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ऋषभ अवतार की कथा – आदि तीर्थंकर की महान गाथा

बहुत समय पहले, जब यह संसार अभी नया था और मानव सभ्यता अपने प्रारंभिक चरण में थी, तब भगवान विष्णु ने ऋषभ अवतार के रूप में जन्म लिया था। यह कहानी उस महान आत्मा की है जो न केवल एक राजा थे, बल्कि जैन धर्म के आदि तीर्थंकर भी बने।

त्रेता युग के प्रारंभ में, अयोध्या नगरी में राजा नाभि का शासन था। राजा नाभि एक धर्मपरायण और न्यायप्रिय शासक थे। उनकी पत्नी रानी मेरुदेवी अत्यंत सुशील और धार्मिक स्वभाव की थीं। दोनों की एक ही इच्छा थी कि उन्हें एक ऐसा पुत्र प्राप्त हो जो प्रजा का कल्याण कर सके।

एक दिन राजा नाभि ने भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए। “राजन्! मैं तुम्हारी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूं। मांगो, क्या चाहिए तुम्हें?” भगवान ने कहा।

राजा नाभि ने विनम्रता से कहा, “हे प्रभु! मुझे एक ऐसा पुत्र चाहिए जो इस संसार का कल्याण कर सके, जो धर्म की स्थापना कर सके।”

भगवान विष्णु मुस्कराए और बोले, “तथास्तु! मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लूंगा। तुम्हारा पुत्र ऋषभ नाम से प्रसिद्ध होगा और वह मानवता को नया मार्ग दिखाएगा।”

समय आने पर रानी मेरुदेवी ने एक अत्यंत तेजस्वी बालक को जन्म दिया। बालक के जन्म के समय आकाश में दिव्य प्रकाश फैला और देवताओं ने पुष्प वर्षा की। इस बालक का नाम ऋषभ रखा गया।

बचपन से ही ऋषभ में असाधारण गुण दिखाई देने लगे। वे अत्यंत बुद्धिमान, दयालु और न्यायप्रिय थे। उनकी आंखों में एक दिव्य चमक थी जो सभी को आकर्षित करती थी। जैसे-जैसे वे बड़े होते गए, उनके गुण और भी निखरते गए।

युवावस्था में ऋषभ का विवाह जयंती और सुनंदा नामक दो राजकुमारियों से हुआ। उनके सौ पुत्र और दो पुत्रियां हुईं। उनके पुत्रों में भरत और बाहुबली सबसे प्रसिद्ध थे। भरत के नाम पर ही हमारे देश का नाम भारत पड़ा।

राजा नाभि के स्वर्गवास के बाद, ऋषभ ने राज्य की बागडोर संभाली। उस समय मनुष्य अभी भी बहुत सरल जीवन जीते थे। वे कृषि, व्यापार या अन्य कलाओं से परिचित नहीं थे। ऋषभ अवतार ने मानव सभ्यता को आगे बढ़ाने के लिए अनेक कार्य किए।

सबसे पहले उन्होंने लोगों को कृषि सिखाई। उन्होंने बताया कि कैसे बीज बोकर अनाज उगाया जा सकता है। फिर उन्होंने विभिन्न कलाओं और शिल्पों की शिक्षा दी। लेखन कला, संगीत, नृत्य, चित्रकला – सभी कुछ उन्होंने अपनी प्रजा को सिखाया।

ऋषभ ने समाज को व्यवस्थित करने के लिए वर्ण व्यवस्था की स्थापना की। उन्होंने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – चार वर्णों का निर्माण किया। यह व्यवस्था गुण और कर्म के आधार पर थी, जन्म के आधार पर नहीं।

राजा ऋषभ का शासन अत्यंत न्यायपूर्ण और कल्याणकारी था। उनके राज्य में कोई दुखी नहीं था। सभी प्रजाजन खुश और संतुष्ट थे। परंतु समय के साथ ऋषभ के मन में वैराग्य जागने लगा।

एक दिन राजा ऋषभ अपने महल की छत पर खड़े होकर नगर को देख रहे थे। अचानक उन्होंने देखा कि एक सुंदर नर्तकी नीलांजना नृत्य कर रही थी। सभी लोग उसके नृत्य में मग्न थे। परंतु अचानक नीलांजना का देहांत हो गया।

इस घटना ने ऋषभ के मन पर गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने सोचा, “यह संसार कितना नश्वर है! जो कुछ भी दिखाई देता है, वह सब मिथ्या है। सच्चा सुख तो आत्मा की शुद्धता में है।”

