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चंद्रघंटा माता की अद्भुत कथा – शक्ति और करुणा
बहुत समय पहले की बात है, जब देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। असुरों का राजा महिषासुर अपनी शक्ति के मद में चूर होकर तीनों लोकों में आतंक मचा रहा था। देवता परेशान थे और उन्होंने माता दुर्गा से सहायता की प्रार्थना की।
माता दुर्गा ने अपने तीसरे रूप चंद्रघंटा का अवतार लिया। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र घंटे के आकार में सुशोभित था, जिससे उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा। उनका यह रूप अत्यंत तेजस्वी और शक्तिशाली था।
चंद्रघंटा माता का वर्ण स्वर्ण के समान चमकदार था। उनके दस हाथ थे, जिनमें विभिन्न अस्त्र-शस्त्र सुशोभित थे। वे सिंह पर सवार होकर युद्ध के लिए निकलीं। उनके मस्तक पर चंद्रमा की भांति चमकता हुआ घंटा देखकर सभी देवता प्रसन्न हो गए।
“हे माता चंद्रघंटा! आपकी कृपा से ही हमारा कल्याण होगा,” देवराज इंद्र ने विनम्रता से कहा।
चंद्रघंटा माता ने मुस्कराते हुए कहा, “चिंता न करो, मैं सभी असुरों का नाश करूंगी और धर्म की स्थापना करूंगी।”
युद्ध का दिन आया। चंद्रघंटा माता अपने सिंह पर सवार होकर युद्धभूमि में पहुंचीं। उनके मस्तक पर स्थित घंटे से निकलने वाली मधुर ध्वनि से पूरा आकाश गूंज उठा। यह ध्वनि इतनी शक्तिशाली थी कि असुरों के दिल दहल गए।
महिषासुर ने अपनी विशाल सेना के साथ चंद्रघंटा माता पर आक्रमण किया। परंतु माता की शक्ति के सामने सभी असुर कांपने लगे। चंद्रघंटा माता ने अपने त्रिशूल से एक के बाद एक असुरों का संहार किया।
युद्ध के दौरान एक रोचक घटना घटी। एक छोटा बालक, जो युद्ध देखने आया था, डर के मारे रोने लगा। चंद्रघंटा माता ने उसे देखा और तुरंत अपना भयानक रूप छुपाकर मातृत्व भाव से उसके पास गईं।
“डरो मत बेटा, मैं तुम्हारी रक्षा करूंगी,” माता ने प्रेम से कहा। बालक का डर तुरंत दूर हो गया और वह माता के चरणों में गिर गया।
यह देखकर सभी देवता आश्चर्यचकित रह गए। चंद्रघंटा माता में युद्ध की भयंकरता और मातृत्व की कोमलता दोनों एक साथ विद्यमान थीं। वे युद्ध में वीरता दिखातीं और साथ ही भक्तों पर करुणा भी बरसातीं।
अंततः महिषासुर और चंद्रघंटा माता के बीच भयंकर युद्ध हुआ। माता ने अपने त्रिशूल से महिषासुर का वध किया। उनके मस्तक पर स्थित घंटे की ध्वनि से पूरा ब्रह्मांड शांति से भर गया।
युद्ध समाप्त होने पर सभी देवताओं ने चंद्रघंटा माता की स्तुति की। “हे माता! आपने हमें असुरों के आतंक से मुक्ति दिलाई है। आप सच में शक्ति और करुणा की देवी हैं,” ब्रह्मा जी ने कहा।
चंद्रघंटा माता ने सभी को आशीर्वाद देते हुए कहा, “जो भी भक्त सच्चे मन से मेरी पूजा करेगा, मैं उसकी सभी बाधाओं को दूर करूंगी। मेरा घंटा सदैव बुराई को भगाता रहेगा और अच्छाई की स्थापना करता रहेगा।”
तब से चंद्रघंटा माता की पूजा नवरात्रि के तीसरे दिन की जाती है। माना जाता है कि उनकी पूजा से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और उन्हें वीरता एवं निर्भयता प्राप्त होती है।
चंद्रघंटा माता का यह संदेश है कि जीवन में शक्ति और करुणा दोनों आवश्यक हैं। बुराई के सामने वीरता दिखानी चाहिए, परंतु दीन-दुखियों पर सदैव दया करनी चाहिए। उनके मस्तक का घंटा हमें सिखाता है कि सत्य की आवाज़ सदैव बुलंद रहनी चाहिए।
आज भी जब कोई भक्त सच्चे मन से “ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः” का जाप करता है, तो माता चंद्रघंटा उसकी सभी समस्याओं का समाधान करती हैं और उसे सुख-शांति प्रदान करती हैं।
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