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व्यास जी का जन्म – महाभारत के रचयिता की कथा
बहुत समय पहले की बात है, जब धरती पर देवता और ऋषि-मुनि निवास करते थे। उस समय यमुना नदी के तट पर एक सुंदर आश्रम था, जहाँ महान ऋषि पराशर तपस्या करते थे। वे बहुत ज्ञानी और तेजस्वी थे।
एक दिन ऋषि पराशर को यमुना नदी पार करनी थी। नदी के किनारे एक सुंदर नाव दिखाई दी, जिसे एक युवा कन्या चला रही थी। उस कन्या का नाम सत्यवती था। वह मछुआरों के राजा दाशराज की पुत्री थी।
“हे कन्ये! क्या तुम मुझे नदी पार करा सकती हो?” ऋषि पराशर ने विनम्रता से पूछा।
“अवश्य महर्षि! कृपया नाव में बैठिए,” सत्यवती ने सम्मान से उत्तर दिया।
जब सत्यवती नाव चला रही थी, तो ऋषि पराशर उसके तेज और सुंदरता से प्रभावित हुए। उन्होंने देखा कि यह कन्या केवल सुंदर ही नहीं, बल्कि बहुत गुणवान भी है।
नदी के बीच में पहुँचकर, ऋषि पराशर ने अपनी दिव्य शक्ति से चारों ओर घना कोहरा फैला दिया। व्यास जी का जन्म इसी दिव्य मिलन से होने वाला था।
“हे सत्यवती! तुम्हारे गर्भ से एक महान पुत्र जन्म लेगा, जो संसार का कल्याण करेगा,” ऋषि पराशर ने आशीर्वाद दिया।
समय बीतने पर, यमुना नदी के एक द्वीप पर व्यास जी का जन्म हुआ। जन्म के समय ही वे काले रंग के थे, इसलिए उन्हें कृष्ण द्वैपायन कहा गया। द्वीप पर जन्म लेने के कारण उन्हें द्वैपायन नाम मिला।
जैसे ही बालक का जन्म हुआ, आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी। देवता गंधर्व गीत गाने लगे। यह व्यास जी का जन्म कोई साधारण जन्म नहीं था, बल्कि एक महान आत्मा का अवतार था।
बालक व्यास अद्भुत प्रतिभा के साथ पैदा हुए थे। वे जन्म के तुरंत बाद ही अपनी माता से बोले:
“माता! मैं तपस्या करने जा रहा हूँ। जब भी आपको मेरी आवश्यकता होगी, मुझे स्मरण करना। मैं तुरंत आपके पास आ जाऊंगा।”
यह कहकर बालक व्यास वन में चले गए और कठोर तपस्या करने लगे। उनकी तपस्या इतनी प्रबल थी कि सभी देवता प्रसन्न हो गए।
वर्षों बाद, जब सत्यवती का विवाह हस्तिनापुर के राजा शांतनु से हुआ, तो उन्हें व्यास जी की आवश्यकता पड़ी। राजा शांतनु के पुत्र विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद, वंश आगे बढ़ाने के लिए सत्यवती ने व्यास जी को स्मरण किया।
व्यास जी तुरंत अपनी माता के पास आए। उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति से धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर को जन्म दिया। इस प्रकार कुरु वंश का विस्तार हुआ।
व्यास जी ने अपने जीवन में अनेक महान कार्य किए। उन्होंने वेदों को चार भागों में बांटा – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। इसीलिए उन्हें वेदव्यास कहा जाता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यास जी ने महाभारत की रचना की। यह संसार का सबसे बड़ा महाकाव्य है। उन्होंने भगवान गणेश से कहा:
“हे गणपति! आप मेरे महाभारत के लेखक बनिए। मैं इसे बोलूंगा और आप लिखिए।”
गणेश जी ने शर्त रखी कि व्यास जी बिना रुके बोलते रहें। व्यास जी ने भी शर्त रखी कि गणेश जी बिना समझे कुछ न लिखें। इस प्रकार महाभारत की रचना हुई।
व्यास जी ने अपने जीवन में देखा कि कैसे उनके ही वंशज आपस में लड़े। धृतराष्ट्र के सौ पुत्र कौरव और पांडु के पांच पुत्र पांडव के बीच भयंकर युद्ध हुआ। यह युद्ध देखकर व्यास जी का हृदय दुखी हो गया।
युद्ध के बाद, व्यास जी ने धृतराष्ट्र को दिव्य दृष्टि दी ताकि वे अपने मृत पुत्रों को देख सकें। उन्होंने गांधारी और कुंती को भी सांत्वना दी।
व्यास जी का जन्म इस संसार के लिए एक वरदान था। उन्होंने न केवल महान ग्रंथों की रचना की, बल्कि मानवता को धर्म और अधर्म के बीच अंतर समझाया।
शिक्षा: व्यास जी के जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि ज्ञान और तपस्या से मनुष्य महान बन सकता है। उन्होंने दिखाया कि सच्चा ज्ञान वही है जो संसार का कल्याण करे। माता-पिता की सेवा करना और अपने कर्तव्य का पालन करना हर व्यक्ति का धर्म है। व्यास जी की तरह हमें भी अपने ज्ञान का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए करना चाहिए। सच्चा ज्ञान वही है जो संसार का कल्याण करे।









