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माता पार्वती की महान तपस्या की कथा

बहुत समय पहले की बात है, जब हिमालय पर्वत के राजा हिमवान के घर एक अत्यंत सुंदर कन्या का जन्म हुआ। इस कन्या का नाम था पार्वती। वह सती का पुनर्जन्म थी और भगवान शिव की शाश्वत शक्ति थी।

पार्वती बचपन से ही भगवान शिव के प्रति अगाध प्रेम रखती थी। वह हमेशा शिव जी की मूर्ति के सामने बैठकर उनकी पूजा करती और मन ही मन उन्हें अपना पति बनाने की प्रार्थना करती थी।

एक दिन देवर्षि नारद जी हिमवान के दरबार में पधारे। उन्होंने पार्वती को देखकर कहा, “हे राजन्! यह कन्या भगवान शिव की पत्नी बनने के लिए ही जन्मी है। परंतु शिव जी को पाने के लिए इसे कठोर तपस्या करनी होगी।”

नारद जी की बात सुनकर पार्वती का हृदय खुशी से भर गया। उन्होंने तुरंत अपने पिता से तपस्या की अनुमति मांगी। हिमवान राजा ने अपनी प्रिय पुत्री को समझाने की कोशिश की, “बेटी, तपस्या का मार्ग बहुत कठिन है। तुम अभी छोटी हो।”

परंतु पार्वती का निश्चय दृढ़ था। उन्होंने कहा, “पिताजी, मैं भगवान शिव के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकती। मुझे पार्वती तपस्या करने की अनुमति दें।”

अंततः हिमवान ने अपनी पुत्री को आशीर्वाद दिया। पार्वती ने सुंदर वस्त्र और आभूषण त्यागकर साधारण वस्त्र धारण किए और गौरीकुंड नामक स्थान पर जाकर अपनी तपस्या प्रारंभ की।

प्रारंभ में पार्वती ने फल-फूल खाकर तपस्या की। वह प्रतिदिन भगवान शिव का ध्यान करती और “ॐ नमः शिवाय” का जाप करती रहती। उनकी तपस्या की शुरुआत इस प्रकार हुई।

समय बीतता गया और पार्वती की तपस्या और भी कठोर होती गई। अब वह केवल पत्ते खाकर अपना जीवन निर्वाह करने लगी। इसीलिए उन्हें अपर्णा भी कहा जाने लगा।

वर्षों तक पार्वती तपस्या करती रही। गर्मी, सर्दी, बारिश – किसी भी मौसम ने उनकी तपस्या में बाधा नहीं डाली। वह एक पैर पर खड़े होकर, हाथ ऊपर उठाकर, आंखें बंद करके भगवान शिव का ध्यान करती रहती।

पार्वती की इस कठोर तपस्या से तीनों लोक हिल गए। देवता, ऋषि-मुनि सभी उनकी तपस्या की शक्ति से चकित थे। उनकी तपस्या से निकलने वाली तेज से पूरा वन प्रकाशित हो उठा।

भगवान शिव भी पार्वती की तपस्या से प्रभावित हुए, परंतु वह उनकी परीक्षा लेना चाहते थे। एक दिन वह एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके पार्वती के पास आए।

वृद्ध ब्राह्मण ने पार्वती से पूछा, “बेटी, तुम इतनी कठोर तपस्या क्यों कर रही हो? तुम्हारी यह दशा देखकर मेरा हृदय दुखी हो रहा है।”

पार्वती ने विनम्रता से उत्तर दिया, “हे ब्राह्मण देव! मैं भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए यह तपस्या कर रही हूं।”

वृद्ध ब्राह्मण ने कहा, “शिव तो एक अजीब देवता है। वह श्मशान में रहता है, सांप गले में पहनता है, भूत-प्रेतों के साथ नृत्य करता है। तुम जैसी सुंदर कन्या के लिए वह उपयुक्त नहीं है।”

यह सुनकर पार्वती को क्रोध आया। उन्होंने कहा, “हे ब्राह्मण! आप भगवान शिव की निंदा न करें। वह सबसे महान हैं। वह संहारकर्ता भी हैं और कल्याणकारी भी। मैं केवल उन्हीं को अपना पति बनाऊंगी।”

पार्वती की दृढ़ता और भक्ति देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। वह अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और बोले, “हे पार्वती! तुम्हारी तपस्या से मैं अत्यंत प्रभावित हूं। तुम्हारी भक्ति और प्रेम सच्चा है।”

भगवान शिव ने आगे कहा, “तुम्हारी यह पार्वती तपस्या सफल हुई। मैं तुम्हें पत्नी रूप में स्वीकार करता हूं। तुम मेरी शक्ति हो, मेरी अर्धांगिनी हो।”

यह सुनकर पार्वती की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। उन्होंने भगवान शिव के चरणों में प्रणाम किया और कहा, “हे प्रभु! आपने मेरी तपस्या को सफल बनाया। अब मेरा जीवन धन्य हो गया।”

इसके बाद हिमालय पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती का भव्य विवाह हुआ। सभी देवता, ऋषि-मुनि इस दिव्य विवाह में सम्मिलित हुए। ब्रह्मा जी ने विवाह संस्कार कराया।

माता पार्वती की यह तपस्या हमें सिखाती है कि दृढ़ संकल्प, धैर्य और सच्ची भक्ति से कोई भी लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने अपनी तपस्या से यह प्रमाणित किया कि प्रेम और समर्पण की शक्ति अपराजेय है।

आज भी जब कोई व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में धैर्य रखकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयास करता है, तो माता पार्वती की यह तपस्या उसके लिए प्रेरणा का स्रोत बनती है।

इस प्रकार माता पार्वती की महान तपस्या की यह कथा समाप्त होती है, जो हमें जीवन में दृढ़ता और भक्ति का महत्व सिखाती है।

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