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सबसे बड़ा काम किसने किया? – बेताल पच्चीसी सोलहवीं कहानी

राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लिए जा रहे थे। रात का समय था और जंगल में सन्नाटा छाया हुआ था। अचानक बेताल ने अपनी कर्कश आवाज़ में कहा, “राजन्! आज मैं तुम्हें एक और कहानी सुनाता हूँ। सुनो और बताओ कि सबसे बड़ा काम किसने किया?”

विक्रम चुपचाप सुनने लगे।

बेताल ने कहानी शुरू की – “प्राचीन काल में कांचीपुरम नगर में राजा चंद्रगुप्त का राज्य था। उस नगर में तीन मित्र रहते थे – विद्यानंद, धर्मदास और वीरसिंह। तीनों बचपन से ही एक-दूसरे के सच्चे मित्र थे।”

एक दिन तीनों मित्र जंगल में घूमने गए। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक सुंदर कन्या बेहोश पड़ी है। उसके पास एक सांप मरा पड़ा था। स्पष्ट था कि सांप के काटने से कन्या की मृत्यु हो गई थी।

विद्यानंद ने कहा, “मित्रों! यह कन्या अत्यंत सुंदर है। इसकी मृत्यु देखकर मेरा हृदय दुखी हो रहा है।”

धर्मदास बोला, “हमें इसका उचित संस्कार करना चाहिए।” उसने तुरंत चिता तैयार की और कन्या का दाह संस्कार किया।

जब कन्या की अस्थियां राख में मिल गईं, तो वीरसिंह ने कहा, “मित्रों! मैं इन अस्थियों को गंगा में प्रवाहित करूंगा।” वह अस्थियों को लेकर गंगा के तट पर गया और विधिपूर्वक उन्हें प्रवाहित किया।

इसके बाद तीनों मित्र अपने-अपने घर लौट गए। परंतु उस सुंदर कन्या की याद उनके मन से नहीं निकल रही थी।

विद्यानंद दिन-रात उस कन्या के बारे में सोचता रहता। उसने खाना-पीना छोड़ दिया और केवल उसी की स्मृति में खो गया।

धर्मदास ने संसार से विरक्ति ले ली। वह जंगल में जाकर तपस्या करने लगा और संन्यासी बन गया।

वीरसिंह ने सोचा कि वह उस कन्या के माता-पिता को खोजेगा। वह गांव-गांव घूमकर उसके परिवार की तलाश करने लगा।

कई महीने बीत गए। एक दिन वीरसिंह को पता चला कि पास के गांव में एक ब्राह्मण की पुत्री लापता है। वह तुरंत वहां गया और कन्या के माता-पिता से मिला।

जब उसने पूरी घटना बताई, तो कन्या के पिता ने कहा, “वत्स! मेरी पुत्री का नाम सुंदरी था। तुमने जो वर्णन किया है, वह बिल्कुल उसी जैसा है।”

ब्राह्मण ने आगे कहा, “मैं एक महान तांत्रिक हूं। यदि तुम मेरी पुत्री की अस्थियां ला सको, तो मैं उसे पुनर्जीवित कर सकता हूं।”

वीरसिंह तुरंत गंगा के तट पर गया। उसने गहरी तपस्या की और गंगा मैया से प्रार्थना की। गंगा मैया प्रसन्न हुईं और उन्होंने सुंदरी की अस्थियां वापस कर दीं।

वीरसिंह अस्थियां लेकर ब्राह्मण के पास पहुंचा। ब्राह्मण ने अपनी तांत्रिक विद्या से उन अस्थियों से सुंदरी को पुनर्जीवित कर दिया।

जब सुंदरी जीवित हो गई, तो वीरसिंह ने अपने दोनों मित्रों को बुलाया। विद्यानंद अपनी दुर्बल अवस्था में आया और धर्मदास जंगल से लौटा।

सुंदरी को देखकर तीनों मित्र प्रसन्न हुए। परंतु अब एक नई समस्या खड़ी हुई। तीनों ही सुंदरी से विवाह करना चाहते थे।

विद्यानंद ने कहा, “मैंने इसे सबसे पहले देखा था और इसके प्रेम में अपना सब कुछ त्याग दिया है। अतः यह मेरी पत्नी है।”

धर्मदास बोला, “मैंने इसका संस्कार किया है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति किसी का संस्कार करता है, वह उसका पिता समान होता है। अतः यह मेरी पुत्री है।”

वीरसिंह ने कहा, “मैंने इसकी अस्थियों को गंगा में प्रवाहित किया और वापस लाकर इसे जीवित कराया है। मैंने इसे दूसरा जन्म दिया है। अतः यह मेरी पत्नी है।”

तीनों में विवाद होने लगा। अंततः वे राजा चंद्रगुप्त के पास न्याय के लिए गए।

राजा ने सभी की बात सुनी और गहरे विचार में पड़ गया। उसने कहा, “यह अत्यंत कठिन प्रश्न है। तुम तीनों ने ही महान कार्य किया है।”

अंत में राजा ने निर्णय दिया कि सुंदरी स्वयं अपना पति चुनेगी।

सुंदरी ने कहा, “धर्मदास ने मेरा संस्कार किया है, इसलिए वे मेरे पिता समान हैं। विद्यानंद ने मेरे लिए अपना सब कुछ त्याग दिया है, इसलिए वे मेरे भाई समान हैं। वीरसिंह ने मुझे नया जीवन दिया है, इसलिए वे मेरे पति हैं।”

सभी ने सुंदरी के निर्णय को स्वीकार किया और वीरसिंह से सुंदरी का विवाह हो गया।

कहानी समाप्त करके बेताल ने पूछा, “राजन्! बताओ, इन तीनों में सबसे बड़ा काम किसने किया?”

राजा विक्रम ने सोचा और कहा, “बेताल! वीरसिंह ने सबसे बड़ा काम किया। क्योंकि विद्यानंद का प्रेम स्वार्थपूर्ण था और धर्मदास का कार्य केवल धर्म था। परंतु वीरसिंह ने निस्वार्थ भाव से कन्या के परिवार को खोजा, अस्थियां वापस लाई और उसे नया जीवन दिलाया। उसका कार्य सबसे महान था।”

विक्रम के उत्तर देते ही बेताल हंसकर फिर से पेड़ पर जा लटका। राजा को फिर से उसे लाने जाना पड़ा।

शिक्षा: सच्चा प्रेम वह है जो निस्वार्थ हो। जो व्यक्ति दूसरों की भलाई के लिए बिना किसी स्वार्थ के कार्य करता है, वही सबसे बड़ा काम करता है।

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