इस घटना के बाद ऋषभ का मन पूर्णतः संसार से विरक्त हो गया। उन्होंने निश्चय किया कि अब वे राज्य छोड़कर आध्यात्मिक मार्ग पर चलेंगे। उन्होंने अपने पुत्र भरत को राज्य सौंप दिया।

राज्याभिषेक के समय ऋषभ ने भरत से कहा, “पुत्र! यह राज्य अब तुम्हारा है। प्रजा का कल्याण करना, धर्म की रक्षा करना और न्याय की स्थापना करना – यही तुम्हारा कर्तव्य है।”

भरत ने पिता के चरण स्पर्श करते हुए कहा, “पिताजी! आप जो मार्ग दिखा रहे हैं, मैं उसी पर चलूंगा। आपका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ रहे।”

राज्य त्यागने के बाद ऋषभ ने दीक्षा ली। उन्होंने अपने सभी वस्त्र और आभूषण त्याग दिए। केवल एक सफेद वस्त्र धारण करके वे तपस्या के लिए वन में चले गए। इस प्रकार वे आदि तीर्थंकर बने।

वन में जाकर ऋषभ ने कठोर तपस्या शुरू की। वे दिन-रात ध्यान में लीन रहते। कभी-कभी तो वे इतने गहरे ध्यान में चले जाते कि महीनों तक भोजन नहीं करते थे। उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि देवता भी उनकी प्रशंसा करते थे।

एक बार की बात है, ऋषभ लगातार छह महीने तक ध्यान में लीन रहे। जब उनका ध्यान टूटा तो वे भोजन की तलाश में निकले। परंतु उस समय लोग दान-पुण्य की परंपरा से अवगत नहीं थे। कोई भी उन्हें भोजन नहीं दे रहा था।

अंततः उनके पौत्र श्रेयांस ने उन्हें गन्ने का रस दिया। यह पहला दान था जो किसी तीर्थंकर को दिया गया था। इस दिन को अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है और आज भी यह दिन जैन समुदाय में बहुत पवित्र माना जाता है।

वर्षों की कठोर तपस्या के बाद ऋषभ को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई। केवल ज्ञान का अर्थ है पूर्ण ज्ञान – जिसमें भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ दिखाई देता है। इस ज्ञान की प्राप्ति के साथ ही वे पूर्ण तीर्थंकर बन गए।

केवल ज्ञान प्राप्त करने के बाद ऋषभ ने लोगों को उपदेश देना शुरू किया। उनके उपदेश अत्यंत सरल और व्यावहारिक थे। वे कहते थे, “हिंसा मत करो, सत्य बोलो, चोरी मत करो, ब्रह्मचर्य का पालन करो और अपरिग्रह रखो।”

ये पांच सिद्धांत जैन धर्म के मूल आधार बने। हजारों लोग उनके शिष्य बने। उन्होंने समाज में अहिंसा, सत्य और करुणा का संदेश फैलाया। उनके उपदेशों से प्रभावित होकर अनेक राजा-महाराजा भी उनके शिष्य बन गए।

ऋषभ अवतार ने अपना पूरा जीवन मानवता की सेवा में लगाया। उन्होंने न केवल भौतिक सभ्यता का विकास किया बल्कि आध्यात्मिक मार्ग भी दिखाया। उनके द्वारा स्थापित सिद्धांत आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

अंत में, अपने जीवन के अंतिम चरण में ऋषभ कैलाश पर्वत पर गए। वहां उन्होंने अपनी अंतिम तपस्या की। उनकी आत्मा ने शरीर को त्यागकर मोक्ष प्राप्त किया। इस प्रकार वे इस संसार से विदा हो गए, परंतु उनके आदर्श और उपदेश हमेशा के लिए अमर हो गए।

आज भी जब हम ऋषभ अवतार की कथा सुनते हैं, तो हमें यह सीख मिलती है कि सच्चा राजा वही है जो अपनी प्रजा का कल्याण करे। सच्चा ज्ञान वही है जो हमें सत्य के मार्ग पर ले जाए। और सच्चा जीवन वही है जो दूसरों की भलाई में बीते।

ऋषभदेव का जीवन हमें सिखाता है कि भौतिक सुख-सुविधाएं अस्थायी हैं, परंतु आत्मा की शुद्धता और सच्चे ज्ञान की प्राप्ति ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है। उनके आदर्शों पर चलकर हम भी अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं।इस प्रकार समाप्त होती है आदि तीर्थंकर ऋषभदेव की महान गाथा, जो हमें सिखाती है कि सच्चा धर्म प्रेम, करुणा और अहिंसा में निहित है।

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