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कामदेव दहन की कथा – भगवान शिव की महिमा
बहुत समय पहले की बात है, जब देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। तारकासुर नामक एक शक्तिशाली असुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था। उसने ब्रह्मा जी से वरदान पाया था कि केवल भगवान शिव का पुत्र ही उसका वध कर सकता है।
उस समय भगवान शिव माता सती के वियोग में गहरी तपस्या में लीन थे। वे कैलाश पर्वत पर ध्यान में मग्न थे और संसार से पूर्णतः विरक्त हो गए थे। देवताओं की समस्या यह थी कि शिव जी की शादी कैसे हो और उनका पुत्र कैसे जन्म ले।
इस समस्या का समाधान खोजने के लिए सभी देवता ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने कहा, “हिमालय राज की पुत्री पार्वती शिव जी की पत्नी बनने के लिए जन्म ले चुकी है। परंतु शिव जी को तपस्या से जगाना होगा।”
तब इंद्र देव ने कामदेव को बुलाया। कामदेव प्रेम के देवता थे और उनके पास पुष्प बाण थे जो किसी के भी मन में प्रेम जगा सकते थे। इंद्र ने कहा, “हे कामदेव! तुम्हें शिव जी के मन में पार्वती के लिए प्रेम जगाना होगा।”
कामदेव अपनी पत्नी रति और मित्र वसंत के साथ कैलाश पर्वत पहुंचे। वसंत ने अपनी शक्ति से वहां सुंदर फूल खिलाए, मधुर हवा चलाई और पूरा वातावरण प्रेममय बना दिया।
उसी समय माता पार्वती भी वहां आईं। वे भगवान शिव की सेवा करने लगीं। उन्होंने फूल चढ़ाए, जल अर्पित किया और भक्ति से शिव जी की आराधना की।
कामदेव ने सोचा कि यही उचित समय है। उन्होंने अपना पुष्प बाण निकाला और भगवान शिव पर चलाने की तैयारी की। जैसे ही उन्होंने बाण छोड़ा, भगवान शिव की तपस्या भंग हो गई।
शिव जी की आंखें खुलीं और वे पार्वती को देखकर मुग्ध हो गए। परंतु तुरंत ही उन्हें एहसास हुआ कि उनकी तपस्या में विघ्न डाला गया है। उनका तीसरा नेत्र खुल गया और उनमें भयंकर क्रोध जाग उठा।
शिव जी ने चारों ओर देखा और कामदेव को देख लिया। उनके तीसरे नेत्र से अग्नि निकली और कामदेव उसी क्षण भस्म हो गए। यही है कामदेव दहन की कथा का मुख्य प्रसंग।
कामदेव के भस्म होते ही रति देवी रोने लगीं। उन्होंने शिव जी से प्रार्थना की, “हे महादेव! मेरे पति का कोई दोष नहीं था। वे तो देवताओं की आज्ञा का पालन कर रहे थे। कृपया उन्हें जीवित कर दीजिए।”
माता पार्वती भी रति की दुखी अवस्था देखकर द्रवित हो गईं। उन्होंने भी शिव जी से प्रार्थना की। शिव जी का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने कहा, “रति! तुम्हारा पति अदृश्य रूप में जीवित रहेगा। जब मैं पार्वती से विवाह करूंगा, तब कामदेव को पुनः शरीर मिल जाएगा।”
इस घटना के बाद कामदेव को ‘अनंग’ कहा जाने लगा, जिसका अर्थ है बिना शरीर वाला। वे अदृश्य रूप में संसार में प्रेम का कार्य करते रहे।
कुछ समय बाद माता पार्वती ने कठोर तपस्या की और भगवान शिव को प्रसन्न किया। शिव जी ने उनसे विवाह किया और बाद में उनके पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया।
जब शिव-पार्वती का विवाह हुआ, तब शिव जी ने अपने वचन के अनुसार कामदेव को पुनः शरीर प्रदान किया। रति देवी की खुशी का ठिकाना न रहा।
कामदेव दहन की कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भगवान शिव अत्यंत शक्तिशाली हैं और उनका क्रोध विनाशकारी है। परंतु वे दयालु भी हैं और भक्तों की प्रार्थना सुनते हैं। यह कथा यह भी बताती है कि प्रेम एक शक्तिशाली भावना है जो अदृश्य रूप में भी कार्य करती रहती है।
इस प्रकार कामदेव दहन की कथा संपूर्ण हुई, जो हमें भगवान शिव की महिमा और उनकी न्यायप्रियता का परिचय देती है।
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