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मेंढक राजा और घमंड की कहानी

बहुत समय पहले, एक छोटे से तालाब में मेंढक राजा रहता था। उसका नाम था राजू। वह अपने आप को बहुत बड़ा और शक्तिशाली समझता था। तालाब के सभी छोटे जीव-जंतु उससे डरते थे।

राजू मेंढक राजा हमेशा कहता था, “मैं इस तालाब का सबसे बड़ा और ताकतवर राजा हूँ! कोई भी मुझसे बड़ा नहीं है!” वह छोटी मछलियों को डराता और कीड़े-मकोड़ों को परेशान करता रहता था।

एक दिन, तालाब के किनारे एक बूढ़ा कछुआ आया। उसका नाम था दादा कछुआ। वह बहुत समझदार और अनुभवी था। उसने मेंढक राजा राजू का घमंड देखा और सोचा कि इसे सबक सिखाना चाहिए।

दादा कछुआ ने राजू से कहा, “राजू बेटा, तुम बहुत घमंड करते हो। क्या तुमने कभी तालाब के बाहर की दुनिया देखी है?”

मेंढक राजा राजू ने हंसते हुए कहा, “बाहर की दुनिया? मैं यहाँ का राजा हूँ! मुझे बाहर जाने की क्या जरूरत है?”

दादा कछुआ मुस्कराया और बोला, “चलो, मैं तुम्हें एक जगह ले चलता हूँ। वहाँ तुम्हें पता चल जाएगा कि असली राजा कौन है।”

राजू ने सोचा कि यह बूढ़ा कछुआ उसे कोई छोटी सी जगह दिखाने ले जा रहा है जहाँ वह अपना रौब दिखा सकेगा। इसलिए वह दादा कछुआ के साथ चल पड़ा।

दादा कछुआ मेंढक राजा राजू को तालाब से बाहर ले गया। वे एक बड़ी नदी के किनारे पहुँचे। राजू ने जब उस विशाल नदी को देखा तो उसकी आँखें फैल गईं। नदी इतनी बड़ी थी कि उसका दूसरा किनारा दिखाई नहीं दे रहा था।

“यह… यह क्या है?” राजू ने हैरानी से पूछा।

“यह एक नदी है, राजू। तुम्हारे तालाब से हजारों गुना बड़ी।” दादा कछुआ ने समझाया।

अचानक, नदी से एक बहुत बड़ा मगरमच्छ बाहर आया। वह मेंढक राजा राजू से सैकड़ों गुना बड़ा था। राजू डर के मारे काँपने लगा।

मगरमच्छ ने दोस्ताना लहजे में कहा, “अरे, कौन आया है यहाँ? एक छोटा सा मेंढक! कैसे हो भाई?”

राजू की आवाज काँप रही थी। वह बोला, “मैं… मैं राजू हूँ। मैं अपने तालाब का राजा हूँ।”

मगरमच्छ हंसा और बोला, “वाह! तुम राजा हो? बहुत अच्छी बात है। मैं इस पूरी नदी का राजा हूँ। लेकिन तुम चिंता मत करो, मैं छोटे दोस्तों को नुकसान नहीं पहुँचाता।”

मेंढक राजा राजू को अब एहसास हुआ कि वह कितना छोटा है। उसका सारा घमंड धूल में मिल गया। वह समझ गया कि दुनिया बहुत बड़ी है और उसमें उससे कहीं ज्यादा बड़े और शक्तिशाली जीव रहते हैं।

दादा कछुआ ने राजू से कहा, “अब समझे राजू? घमंड करना अच्छी बात नहीं है। हमेशा विनम्र रहना चाहिए।”

राजू ने शर्मिंदगी से सिर झुकाया और कहा, “दादा जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने बहुत गलती की है। अब मैं कभी घमंड नहीं करूँगा।”

वापस तालाब पहुँचकर, मेंढक राजा राजू ने सभी छोटे जीवों से माफी माँगी। उसने कहा, “दोस्तों, मैंने आप सबके साथ बुरा व्यवहार किया है। अब से मैं आप सबका दोस्त बनकर रहूँगा, राजा बनकर नहीं।”

सभी छोटे जीव खुश हो गए। उन्होंने राजू को माफ कर दिया। अब तालाब में सभी मिल-जुलकर खुशी से रहने लगे।

कहानी की सीख: घमंड करना बुरी बात है। हमें हमेशा विनम्र और दयालु रहना चाहिए। दुनिया बहुत बड़ी है और हमसे बड़े लोग हमेशा मौजूद रहते हैं। इसलिए अपने आप को सबसे बड़ा समझना गलत है। सच्चा राजा वही है जो सबके साथ प्रेम और सम्मान से पेश आता है।

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