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माँ कूष्मांडा की दिव्य कथा – सृष्टि की रचयिता

बहुत समय पहले, जब यह संसार अंधकार में डूबा हुआ था, तब कहीं कोई प्रकाश नहीं था। न सूर्य था, न चंद्रमा, न तारे। चारों ओर केवल घना अंधकार था। उस समय माँ कूष्मांडा ने अपनी मुस्कान से इस ब्रह्मांड की रचना की थी।

माँ कूष्मांडा का नाम कूष्मांडा इसलिए पड़ा क्योंकि उन्होंने अपनी हल्की सी मुस्कान से इस ब्रह्मांड रूपी अंडे की रचना की थी। कूष्मांडा का अर्थ होता है – कूष्मा यानी कुम्हड़ा और अंडा यानी ब्रह्मांड।

एक दिन ब्रह्मा जी, विष्णु जी और महेश जी आपस में चर्चा कर रहे थे। ब्रह्मा जी बोले, “हे प्रभु, यह संसार इतना अंधकारमय क्यों है? कहीं कोई प्रकाश नहीं दिखता।”

विष्णु जी ने कहा, “हाँ, इस अंधकार में जीवन कैसे पनपेगा? प्राणियों का कल्याण कैसे होगा?”

तभी आकाशवाणी हुई, “हे त्रिदेवों! माँ कूष्मांडा की आराधना करो। वही इस समस्या का समाधान कर सकती हैं।”

तीनों देवताओं ने मिलकर कठोर तपस्या की। हजारों वर्षों तक वे माँ कूष्मांडा की आराधना करते रहे। उनकी भक्ति देखकर माँ प्रसन्न हुईं और उनके सामने प्रकट हुईं।

माँ कूष्मांडा का रूप अत्यंत तेजस्वी था। उनके आठ हाथ थे। एक हाथ में कमंडल, दूसरे में धनुष, तीसरे में बाण, चौथे में कमल का फूल, पांचवें में अमृत कलश, छठे में चक्र, सातवें में गदा और आठवें हाथ में जप माला थी। उनका वाहन सिंह था।

“हे माँ, हमारी प्रार्थना सुनिए। इस अंधकार से मुक्ति दिलाइए,” तीनों देवताओं ने विनती की।

माँ कूष्मांडा मुस्कराईं। उनकी मुस्कान में अद्भुत शक्ति थी। जैसे ही वे मुस्कराईं, उनके तेज से पूरा ब्रह्मांड प्रकाशित हो गया। उनकी मुस्कान से सूर्य का जन्म हुआ।

“देखो,” माँ ने कहा, “मेरी मुस्कान से ही सूर्य की उत्पत्ति हुई है। अब यह संसार प्रकाशमान रहेगा।”

सूर्य के जन्म के साथ ही पूरा ब्रह्मांड जीवंत हो उठा। पेड़-पौधे हरे-भरे हो गए, फूल खिलने लगे, पक्षी चहकने लगे। कूष्मांडा माँ की कृपा से धरती पर जीवन का संचार हुआ।

ब्रह्मा जी ने कहा, “हे माँ, आपकी महिमा अपरंपार है। आपने अपनी मुस्कान मात्र से इस सुंदर सृष्टि की रचना की है।”

माँ कूष्मांडा बोलीं, “हे पुत्रों, मैं सदा अपने भक्तों की रक्षा करती हूँ। जो भी सच्चे मन से मेरी पूजा करता है, उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।”

उस दिन से माँ कूष्मांडा को सृष्टि की रचयिता माना जाने लगा। नवरात्रि के चौथे दिन उनकी विशेष पूजा की जाती है। भक्त उनसे स्वास्थ्य, समृद्धि और आयु की वृद्धि की प्रार्थना करते हैं।

एक बार एक गरीब किसान था। उसकी फसल सूख गई थी और घर में खाने को कुछ नहीं था। वह बहुत परेशान था। उसकी पत्नी ने कहा, “आज नवरात्रि का चौथा दिन है। चलो माँ कूष्मांडा की पूजा करते हैं।”

किसान ने कहा, “पूजा के लिए तो कुछ चाहिए। हमारे पास तो कुछ भी नहीं है।”

पत्नी बोली, “माँ तो भाव देखती हैं, सामान नहीं। चलो सच्चे मन से प्रार्थना करते हैं।”

दोनों ने मिलकर माँ कूष्मांडा की पूजा की। उन्होंने केवल जल चढ़ाया और सच्चे मन से प्रार्थना की। “हे माँ, हमारे पास कुछ नहीं है, लेकिन हमारा प्रेम आपके लिए सच्चा है।”

माँ कूष्मांडा उनकी भक्ति से प्रसन्न हुईं। अगले दिन किसान के खेत में अचानक कुम्हड़े के पौधे उग आए। बड़े-बड़े कुम्हड़े लगे। किसान ने उन्हें बाजार में बेचा और अच्छा पैसा कमाया।

इस तरह माँ कूष्मांडा ने अपने भक्त की सहायता की। वे हमेशा अपने भक्तों का कल्याण करती हैं।

माँ कूष्मांडा की कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और प्रेम से माँ हमेशा प्रसन्न होती हैं। उनकी कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है। जैसे उन्होंने अपनी मुस्कान से पूरे ब्रह्मांड को प्रकाशित किया, वैसे ही वे अपने भक्तों के जीवन में भी उजाला लाती हैं।

“माँ कूष्मांडा की जय! सृष्टि की रचयिता माँ की जय!”

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