Summarize this Article with:

कालरात्रि माता की अद्भुत शक्ति की कथा

बहुत समय पहले की बात है, जब धरती पर अंधकार और बुराई का राज था। उस समय शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो भयानक राक्षस थे, जो अपनी शक्ति के मद में चूर होकर देवताओं को परेशान करते रहते थे।

इन राक्षसों ने स्वर्गलोक पर आक्रमण कर दिया था और सभी देवताओं को वहाँ से भगा दिया था। इंद्र, वरुण, अग्नि और अन्य सभी देवता बहुत परेशान थे। वे नहीं जानते थे कि इन शक्तिशाली राक्षसों से कैसे निपटा जाए।

तब सभी देवता मिलकर माता पार्वती के पास गए और उनसे सहायता की प्रार्थना की। माता पार्वती ने देवताओं की पुकार सुनी और उन्होंने अपने तेज से माता दुर्गा को प्रकट किया।

माता दुर्गा ने कहा, “हे देवगण! चिंता मत करो। मैं इन दुष्ट राक्षसों का संहार करूंगी।”

युद्ध शुरू हुआ। माता दुर्गा ने अपने नौ रूपों में से सातवाँ रूप कालरात्रि का धारण किया। कालरात्रि का रूप अत्यंत भयानक और शक्तिशाली था। उनका वर्ण काला था, बाल बिखरे हुए थे, और तीन नेत्र थे जो अग्नि की तरह चमक रहे थे।

कालरात्रि माता के हाथों में तलवार और त्रिशूल था। वे एक गधे पर सवार थीं और उनके गले में बिजली की माला चमक रही थी। उनका रूप देखकर राक्षस भी डर गए।

जब शुम्भ और निशुम्भ ने कालरात्रि का भयानक रूप देखा, तो वे समझ गए कि यह कोई साधारण शक्ति नहीं है। फिर भी अपने अहंकार में वे युद्ध के लिए तैयार हो गए।

युद्ध भूमि में कालरात्रि माता ने अपनी दिव्य शक्ति का प्रदर्शन किया। उन्होंने अपने त्रिशूल से राक्षसों की सेना पर आक्रमण किया। जहाँ भी उनका त्रिशूल गिरता, वहाँ राक्षस भस्म हो जाते।

कालरात्रि की गर्जना से पूरा आकाश गूंज उठा। उनकी आँखों से निकलने वाली अग्नि से राक्षसों के हथियार पिघल गए। “मैं काल की रात्रि हूँ, अंधकार की स्वामिनी हूँ!” – कालरात्रि माता ने गर्जना की।

शुम्भ राक्षस ने कहा, “हे देवी! तुम कौन हो? तुम्हारी यह शक्ति कहाँ से आई है?”

कालरात्रि माता ने उत्तर दिया, “मैं समय की स्वामिनी हूँ। मैं अंधकार को मिटाने वाली हूँ। तुम्हारे पापों का अंत करने के लिए ही मैं यहाँ आई हूँ।”

युद्ध और भी भयानक हो गया। कालरात्रि माता ने अपनी तलवार से निशुम्भ का सिर काट दिया। फिर उन्होंने शुम्भ पर आक्रमण किया। शुम्भ ने अपनी सारी शक्ति लगाकर माता पर वार किया, लेकिन कालरात्रि की शक्ति के सामने वह कुछ भी नहीं था।

अंत में कालरात्रि माता ने अपने त्रिशूल से शुम्भ का भी संहार कर दिया। इस प्रकार दोनों राक्षसों का अंत हो गया और धरती पर फिर से शांति स्थापित हुई।

युद्ध समाप्त होने के बाद, सभी देवता कालरात्रि माता के सामने नतमस्तक हो गए। इंद्र देव ने कहा, “हे माता! आपने हमारी रक्षा की है। आप धन्य हैं।”

कालरात्रि माता ने मुस्कराते हुए कहा, “मैं सदा अपने भक्तों की रक्षा करती हूँ। जो भी सच्चे मन से मेरी पूजा करता है, मैं उसके सभी कष्टों को दूर करती हूँ।”

तब से कालरात्रि माता की पूजा नवरात्रि के सातवें दिन की जाती है। माना जाता है कि कालरात्रि माता अपने भक्तों के जीवन से सभी नकारात्मक शक्तियों को दूर करती हैं।

कालरात्रि माता का यह रूप भले ही भयानक लगता हो, लेकिन वे अपने भक्तों के लिए अत्यंत कल्याणकारी हैं। वे अंधकार को मिटाकर प्रकाश लाती हैं और बुराई का नाश करके अच्छाई की स्थापना करती हैं।

इस प्रकार कालरात्रि की कथा हमें सिखाती है कि माता दुर्गा का हर रूप हमारी रक्षा के लिए है। चाहे वह कितना भी भयानक क्यों न लगे, माता का प्रेम हमेशा अपने बच्चों के लिए होता है।

कालरात्रि माता की जय! वे सदा हमारी रक्षा करें और हमारे जीवन से सभी कष्टों को दूर करें। यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची शक्ति हमेशा अच्छाई के साथ होती है।

Summarize this Article with:

About Me

Welcome to StoriesPub.com We started in 2019 with a simple idea to provide our readers with useful and interesting information. Our team is dedicated to curating a wide range of captivating content in different categories, including inspirational stories, funny tales, Parenting, Kids’ products, Educational AI content, Tech content, coloring books, how to draw, and more.