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बुद्धिमान न्यायाधीश और सच्चाई की जीत

बहुत समय पहले, बगदाद शहर में एक बुद्धिमान न्यायाधीश रहते थे जिनका नाम काजी अब्दुल रहमान था। उनकी न्याय व्यवस्था इतनी निष्पक्ष थी कि दूर-दूर से लोग अपने विवाद लेकर आते थे। वे हमेशा सच्चाई को खोजने में माहिर थे।

एक दिन दो व्यापारी उनके दरबार में आए। पहला व्यापारी हसन था, जो रेशम का व्यापार करता था। दूसरा व्यापारी अली था, जो मसालों का कारोबार करता था। दोनों के बीच एक बड़ा विवाद था।

हसन ने कहा, “हुजूर, मैंने अली को सौ दीनार उधार दिए थे। अब वह वापस करने से मना कर रहा है।”

अली तुरंत बोला, “यह झूठ है! मैंने इससे कोई पैसा नहीं लिया। यह मुझ पर झूठा आरोप लगा रहा है।”

काजी अब्दुल रहमान ने दोनों की बात ध्यान से सुनी। यह वास्तव में एक कठिन फैसला था क्योंकि न तो कोई गवाह था और न ही कोई लिखित प्रमाण।

बुद्धिमान न्यायाधीश ने कुछ देर सोचा और फिर कहा, “मैं कल सुबह अपना फैसला सुनाऊंगा। आप दोनों कल यहाँ आइए।”

उस रात काजी साहब ने अपने सहायक को बुलाया और कहा, “कल सुबह जब ये दोनों व्यापारी आएं, तो तुम हसन से कहना कि वह अपने सौ दीनार गिनकर ले जाए।”

अगली सुबह दोनों व्यापारी दरबार में पहुंचे। सहायक ने हसन से कहा, “काजी साहब ने कहा है कि आप अपने सौ दीनार गिनकर ले जाइए।”

हसन खुशी से बोला, “अरे वाह! काजी साहब ने मेरे पक्ष में फैसला दिया है।” और वह तुरंत पैसे गिनने लगा।

अली परेशान होकर बोला, “लेकिन हुजूर, मैंने तो कोई पैसा नहीं लिया था!”

तभी काजी अब्दुल रहमान दरबार में आए और बोले, “रुको हसन! तुमने अभी तक पैसे गिने भी नहीं हैं, फिर कैसे पता चल गया कि ये तुम्हारे ही सौ दीनार हैं?”

हसन का चेहरा पीला पड़ गया। वह समझ गया कि वह पकड़ा गया है।

बुद्धिमान न्यायाधीश ने आगे कहा, “अगर तुमने वास्तव में अली को पैसे दिए होते, तो तुम पहले यह देखते कि ये वही पैसे हैं या नहीं। लेकिन तुमने बिना देखे ही मान लिया कि ये तुम्हारे पैसे हैं।”

हसन के पास कोई जवाब नहीं था। वह घुटनों के बल गिर गया और बोला, “माफ करें हुजूर, मैंने झूठ बोला था। मैं अली पर झूठा आरोप लगा रहा था।”

काजी साहब ने कहा, “हसन, झूठ बोलना और किसी निर्दोष पर आरोप लगाना बहुत बड़ा गुनाह है। तुम्हें इसकी सजा मिलनी चाहिए।”

लेकिन अली ने कहा, “हुजूर, मैं हसन को माफ करता हूं। शायद वह किसी मजबूरी में था।”

यह देखकर काजी अब्दुल रहमान बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा, “अली, तुम्हारी उदारता देखकर मैं बहुत खुश हूं। लेकिन न्याय व्यवस्था के लिए यह जरूरी है कि हसन को अपनी गलती का एहसास हो।”

उन्होंने हसन को आदेश दिया कि वह एक महीने तक गरीबों की सेवा करे और झूठ न बोलने की कसम खाए।

हसन ने खुशी से यह सजा स्वीकार की और कहा, “हुजूर, आपने मुझे सच्चाई का रास्ता दिखाया है। अब मैं कभी झूठ नहीं बोलूंगा।”

इस घटना के बाद दोनों व्यापारी अच्छे मित्र बन गए। हसन ने अपनी गलती से सीख ली और हमेशा सच बोलने लगा।

काजी अब्दुल रहमान की यह बुद्धिमत्ता पूरे बगदाद में प्रसिद्ध हो गई। लोग कहते थे कि वे न केवल न्याय करते हैं, बल्कि लोगों को सच्चाई का रास्ता भी दिखाते हैं।

सीख: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चाई हमेशा जीतती है। झूठ बोलना और किसी निर्दोष पर आरोप लगाना गलत है। एक बुद्धिमान न्यायाधीश वह होता है जो न केवल सच्चाई को खोजता है, बल्कि लोगों को सही रास्ता भी दिखाता है।

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