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जितनी लंबी चादर उतने पैर पसारो – बीरबल की बुद्धि
मुगल सम्राट अकबर के दरबार में एक दिन एक धनी सेठ आया। उसके पास बहुत सारा धन था और वह अपनी दौलत का बहुत घमंड करता था। सेठ ने अकबर से कहा, “जहांपनाह, मैं आपके लिए एक भव्य महल बनवाना चाहता हूं जो दुनिया का सबसे सुंदर महल हो।”
अकबर खुश हो गए और बोले, “यह तो बहुत अच्छी बात है सेठजी। आप कितना खर्च करने को तैयार हैं?”
सेठ ने गर्व से कहा, “महाराज, पैसे की कोई कमी नहीं है। जो भी चाहिए, खर्च करूंगा।”
बीरबल चुपचाप सब सुन रहे थे। उन्होंने देखा कि सेठ अपनी संपत्ति का बहुत अहंकार कर रहा है। बीरबल जानते थे कि जितनी लंबी चादर उतने पैर पसारो – यानी अपनी क्षमता के अनुसार ही काम करना चाहिए।
कुछ दिन बाद महल का काम शुरू हुआ। सेठ ने सबसे महंगे पत्थर, सोना, चांदी और हीरे-जवाहरात का इस्तेमाल करने का आदेश दिया। मजदूर दिन-रात काम करने लगे।
एक महीने बाद सेठ के पास पैसे कम पड़ने लगे। दो महीने बाद उसकी आधी संपत्ति खत्म हो गई। तीन महीने बाद सेठ परेशान होकर अकबर के पास आया।
“महाराज, मेरे पास अब पैसे नहीं बचे। महल अधूरा रह गया है। मैं क्या करूं?” सेठ ने घबराकर कहा।
अकबर ने बीरबल की तरफ देखा। बीरबल मुस्कराए और बोले, “महाराज, मैं सेठजी की समस्या का समाधान बता सकता हूं।”
सेठ ने उम्मीद से पूछा, “क्या समाधान है बीरबल साहब?”
बीरबल ने कहा, “सेठजी, आपको एक कहानी सुनाता हूं। एक बार एक गरीब आदमी के पास एक छोटी सी चादर थी। सर्दी की रात में वह सोने गया तो चादर छोटी होने के कारण उसके पैर बाहर निकल आए। उसने सोचा कि चादर को खींचकर पैरों तक ले आऊं। जब उसने ऐसा किया तो उसका सिर बाहर निकल आया।”
“फिर उसने क्या किया?” सेठ ने पूछा।
बीरबल ने आगे कहा, “उस बुद्धिमान आदमी ने समझ लिया कि चादर छोटी है तो उसने अपने पैर मोड़ लिए और आराम से सो गया। यही है जितनी लंबी चादर उतने पैर पसारो का मतलब।”
सेठ अभी भी समझ नहीं पाया। बीरबल ने स्पष्ट करते हुए कहा, “सेठजी, आपने अपनी क्षमता से ज्यादा खर्च करने की कोशिश की। आपको अपनी संपत्ति के अनुसार महल की योजना बनानी चाहिए थी।”
“अब मैं क्या करूं?” सेठ ने पूछा।
बीरबल ने सुझाव दिया, “अब आप महल का डिजाइन सरल बनाइए। महंगे पत्थरों की जगह अच्छे लेकिन सस्ते पत्थर इस्तेमाल करिए। सोने-चांदी की जगह सुंदर नक्काशी करवाइए। इससे महल भी सुंदर बनेगा और आपका बजट भी बच जाएगा।”
सेठ को बीरबल की बात समझ आ गई। उसने कहा, “आपकी बात बिल्कुल सही है। मैंने अपनी क्षमता से ज्यादा सोचा था।”
सेठ ने बीरबल की सलाह मानी। उसने महल का डिजाइन बदलवाया और अपनी क्षमता के अनुसार काम करवाया। छह महीने बाद एक सुंदर महल तैयार हो गया।
अकबर ने महल देखकर कहा, “वाह सेठजी, यह महल तो बहुत सुंदर बना है।”
सेठ ने विनम्रता से कहा, “यह सब बीरबल साहब की बुद्धि का कमाल है। उन्होंने मुझे सिखाया कि जितनी लंबी चादर उतने पैर पसारो।”
बीरबल ने समझाया, “महाराज, यह जीवन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। हमें हमेशा अपनी क्षमता और संसाधनों के अनुसार ही योजना बनानी चाहिए। अगर हम अपनी सीमा से ज्यादा करने की कोशिश करते हैं तो परेशानी में पड़ जाते हैं।”
अकबर ने प्रशंसा करते हुए कहा, “बीरबल, तुमने एक बार फिर अपनी बुद्धि का परिचय दिया है। यह सीख न केवल सेठजी के लिए बल्कि हम सभी के लिए उपयोगी है।”
सीख: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें हमेशा अपनी क्षमता और संसाधनों के अनुसार ही काम करना चाहिए। जितनी लंबी चादर उतने पैर पसारो का मतलब है कि अपनी सीमा को पहचानकर उसी के अनुसार योजना बनानी चाहिए। इससे हम परेशानियों से बच सकते हैं और सफल हो सकते हैं।
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