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हनुमान जी की गुरु सूर्यदेव से शिक्षा की कहानी

बहुत समय पहले की बात है, जब हनुमान जी बालक थे। वे अत्यंत शक्तिशाली और तेजस्वी थे, परंतु उन्हें अभी भी बहुत कुछ सीखना था। माता अंजना और पिता केसरी ने सोचा कि अब समय आ गया है कि हनुमान को उचित शिक्षा दी जाए।

एक दिन माता अंजना ने हनुमान से कहा, “पुत्र, तुम्हारी शक्ति अपार है, परंतु शिक्षा के बिना यह शक्ति अधूरी है। तुम्हें किसी महान गुरु से शिक्षा लेनी चाहिए।”

हनुमान जी ने विनम्रता से पूछा, “माता, कौन होगा मेरा गुरु? कौन मुझे सच्ची शिक्षा दे सकेगा?”

माता अंजना मुस्कराईं और बोलीं, “पुत्र, सूर्यदेव से बढ़कर कोई गुरु नहीं हो सकता। वे ज्ञान के भंडार हैं और सभी विद्याओं के स्वामी हैं।”

अगले दिन प्रातःकाल, हनुमान जी ने आकाश में उदय होते सूर्यदेव को देखा। उनके तेजस्वी रूप को देखकर हनुमान जी का मन श्रद्धा से भर गया। वे तुरंत आकाश में उड़े और सूर्यदेव के सामने जाकर विनम्रता से बोले।

“हे सूर्यदेव! मैं आपसे शिक्षा प्राप्त करना चाहता हूं। कृपया मुझे अपना शिष्य बनाइए।”

सूर्यदेव ने हनुमान की विनम्रता देखी और बोले, “वत्स, मैं निरंतर गतिशील रहता हूं। मैं कभी एक स्थान पर नहीं रुकता। तुम कैसे मुझसे शिक्षा ले सकोगे?”

हनुमान जी ने दृढ़ता से उत्तर दिया, “गुरुदेव, मैं आपके साथ-साथ चलूंगा। आपकी गति के साथ तालमेल बिठाकर शिक्षा ग्रहण करूंगा।”

सूर्यदेव हनुमान के दृढ़ संकल्प से प्रभावित हुए और बोले, “तथास्तु! यदि तुम मेरे साथ चल सकते हो, तो मैं तुम्हें सभी विद्याएं सिखाऊंगा।”

इस प्रकार हनुमान जी की गुरु सूर्यदेव से शिक्षा का आरंभ हुआ। प्रतिदिन हनुमान जी सूर्यदेव के सामने उड़ते हुए चलते और उनसे विभिन्न विद्याओं की शिक्षा लेते।

सूर्यदेव ने हनुमान को व्याकरण, छंदशास्त्र, ज्योतिष, आयुर्वेद, और अनेक अन्य विद्याएं सिखाईं। हनुमान जी अत्यंत मेधावी थे और सभी विद्याओं को शीघ्रता से सीख लेते थे।

एक दिन सूर्यदेव ने हनुमान से कहा, “वत्स, तुमने सभी विद्याएं सीख ली हैं। अब तुम्हारी शिक्षा पूर्ण हुई।”

हनुमान जी ने विनम्रता से कहा, “गुरुदेव, आपने मुझे अमूल्य ज्ञान दिया है। मैं आपका कैसे गुरुदक्षिणा दूं?”

सूर्यदेव मुस्कराए और बोले, “वत्स, तुम्हारी भक्ति और लगन ही मेरी गुरुदक्षिणा है। परंतु यदि तुम चाहते हो, तो मेरे पुत्र सुग्रीव की सहायता करना।”

हनुमान जी ने सिर झुकाकर कहा, “जी गुरुदेव, आपकी आज्ञा मेरे लिए सर्वोपरि है।”

इस प्रकार हनुमान जी ने गुरु सूर्यदेव से शिक्षा प्राप्त करके अपने जीवन को सफल बनाया। उन्होंने सीखा कि सच्ची शिक्षा केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि गुरु की कृपा और शिष्य की लगन से मिलती है।

बाद में हनुमान जी ने अपने गुरु के पुत्र सुग्रीव की सहायता की और श्री राम के परम भक्त बने। उनकी शिक्षा ने उन्हें जीवन भर मार्गदर्शन दिया।

शिक्षा: इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि सच्ची शिक्षा प्राप्त करने के लिए गुरु के प्रति श्रद्धा, विनम्रता और दृढ़ संकल्प आवश्यक है। हनुमान जी की तरह हमें भी अपने गुरुओं का सम्मान करना चाहिए और उनकी शिक्षाओं को जीवन में उतारना चाहिए।

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