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शिव-गणेश युद्ध: पिता-पुत्र का महान संघर्ष
बहुत समय पहले की बात है, जब कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती का निवास था। एक दिन माता पार्वती स्नान करने की तैयारी कर रही थीं। उन्होंने सोचा कि कोई द्वारपाल होना चाहिए जो उनकी रक्षा करे।
माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक सुंदर बालक का निर्माण किया। उन्होंने उसमें प्राण फूंके और कहा, “हे पुत्र! तुम मेरे द्वार की रक्षा करना। जब तक मैं स्नान न कर लूं, किसी को भी अंदर मत आने देना।”
गणेश जी ने माता की आज्ञा स्वीकार की और द्वार पर खड़े हो गए। वे एक वीर योद्धा की भांति अपनी गदा लेकर पहरा देने लगे।
कुछ समय बाद भगवान शिव कैलाश पर्वत पर वापस आए। जब वे अपने निवास में प्रवेश करने लगे, तो गणेश जी ने उन्हें रोक दिया। “रुकिए! आप अंदर नहीं जा सकते। माता जी ने मुझे आदेश दिया है कि किसी को भी अंदर न जाने दूं।”
भगवान शिव आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने कहा, “बालक! मैं इस घर का स्वामी हूं। यह मेरा निवास है। तुम कौन हो जो मुझे रोक रहे हो?”
गणेश जी ने दृढ़ता से उत्तर दिया, “मैं माता पार्वती का पुत्र हूं और उनकी आज्ञा का पालन करना मेरा धर्म है। आप चाहे कोई भी हों, मैं आपको अंदर नहीं जाने दूंगा।”
इस प्रकार शिव-गणेश युद्ध की शुरुआत हुई। भगवान शिव ने समझाने का प्रयास किया, परंतु गणेश जी अपनी बात पर अडिग रहे। अंततः भगवान शिव को क्रोध आ गया।
भगवान शिव ने अपने गणों को बुलाया और कहा, “इस बालक को हटाओ और मुझे अंदर जाने दो।” परंतु गणेश जी ने अकेले ही सभी गणों को परास्त कर दिया। उनकी वीरता देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गए।
जब गणों की हार हुई, तो भगवान शिव स्वयं युद्ध के लिए तैयार हुए। पिता-पुत्र के बीच संघर्ष अब चरम पर पहुंच गया था। दोनों ओर से भयंकर युद्ध छिड़ गया।
गणेश जी अपनी गदा से शिव जी पर प्रहार करते रहे, और शिव जी अपने त्रिशूल से उनका सामना करते रहे। यह युद्ध इतना भयंकर था कि तीनों लोक कांप उठे।
अंत में भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से गणेश जी का सिर काट दिया। जैसे ही यह हुआ, माता पार्वती का स्नान समाप्त हुआ और वे बाहर आईं।
अपने प्रिय पुत्र की यह दशा देखकर माता पार्वती अत्यंत क्रोधित हुईं। उन्होंने कहा, “हे नाथ! आपने मेरे पुत्र का वध क्यों किया? मैं इस संसार का विनाश कर दूंगी।”
भगवान शिव को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने माता पार्वती से क्षमा मांगी और कहा, “हे देवी! मुझे ज्ञात नहीं था कि यह आपका पुत्र है। मैं इसे पुनर्जीवित कर दूंगा।”
भगवान शिव ने अपने गणों को आदेश दिया कि वे उत्तर दिशा में जाकर जो भी प्राणी पहले मिले, उसका सिर ले आएं। गण गए और उन्हें एक हाथी मिला। वे हाथी का सिर लेकर वापस आए।
भगवान शिव ने हाथी का सिर गणेश जी के धड़ पर लगाया और उन्हें पुनर्जीवित कर दिया। इस प्रकार गणेश जी हाथी के सिर वाले देवता बन गए।
भगवान शिव ने गणेश जी को गले लगाया और कहा, “हे पुत्र! आज से तुम मेरे प्रिय पुत्र हो। तुम्हारी पूजा सभी देवताओं से पहले होगी। तुम विघ्नहर्ता कहलाओगे।”
माता पार्वती भी प्रसन्न हो गईं। उन्होंने गणेश जी को आशीर्वाद दिया कि वे सभी कार्यों के आरंभ में पूजे जाएंगे।
इस प्रकार शिव-गणेश युद्ध का अंत हुआ। यह युद्ध वास्तव में एक गलतफहमी का परिणाम था, परंतु इसके कारण गणेश जी को विशेष स्थान प्राप्त हुआ।
आज भी जब हम कोई नया काम शुरू करते हैं, तो सबसे पहले गणेश जी की पूजा करते हैं। वे हमारे सभी विघ्नों को दूर करते हैं और हमारे कार्यों में सफलता दिलाते हैं।















