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वामन अवतार की कथा – राजा बलि से तीन पग भूमि
बहुत समय पहले की बात है, जब त्रेता युग में दैत्यराज बलि का राज्य था। राजा बलि अपने पराक्रम और दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था। वह अपने दादा प्रह्लाद की तरह भगवान विष्णु का भक्त था, लेकिन उसमें अहंकार की भावना भी थी।
राजा बलि ने अपने गुरु शुक्राचार्य की सहायता से स्वर्गलोक पर आक्रमण किया और देवराज इंद्र को हराकर तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया। देवता परेशान होकर भगवान विष्णु के पास गए और अपनी समस्या बताई।
“हे प्रभु!” इंद्र ने कहा, “दैत्यराज बलि ने हमें स्वर्ग से निकाल दिया है। कृपया हमारी रक्षा करें।”
भगवान विष्णु मुस्कराए और बोले, “चिंता मत करो। मैं वामन अवतार लेकर राजा बलि के अहंकार को नष्ट करूंगा और धर्म की स्थापना करूंगा।”
इस प्रकार भगवान विष्णु ने कश्यप ऋषि और अदिति माता के यहाँ एक छोटे ब्राह्मण बालक के रूप में जन्म लिया। यह बालक बहुत सुंदर था और उसके तेज से सारा आश्रम प्रकाशित हो गया।
उधर राजा बलि ने नर्मदा नदी के तट पर एक महान यज्ञ का आयोजन किया था। वह सभी ब्राह्मणों को दान दे रहा था और कोई भी याचक खाली हाथ नहीं जा रहा था। राजा बलि की दानवीरता की चर्चा तीनों लोकों में हो रही थी।
वामन रूप में भगवान विष्णु उस यज्ञशाला में पहुंचे। उनके छोटे कद को देखकर सभी मुस्कराने लगे, लेकिन उनके तेज और ब्रह्मचर्य की शोभा देखकर सभी प्रभावित हुए।
राजा बलि ने वामन को देखते ही उनका सम्मान किया और कहा, “हे ब्राह्मण देवता! आपका स्वागत है। आप जो चाहें मांग सकते हैं। मैं आपकी हर इच्छा पूरी करूंगा।”
वामन ने मधुर स्वर में कहा, “हे राजन! मुझे केवल तीन पग भूमि चाहिए। उतनी जगह जितनी मैं अपने तीन कदमों में नाप सकूं।”
राजा बलि हैरान हुआ। उसने कहा, “हे ब्राह्मण! आप तो बहुत कम मांग रहे हैं। मैं आपको सोना, चांदी, हीरे-जवाहरात, पूरा राज्य भी दे सकता हूं। केवल तीन पग भूमि क्यों?”
वामन मुस्कराए और बोले, “राजन! जो व्यक्ति तीन पग भूमि से संतुष्ट नहीं है, वह तीन लोक पाकर भी संतुष्ट नहीं होगा। मुझे बस तीन पग भूमि चाहिए।”
गुरु शुक्राचार्य को लगा कि कुछ गड़बड़ है। उन्होंने राजा बलि को रोकने की कोशिश की और कहा, “राजन! यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं लगता। इनमें दिव्य तेज है। सावधान रहिए!”
लेकिन राजा बलि ने कहा, “गुरुजी! मैंने वचन दे दिया है। एक राजा अपने वचन से कभी नहीं मुकरता।” और उसने संकल्प जल लेकर वामन को तीन पग भूमि का दान दे दिया।
जैसे ही राजा बलि ने दान का संकल्प किया, वामन का रूप बदलने लगा। वे बढ़ते गए, बढ़ते गए और विराट रूप धारण कर लिया। उनका सिर आकाश को छूने लगा और पैर पृथ्वी पर टिके रहे।
सभी देवता, ऋषि-मुनि और दैत्य इस अद्भुत दृश्य को देखकर आश्चर्यचकित रह गए। राजा बलि समझ गया कि ये कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान विष्णु हैं।
भगवान वामन ने अपना पहला कदम रखा तो पूरी पृथ्वी नाप ली। दूसरा कदम रखा तो स्वर्गलोक और आकाश नाप लिया। अब तीसरे कदम के लिए कोई जगह नहीं बची थी।
भगवान ने राजा बलि से पूछा, “राजन! अब मैं तीसरा कदम कहां रखूं? तुमने तीन पग भूमि देने का वचन दिया था।”
राजा बलि को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसका अहंकार चूर-चूर हो गया। वह भगवान के चरणों में गिर पड़ा और बोला, “प्रभु! मैं समझ गया हूं। आप तीसरा कदम मेरे सिर पर रखिए। मैं आपका दास हूं।”
भगवान वामन प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा बलि के सिर पर अपना तीसरा कदम रखा और उसे पाताल लोक भेज दिया। लेकिन राजा बलि की भक्ति और दानवीरता से प्रभावित होकर उन्होंने उसे पाताल लोक का राजा बना दिया।
“बलि!” भगवान ने कहा, “तुम्हारी भक्ति सच्ची है। तुम पाताल लोक के राजा बनकर वहां धर्म के साथ राज्य करो। मैं तुम्हारे द्वार पर पहरेदार बनकर रहूंगा।”
इसके अलावा भगवान ने राजा बलि को वरदान दिया कि वह साल में एक बार अपनी प्रजा से मिलने पृथ्वी पर आ सकेगा। यही दिन केरल में ओणम के त्योहार के रूप में मनाया जाता है।
देवताओं को अपना स्वर्गलोक वापस मिल गया। धर्म की पुनः स्थापना हुई। भगवान विष्णु के वामन अवतार की यह लीला दिखाती है कि अहंकार कितना भी बड़ा हो, भगवान के सामने छोटा है।
राजा बलि ने अपने अहंकार को त्यागकर सच्ची भक्ति का परिचय दिया। उसने सिखाया कि वचन का पालन करना और भगवान के सामने समर्पण करना ही सच्चा धर्म है।
इस प्रकार वामन अवतार की कथा हमें सिखाती है कि भगवान हमेशा धर्म की रक्षा करते हैं और अधर्म का नाश करते हैं। राजा बलि से तीन पग भूमि मांगकर भगवान ने दिखाया कि संतोष सबसे बड़ा धन है।
आज भी जब हम यह कथा सुनते हैं तो हमें याद आता है कि अहंकार हमारा सबसे बड़ा शत्रु है और विनम्रता हमारा सबसे बड़ा मित्र। भगवान वामन की कृपा से राजा बलि को मोक्ष मिला और वह अमर हो गया।
यही है वामन अवतार की कथा जो हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति, दान, और विनम्रता से भगवान की कृपा प्राप्त होती है।







