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पिण्ड दान का अधिकारी कौन – बेताल पच्चीसी – उन्नीसवीं कहानी
राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लादे हुए श्मशान की ओर चले जा रहे थे। रास्ते में बेताल ने फिर से एक कहानी सुनाने की इच्छा प्रकट की।
“राजन्! सुनिए एक और कथा।” बेताल ने कहा।
प्राचीन काल में कल्याणपुर नामक एक नगर में धर्मदास नाम का एक धनी सेठ रहता था। वह बहुत दानी और धर्मपरायण था। उसके तीन पुत्र थे – ज्येष्ठ पुत्र का नाम रामदास, मध्यम पुत्र का नाम श्यामदास और कनिष्ठ पुत्र का नाम गोपालदास था।
धर्मदास की एक पत्नी थी जिसका नाम सुमित्रा था। वह भी अत्यंत सदाचारी और पतिव्रता स्त्री थी। परंतु नियति की लीला देखिए, धर्मदास की मृत्यु के पश्चात् सुमित्रा का भी देहांत हो गया।
अब तीनों भाइयों के सामने एक गंभीर समस्या आ खड़ी हुई। पिण्ड दान का अधिकारी कौन होगा? यह प्रश्न उनके मन में उठा।
ज्येष्ठ पुत्र रामदास ने कहा, “मैं सबसे बड़ा हूं, अतः पिता-माता का पिण्ड दान करने का अधिकार मेरा है।”
मध्यम पुत्र श्यामदास बोला, “भाई, केवल बड़े होने से ही अधिकार नहीं मिलता। मैं सबसे अधिक धर्मकर्म करता हूं, इसलिए यह अधिकार मेरा है।”
कनिष्ठ पुत्र गोपालदास ने कहा, “आप दोनों की बात सही है, परंतु मैं माता-पिता की सबसे अधिक सेवा करता था। उनके अंतिम समय में भी मैं ही उनके पास था।”
तीनों भाइयों में इस बात को लेकर विवाद बढ़ता गया। वे अपने-अपने तर्क देते रहे। अंततः उन्होंने निर्णय लिया कि वे इस विषय में किसी विद्वान् से सलाह लेंगे।
नगर में पंडित विष्णुशर्मा नाम के एक महान् विद्वान् रहते थे। तीनों भाई उनके पास गए और अपनी समस्या बताई।
पंडित जी ने कहा, “पुत्रों! यह अत्यंत गंभीर विषय है। शास्त्रों के अनुसार, पिण्ड दान का अधिकारी वही होता है जो सबसे अधिक योग्य हो।”
“परंतु योग्यता कैसे निर्धारित करें?” रामदास ने पूछा।
पंडित जी ने समझाया, “तुम तीनों को एक परीक्षा देनी होगी। जो इस परीक्षा में सफल होगा, वही पिण्ड दान का अधिकारी होगा।”
तीनों भाइयों ने सहमति दी। पंडित जी ने कहा, “तुम सभी को अपने माता-पिता की आत्मा की शांति के लिए एक वर्ष तक तपस्या करनी होगी। जो सबसे अच्छी तपस्या करेगा, वही विजयी होगा।”
रामदास ने हिमालय की गुफा में जाकर कठोर तपस्या की। श्यामदास ने गंगा के तट पर बैठकर निरंतर जप-तप किया। गोपालदास ने अपने घर में ही रहकर गरीबों की सेवा करते हुए माता-पिता का स्मरण किया।
एक वर्ष बाद तीनों भाई वापस आए। पंडित जी ने उनकी तपस्या के बारे में सुना।
रामदास ने कहा, “मैंने हिमालय की बर्फीली गुफा में बिना अन्न-जल के तपस्या की है।”
श्यामदास बोला, “मैंने गंगा जी के तट पर खड़े होकर एक लाख बार माता-पिता के नाम का जप किया है।”
गोपालदास ने विनम्रता से कहा, “मैंने कोई विशेष तपस्या नहीं की। केवल गरीबों की सेवा करते हुए माता-पिता को याद किया है।”
पंडित जी ने गहरी सांस ली और कहा, “गोपालदास! तुम्हीं पिण्ड दान के सच्चे अधिकारी हो।”
“क्यों?” दोनों बड़े भाइयों ने आश्चर्य से पूछा।
पंडित जी ने समझाया, “क्योंकि तुमने अपने माता-पिता की वास्तविक सेवा की है। तपस्या का अर्थ केवल कष्ट सहना नहीं है, बल्कि निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करना है। गोपालदास ने गरीबों की सेवा करके अपने माता-पिता की आत्मा को वास्तविक शांति दी है।”
इस प्रकार गोपालदास को पिण्ड दान का अधिकारी माना गया। उसने बड़ी श्रद्धा और भक्ति से अपने माता-पिता का पिण्ड दान किया।
कहानी समाप्त करके बेताल ने कहा, “राजा विक्रम! बताइए, पंडित जी का निर्णय सही था या गलत? यदि आप चुप रहे तो आपका सिर फट जाएगा।”
राजा विक्रमादित्य ने उत्तर दिया, “बेताल! पंडित जी का निर्णय बिल्कुल सही था। पिण्ड दान का अधिकारी वही होता है जो सच्चे मन से अपने माता-पिता की सेवा करे और उनकी आत्मा की शांति के लिए निस्वार्थ कर्म करे।”
राजा का उत्तर सुनकर बेताल फिर से उड़कर पेड़ पर जा लटका। राजा विक्रमादित्य को पुनः उसे लाने के लिए जाना पड़ा।
शिक्षा: सच्ची भक्ति और सेवा ही व्यक्ति को अधिकारी बनाती है, न कि केवल बड़प्पन या दिखावा।













