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गुरु नानक और कृष्णा के साथ वार्तालाप की पावन कथा
बहुत समय पहले की बात है, जब गुरु नानक देव जी अपनी धर्म यात्रा पर निकले थे। वे गांव-गांव जाकर लोगों को सच्चाई और प्रेम का संदेश देते थे। एक दिन वे वृंदावन की पावन भूमि पर पहुंचे, जहां भगवान कृष्ण ने अपना बचपन बिताया था।
वृंदावन की सुंदर गलियों में घूमते हुए गुरु नानक जी एक प्राचीन मंदिर के पास पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि एक छोटा बालक गायों के साथ खेल रहा था। उस बालक के चेहरे पर अद्भुत तेज था और उसकी मुस्कान में दिव्यता झलक रही थी।
“हे बालक, तुम कौन हो?” गुरु नानक जी ने प्रेम से पूछा।
बालक ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, “मैं कृष्ण हूं, और आप गुरु नानक हैं। मैं जानता हूं कि आप यहां क्यों आए हैं।”
गुरु नानक जी समझ गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं है। उन्होंने विनम्रता से कहा, “हे प्रभु, मैं आपसे कृष्णा के साथ वार्तालाप करना चाहता हूं। मुझे बताइए कि सच्चा धर्म क्या है?”
कृष्ण जी ने अपनी मधुर आवाज में कहा, “नानक जी, सच्चा धर्म वह है जो सभी प्राणियों के साथ समानता का व्यवहार करता है। जैसे मैं इन गायों से प्रेम करता हूं, वैसे ही हमें सभी जीवों से प्रेम करना चाहिए।”
इस कृष्णा के साथ वार्तालाप में गुरु नानक जी ने पूछा, “प्रभु, लोग अलग-अलग जातियों में बंटे हुए हैं। वे एक-दूसरे से घृणा करते हैं। इसका समाधान क्या है?”
कृष्ण जी ने एक फूल उठाया और कहा, “देखिए नानक जी, यह फूल किसी जाति का नहीं है। यह सभी को अपनी सुगंध देता है। इसी तरह मनुष्य को भी होना चाहिए। ईश्वर की नजर में सभी बराबर हैं।”
गुरु नानक जी ने आगे पूछा, “हे कृष्ण, लोग धन-दौलत के पीछे भागते रहते हैं और अपना मन शांत नहीं रख पाते। इसका उपाय क्या है?”
कृष्ण जी ने यमुना नदी की ओर इशारा करते हुए कहा, “जैसे यह नदी निरंतर बहती रहती है, लेकिन कभी रुकती नहीं, वैसे ही मनुष्य को अपने कर्म करते रहना चाहिए। फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। जो मिले उसमें संतुष्ट रहना चाहिए।”
इस पावन कृष्णा के साथ वार्तालाप के दौरान गुरु नानक जी ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा, “प्रभु, सच्ची भक्ति क्या है? कुछ लोग दिखावे की पूजा करते हैं।”
कृष्ण जी ने अपनी बांसुरी उठाई और एक मधुर धुन बजाई। उस संगीत को सुनकर सभी गायें, पक्षी और यहां तक कि पेड़-पौधे भी झूमने लगे। फिर उन्होंने कहा, “नानक जी, सच्ची भक्ति वह है जो दिल से निकले। जैसे यह संगीत सभी को प्रभावित करता है, वैसे ही सच्चा प्रेम सभी तक पहुंचता है।”
गुरु नानक जी ने विनम्रता से पूछा, “हे प्रभु, मैं लोगों को क्या संदेश दूं?”
कृष्ण जी ने प्रेम से कहा, “उन्हें बताइए कि ईश्वर एक है। वह सभी धर्मों में, सभी नामों में विद्यमान है। ‘एक ओंकार सतनाम’ का जाप करें और सभी से प्रेम करें।”
इस अद्भुत कृष्णा के साथ वार्तालाप के अंत में कृष्ण जी ने गुरु नानक जी को आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा, “नानक जी, आप जाइए और संसार को प्रेम, सत्य और एकता का संदेश दीजिए। आपका यह कार्य युगों-युगों तक याद रखा जाएगा।”
गुरु नानक जी ने कृष्ण जी को प्रणाम किया और कहा, “धन्यवाद प्रभु, आपने मुझे जीवन की सच्चाई समझाई है।”
इसके बाद कृष्ण जी अदृश्य हो गए, लेकिन उनके दिए गए संदेश गुरु नानक जी के दिल में हमेशा के लिए बस गए। वे वृंदावन से चले गए और जीवन भर लोगों को प्रेम, सत्य और एकता का संदेश देते रहे।
शिक्षा: इस कथा से हमें सीख मिलती है कि सच्चा धर्म प्रेम और एकता में है। हमें सभी जीवों के साथ समानता का व्यवहार करना चाहिए और ईश्वर के अलग-अलग रूपों का सम्मान करना चाहिए। जैसे गुरु नानक जी ने कृष्ण जी से सीखा, वैसे ही हमें भी जीवन में सत्य और प्रेम को अपनाना चाहिए।












