दिया। सभी देवताओं ने पुष्प वर्षा की।
विवाह के बाद भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर्वत पर निवास करने लगे। कुछ समय बाद उनके यहां एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम कार्तिकेय था।
कार्तिकेय ने बड़े होकर तारकासुर का वध किया और देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई। इस प्रकार शिव पार्वती विवाह से न केवल दो महान आत्माओं का मिलन हुआ, बल्कि संसार की रक्षा भी हुई।
बाद में माता पार्वती के दूसरे पुत्र गणेश का भी जन्म हुआ, जो विघ्न हर्ता के नाम से प्रसिद्ध हुए।
इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची भक्ति और दृढ़ संकल्प से भगवान अवश्य प्रसन्न होते हैं। माता पार्वती की तरह यदि हम भी पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान की आराधना करें, तो वे हमारी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
शिव पार्वती विवाह की यह पावन कथा आज भी हमें प्रेम, त्याग और भक्ति का संदेश देती है। यह दिखाती है कि सच्चा प्रेम कैसे सभी बाधाओं को पार कर जाता है।











