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अंजना का तप और वरदान – हनुमान जी की जन्म कथा

बहुत समय पहले की बात है, जब देवताओं और राक्षसों के बीच युद्ध चलते रहते थे। उस समय स्वर्ग में एक सुंदर अप्सरा रहती थी जिसका नाम पुंजिकस्थला था। वह अपनी सुंदरता और नृत्य कला के लिए प्रसिद्ध थी।

एक दिन ब्रह्मा जी के दरबार में जब पुंजिकस्थला नृत्य कर रही थी, तो अचानक हवा के कारण उसका वस्त्र हिल गया। इस पर वह शर्म से हंस पड़ी। ब्रह्मा जी को यह अच्छा नहीं लगा और उन्होंने कहा, “तुमने मेरे सामने हंसने का दुस्साहस किया है। इसके लिए तुम्हें पृथ्वी पर वानर योनि में जन्म लेना होगा।”

पुंजिकस्थला ने हाथ जोड़कर क्षमा मांगी। ब्रह्मा जी का हृदय पिघल गया और उन्होंने कहा, “जब तुम्हारा पुत्र भगवान शिव का अवतार होगा, तब तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी।”

इस प्रकार पुंजिकस्थला का जन्म पृथ्वी पर अंजना नाम की वानर कन्या के रूप में हुआ। वह अत्यंत सुंदर और गुणवान थी। समय आने पर उसका विवाह वानर राज केसरी से हुआ।

विवाह के बाद कई वर्ष बीत गए, परंतु अंजना को संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ। इससे वह बहुत दुखी रहती थी। एक दिन उसे एक महात्मा मिले जिन्होंने कहा, “हे देवी! यदि तुम सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करो, तो अवश्य ही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।”

अंजना का तप आरंभ हुआ। वह प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर गंगा में स्नान करती, फिर पर्वत की चोटी पर जाकर भगवान शिव की पूजा करती। वह दिन-रात “ॐ नमः शिवाय” का जाप करती रहती। कभी-कभी वह भोजन तक नहीं करती थी।

अंजना के कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे दर्शन दिए। उन्होंने कहा, “हे अंजना! तुम्हारी भक्ति से मैं अत्यंत प्रसन्न हूं। मांगो, क्या चाहिए तुम्हें?”

अंजना ने हाथ जोड़कर कहा, “हे प्रभु! मुझे एक ऐसा पुत्र चाहिए जो आपका अंश हो, जो धर्म की रक्षा करे और भक्तों का कल्याण करे।”

भगवान शिव मुस्कराए और बोले, “तथास्तु! तुम्हें एक ऐसा पुत्र प्राप्त होगा जो मेरा अवतार होगा। वह अत्यंत बलवान, बुद्धिमान और भक्त होगा। उसका नाम हनुमान होगा और वह भगवान राम का परम भक्त बनेगा।”

इसी समय भगवान राम अयोध्या में राजा दशरथ के यहां जन्म लेने वाले थे। देवताओं ने सोचा कि राम जी की सेवा के लिए एक महान भक्त की आवश्यकता होगी।

एक दिन जब अंजना पूजा कर रही थी, तो पवन देव वहां से गुजरे। वे अंजना की भक्ति देखकर प्रभावित हुए। उन्होंने भी अंजना को वरदान दिया कि उसका पुत्र वायु की तरह तेज होगा और आकाश में उड़ सकेगा।

समय आने पर अंजना के गर्भ में एक दिव्य बालक का जन्म हुआ। यह बालक और कोई नहीं, स्वयं हनुमान जी थे। जन्म के समय ही उनमें अद्भुत शक्ति थी।

जब हनुमान जी का जन्म हुआ, तो आकाश में देवताओं ने फूल बरसाए। सभी दिशाओं से शुभ ध्वनि आई। अंजना की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसका तप और वरदान सफल हो गया था।

बालक हनुमान बचपन से ही अद्भुत लीलाएं करते थे। एक दिन उन्होंने सूर्य को फल समझकर खाने की कोशिश की। इससे सभी देवता घबरा गए। इंद्र ने अपना वज्र फेंका जो हनुमान जी की ठुड्डी पर लगा। इसीलिए उनका नाम हनुमान पड़ा।

अंजना ने अपने पुत्र को समझाया, “बेटा! तुम्हारा जन्म धर्म की रक्षा के लिए हुआ है। तुम्हें भगवान राम की सेवा करनी है और संसार का कल्याण करना है।”

हनुमान जी ने माता के चरण स्पर्श किए और कहा, “माता! आपके आशीर्वाद से मैं सदा धर्म के पथ पर चलूंगा और भक्तों की रक्षा करूंगा।”

इस प्रकार अंजना के तप और वरदान से हनुमान जी का जन्म हुआ। आज भी जब कोई भक्त सच्चे मन से हनुमान जी की पूजा करता है, तो उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

शिक्षा: इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि सच्ची भक्ति और धैर्य से की गई तपस्या कभी व्यर्थ नहीं जाती। अंजना माता की तरह यदि हम भी पूर्ण श्रद्धा से भगवान की आराधना करें, तो हमारी भी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

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