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कार्तिकेय और गणेश का जन्म – शिव पुराण की पावन कथा
बहुत समय पहले की बात है, जब देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। असुरों का राजा तारकासुर बहुत शक्तिशाली था और उसने ब्रह्मा जी से वरदान पाया था कि केवल भगवान शिव का पुत्र ही उसका वध कर सकता है।
उस समय भगवान शिव गहरी तपस्या में लीन थे। माता पार्वती उनकी सेवा करती रहती थीं। देवताओं को चिंता हुई कि यदि शिव जी का कोई पुत्र नहीं होगा तो तारकासुर का अंत कैसे होगा?
गणेश जी का जन्म
एक दिन माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं। उन्होंने सोचा कि कोई द्वारपाल होना चाहिए जो उनकी रक्षा करे। उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक सुंदर बालक का निर्माण किया और उसमें प्राण फूंक दिए।
“पुत्र, तुम यहाँ पहरा दो। कोई भी अंदर न आने पाए,” माता पार्वती ने कहा।
“जी माता, मैं किसी को भी अंदर नहीं आने दूंगा,” बालक ने प्रतिज्ञा की।
जब भगवान शिव तपस्या से लौटे और अंदर जाने लगे, तो बालक ने उन्हें रोक दिया। “रुकिए! माता जी ने कहा है कि कोई भी अंदर नहीं जा सकता।”
शिव जी को क्रोध आया और उन्होंने अपने त्रिशूल से बालक का सिर काट दिया। जब पार्वती जी ने यह देखा तो वे बहुत दुखी हुईं और क्रोधित होकर संसार को नष्ट करने को तैयार हो गईं।
शिव जी ने तुरंत अपने गणों को भेजा कि वे उत्तर दिशा से पहले मिलने वाले जीव का सिर ले आएं। गण हाथी का सिर लेकर आए। शिव जी ने उस सिर को बालक के धड़ से जोड़ दिया और उसे जीवित कर दिया।
“तुम मेरे प्रथम पूज्य पुत्र गणेश होगे। सभी कार्यों में तुम्हारी पूजा पहले होगी,” शिव जी ने आशीर्वाद दिया।
कार्तिकेय का जन्म
इधर देवताओं की समस्या अभी भी बनी हुई थी। तारकासुर का वध करने के लिए शिव जी के दूसरे पुत्र की आवश्यकता थी। देवताओं ने कामदेव को भेजा कि वे शिव जी की तपस्या भंग करें।
कामदेव ने अपने पुष्प बाण चलाए। शिव जी की तपस्या भंग हुई और उनके तेज से छह चिंगारियां निकलीं। ये चिंगारियां गंगा जी में गिरीं और फिर सरकंडों के जंगल में पहुंचीं।
छह कृत्तिकाओं (तारों) ने इन चिंगारियों का पालन-पोषण किया। इसीलिए इस बालक का नाम कार्तिकेय पड़ा। उनके छह मुख थे इसलिए वे षडानन भी कहलाए।
जब माता पार्वती ने कार्तिकेय को देखा तो उन्होंने उन्हें गले लगाया। माता के स्पर्श से छह मुख एक हो गए और वे एक सुंदर बालक बन गए।
तारकासुर का वध
कार्तिकेय बड़े होकर महान योद्धा बने। देवताओं ने उन्हें अपना सेनापति बनाया। उन्होंने तारकासुर से युद्ध किया और अपने शक्तिशाली शस्त्रों से उसका वध कर दिया।
“धर्म की जीत हुई!” सभी देवता खुशी से चिल्लाए।
दोनों भाइयों का मिलन
कैलाश पर्वत पर कार्तिकेय और गणेश का जन्म मनाया गया। दोनों भाई एक-दूसरे से मिले और बहुत खुश हुए।
“भैया, आप बहुत वीर हैं,” गणेश जी ने कहा।
“और आप बहुत बुद्धिमान हैं, गणेश भैया,” कार्तिकेय ने उत्तर दिया।
शिव जी और पार्वती जी ने दोनों पुत्रों को आशीर्वाद दिया। गणेश जी को विघ्न हर्ता और बुद्धि के देवता का वरदान मिला। कार्तिकेय को युद्ध के देवता और देवसेना के नायक का आशीर्वाद मिला।
शिक्षा
इस पावन कथा से हमें सिखाया जाता है कि माता-पिता के प्रेम से जन्मे संतान धर्म की रक्षा करते हैं। गणेश जी हमें सिखाते हैं कि बुद्धि और विनम्रता से सभी विघ्न दूर हो जाते हैं। कार्तिकेय जी हमें सिखाते हैं कि साहस और धर्म के लिए लड़ना आवश्यक है।
आज भी जब हम कोई नया काम शुरू करते हैं तो पहले गणेश जी की पूजा करते हैं। और जब हमें साहस की जरूरत होती है तो कार्तिकेय जी को याद करते हैं।
इस प्रकार कार्तिकेय और गणेश का जन्म हुआ और वे सदा के लिए धर्म के रक्षक बन गए।












