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योगी पहले क्यों रोया, फिर क्यों हँसा? बेताल पच्चीसी – तेईसवीं कहानी

राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लिए हुए श्मशान की ओर चले जा रहे थे। रास्ते में बेताल ने फिर से अपनी मधुर आवाज़ में कहा, “हे राजन्! आज मैं तुम्हें एक अनोखी कहानी सुनाता हूँ। सुनो और बताओ कि योगी पहले क्यों रोया, फिर क्यों हँसा?

“बहुत समय पहले की बात है। कालिंदी नगर में एक महान योगी रहते थे। उनका नाम था महर्षि कश्यप। वे अपनी तपस्या और ज्ञान के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। उनके पास अनेक शिष्य आते थे ज्ञान प्राप्त करने के लिए।”

“एक दिन की बात है। योगी जी अपने आश्रम में ध्यान में लीन थे। तभी वहाँ एक युवक आया। उसका नाम था देवदत्त। वह बहुत ही सुंदर और बुद्धिमान था। उसने योगी जी के चरणों में प्रणाम किया और बोला, ‘गुरुदेव! मैं आपसे ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ।'”

“योगी जी ने उसे अपना शिष्य बना लिया। देवदत्त बहुत ही मेधावी था। वह जो भी सिखाया जाता, तुरंत सीख जाता। कुछ ही महीनों में वह योगी जी का सबसे प्रिय शिष्य बन गया।”

“एक दिन योगी जी ने देवदत्त से कहा, ‘बेटा! तुम्हारी शिक्षा पूरी हो गई है। अब तुम संसार में जाकर लोगों की सेवा करो।’ यह सुनकर देवदत्त बहुत खुश हुआ और गुरु जी का आशीर्वाद लेकर चला गया।”

“कुछ दिन बाद योगी जी को पता चला कि देवदत्त ने नगर में जाकर अपना एक आश्रम बनाया है। वह लोगों से कहता है कि वह स्वयं एक महान योगी है और किसी से कुछ नहीं सीखा है। वह अपने गुरु का नाम तक नहीं लेता था।”

“यह सुनकर योगी जी की आँखों में आँसू आ गए। वे बहुत दुखी हुए और रोने लगे। उन्होंने सोचा, ‘मैंने इसे इतना प्रेम दिया, इतना ज्ञान दिया, और यह मुझे भूल गया। यह कितना कृतघन है!’

“लेकिन फिर अचानक योगी जी को एक बात समझ आई। वे सोचने लगे, ‘अरे! मैं कितना मूर्ख हूँ। मैं तो एक योगी हूँ। मुझे अहंकार नहीं करना चाहिए। यदि मेरा शिष्य लोगों की भलाई कर रहा है, तो यही तो मैं चाहता था। उसे मेरा नाम लेने की क्या आवश्यकता है?’

“यह सोचकर योगी जी हँसने लगे। उन्हें अपनी मूर्खता पर हँसी आई। उन्होंने समझ लिया कि सच्चा गुरु वही है जो अपने शिष्य की सफलता में खुश होता है, न कि अपनी प्रशंसा की अपेक्षा करता है।”

“उसी समय देवदत्त वहाँ आया। उसने देखा कि गुरु जी पहले रो रहे थे, फिर हँस रहे हैं। वह समझ गया कि गुरु जी को सब पता चल गया है। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।”

“देवदत्त ने गुरु जी के चरणों में गिरकर क्षमा माँगी। उसने कहा, ‘गुरुदेव! मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई है। मैं अहंकार में अंधा हो गया था। कृपया मुझे क्षमा कर दीजिए।'”

“योगी जी ने उसे गले लगाया और कहा, ‘बेटा! तुमने मुझे एक महत्वपूर्ण सबक सिखाया है। सच्चा ज्ञान वही है जो अहंकार को मिटा देता है। तुम जाओ और लोगों की सेवा करो। बस यह याद रखना कि ज्ञान किसी का निजी संपत्ति नहीं है।’

“इस प्रकार दोनों गुरु-शिष्य ने एक-दूसरे से सीखा और अपने जीवन को और भी सुंदर बनाया।”

कहानी समाप्त करके बेताल ने कहा, “अब बताओ राजा विक्रम! योगी पहले क्यों रोया, फिर क्यों हँसा? यदि तुम जानते हो और नहीं बताओगे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा।”

राजा विक्रमादित्य ने उत्तर दिया, “बेताल! योगी पहले इसलिए रोया क्योंकि उसे लगा कि उसका शिष्य कृतघन है और उसे भूल गया है। लेकिन फिर वह हँसा क्योंकि उसे एहसास हुआ कि वह स्वयं अहंकार में पड़ गया था। सच्चे गुरु को अपनी प्रशंसा की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।”

“वाह राजन्! सही उत्तर।” यह कहकर बेताल फिर से उड़कर पेड़ पर जा लटका। राजा विक्रमादित्य को फिर से उसे लेने जाना पड़ा.

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