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व्यास अवतार की कथा – वेदों का विभाजन
बहुत समय पहले की बात है, जब धरती पर सत्ययुग का अंत हो रहा था और त्रेतायुग का आरंभ होने वाला था। उस समय मनुष्यों की बुद्धि और स्मृति शक्ति धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। वेदों का ज्ञान, जो पहले मौखिक रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होता था, अब लुप्त होने का खतरा था।
भगवान विष्णु ने देखा कि धरती पर वेदों के ज्ञान की रक्षा के लिए किसी महान व्यक्तित्व की आवश्यकता है। तब उन्होंने व्यास अवतार लेने का निर्णय लिया। यह विष्णु के दस अवतारों में से एक था, जिसका उद्देश्य वेदों का संरक्षण और व्यवस्थित विभाजन करना था।
हिमालय की तराई में स्थित एक पवित्र आश्रम में महर्षि पराशर और सत्यवती के पुत्र के रूप में कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्म हुआ। जन्म के समय ही उनका रंग श्याम वर्ण था, इसलिए उन्हें कृष्ण कहा गया। द्वीप में जन्म लेने के कारण उनका नाम द्वैपायन पड़ा।
बालक व्यास में जन्म से ही अद्भुत प्रतिभा थी। वे बचपन से ही वेदों के मंत्रों को सुनकर तुरंत याद कर लेते थे। उनकी स्मृति इतनी तीव्र थी कि एक बार सुना गया श्लोक कभी नहीं भूलते थे।
जैसे-जैसे व्यास बड़े होते गए, उन्होंने देखा कि ऋषि-मुनि वेदों के विशाल ज्ञान को याद रखने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं। पहले जो एक ही वेद था, वह इतना विस्तृत था कि सामान्य मनुष्य के लिए उसे पूर्णतः समझना और याद रखना असंभव हो गया था।
“गुरुदेव,” एक दिन व्यास ने अपने गुरु से कहा, “वेदों का यह अमूल्य ज्ञान धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है। हमें कुछ करना चाहिए।”
गुरु ने मुस्कराते हुए कहा, “पुत्र व्यास, तुम्हारा जन्म ही इसी उद्देश्य से हुआ है। तुम्हें वेदों का विभाजन करना है।”
व्यास ने गहरी तपस्या की और भगवान विष्णु से प्रार्थना की। उन्होंने कहा, “हे प्रभु! मुझे शक्ति दीजिए कि मैं वेदों को इस प्रकार व्यवस्थित कर सकूं कि आने वाली पीढ़ियां इसका लाभ उठा सकें।”
भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्होंने व्यास को दिव्य ज्ञान प्रदान किया। अब व्यास के पास वेदों के सभी मंत्रों की पूर्ण जानकारी थी।
व्यास ने एक विशाल वेद को चार भागों में बांटने का निर्णय लिया। उन्होंने सोचा कि यदि वेदों को विषयानुसार अलग-अलग भागों में बांटा जाए, तो लोगों के लिए इन्हें समझना और याद रखना आसान हो जाएगा।
पहले उन्होंने ऋग्वेद का संकलन किया, जिसमें देवताओं की स्तुति के मंत्र थे। फिर यजुर्वेद बनाया, जिसमें यज्ञ की विधियां थीं। तीसरा सामवेद था, जिसमें संगीत और गायन के मंत्र थे। चौथा अथर्ववेद था, जिसमें दैनिक जीवन से संबंधित मंत्र थे।
इस महान कार्य को पूरा करने के लिए व्यास ने चार योग्य शिष्यों को चुना। पैल को ऋग्वेद, वैशम्पायन को यजुर्वेद, जैमिनी को सामवेद, और सुमन्तु को अथर्ववेद सिखाया।
“शिष्यों,” व्यास ने कहा, “यह केवल वेदों का विभाजन नहीं है, बल्कि मानवता की सेवा है। तुम्हें इस ज्ञान को आगे फैलाना है।”
शिष्यों ने गुरु के चरणों में प्रणाम करते हुए कहा, “गुरुदेव, हम इस दायित्व को पूरी निष्ठा से निभाएंगे।”
व्यास का यह कार्य यहीं समाप्त नहीं हुआ। उन्होंने देखा कि वेदों के अतिरिक्त भी धर्म और नीति की शिक्षा की आवश्यकता है। तब उन्होंने अठारह पुराणों की रचना की, जिनमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की शिक्षा थी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि व्यास ने महाभारत की रचना की, जिसे पांचवां वेद कहा जाता है। इसमें उन्होंने भगवद्गीता के रूप में जीवन के सबसे गहरे सत्यों को प्रस्तुत किया।
एक दिन व्यास के पास एक चिंतित ब्राह्मण आया। उसने कहा, “महर्षि, मैं वेदों को पढ़ना चाहता हूं, लेकिन वे इतने कठिन हैं कि मैं समझ नहीं पा रहा।”
व्यास ने मुस्कराते हुए कहा, “चिंता मत करो। अब वेदों का विभाजन हो गया है। तुम अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार किसी भी वेद का अध्ययन कर सकते हो।”
ब्राह्मण खुश हो गया और बोला, “यह तो बहुत अच्छी बात है! अब हम सभी वेदों का ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे।”
व्यास के इस महान कार्य की प्रशंसा स्वर्ग तक पहुंची। देवराज इंद्र स्वयं धरती पर आए और व्यास से मिले। उन्होंने कहा, “महर्षि व्यास, आपने जो कार्य किया है, वह अतुलनीय है। आपने वेदों को नष्ट होने से बचाया है।”
व्यास ने विनम्रता से कहा, “देवराज, यह सब भगवान विष्णु की कृपा है। मैं तो केवल निमित्त मात्र हूं।”
समय बीतता गया और व्यास का यह कार्य पूरे भारतवर्ष में फैल गया। हजारों शिष्यों ने वेदों का अध्ययन किया और इस ज्ञान को आगे बढ़ाया। व्यास अवतार की कथा और वेदों का विभाजन एक ऐसी घटना बन गई जिसने पूरी मानवता को प्रभावित किया।
व्यास ने न केवल वेदों का विभाजन किया, बल्कि उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि यह ज्ञान सभी वर्गों के लोगों तक पहुंचे। उन्होंने कहा था, “ज्ञान किसी एक व्यक्ति या वर्ग की संपत्ति नहीं है, यह सभी का अधिकार है।”
एक दिन व्यास के पास कुछ राजा आए और बोले, “महर्षि, हम राजकाज में व्यस्त रहते हैं। हमारे लिए कोई सरल उपाय बताइए जिससे हम धर्म का पालन कर सकें।”
व्यास ने उत्तर दिया, “राजन्, धर्म का सार बहुत सरल है – सत्य बोलो, न्याय करो, और प्रजा की भलाई करो। यही वेदों का सार है।”
राजाओं ने प्रसन्न होकर कहा, “आपने बहुत सरल भाषा में धर्म का सार समझाया है।”
व्यास की शिक्षाओं का प्रभाव इतना व्यापक था कि दूर-दूर से लोग उनसे मिलने आते थे। एक बार एक गरीब किसान आया और बोला, “महर्षि, मैं अनपढ़ हूं। क्या मैं भी वेदों का ज्ञान प्राप्त कर सकता हूं?”
व्यास ने प्रेम से कहा, “पुत्र, वेदों का सबसे बड़ा संदेश यह है कि ईमानदारी से काम करो और दूसरों की सहायता करो। तुम यह पहले से ही कर रहे हो।”
किसान की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। उसने समझ लिया कि वेदों का ज्ञान केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि अच्छे कर्मों में भी है।
व्यास के जीवन का अंतिम चरण भी उतना ही प्रेरणादायक था। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, “मैंने वेदों का विभाजन किया है, लेकिन असली काम अब तुम्हारा है। तुम्हें इस ज्ञान को हर घर तक पहुंचाना है।”
शिष्यों ने गुरु के आदेश का पालन किया और पूरे भारत में वेदों की शिक्षा फैलाई। आज भी हम जो वेद पढ़ते हैं, वे व्यास द्वारा किए गए विभाजन के अनुसार ही हैं।
व्यास अवतार की कथा हमें सिखाती है कि ज्ञान का संरक्षण और प्रसार कितना महत्वपूर्ण है। व्यास ने न केवल वेदों का विभाजन किया, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि यह अमूल्य ज्ञान भावी पीढ़ियों तक पहुंचे।
आज भी जब हम वेदों का पाठ करते हैं या पुराणों की कथाएं सुनते हैं, तो हमें व्यास महर्षि का आभारी होना चाहिए। उनके बिना यह सब ज्ञान शायद हमेशा के लिए खो जाता।
इस प्रकार भगवान विष्णु के व्यास अवतार ने मानवता की महान सेवा की और वेदों के रूप में अमर ज्ञान को संरक्षित किया। यह कथा हमें प्रेरणा देती है कि हमें भी अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग समाज की भलाई के लिए करना चाहिए।












