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ब्रह्मचारिणी माता की अद्भुत कथा – तपस्या की शक्ति
बहुत समय पहले की बात है, जब धरती पर अधर्म का राज था और असुरों का आतंक फैला हुआ था। उस समय हिमालय पर्वत की गोद में एक छोटी सी कन्या का जन्म हुआ था। यह कन्या कोई साधारण बालिका नहीं थी, बल्कि स्वयं आदिशक्ति माँ पार्वती का अवतार थी।
इस बालिका का नाम था उमा। उमा बचपन से ही बहुत ही शांत स्वभाव की थी और उसके मन में भगवान शिव के प्रति अगाध प्रेम था। जब वह केवल पांच वर्ष की थी, तभी से वह भगवान शिव की आराधना में लीन रहती थी।
एक दिन उमा ने अपने पिता हिमवान से कहा, “पिताजी, मैं भगवान शिव को पति के रूप में पाना चाहती हूँ। इसके लिए मैं कठोर तपस्या करूंगी।”
हिमवान ने अपनी पुत्री की बात सुनकर कहा, “बेटी, तुम अभी बहुत छोटी हो। भगवान शिव महायोगी हैं और वे कठोर तपस्या में लीन रहते हैं। उन्हें पाना इतना आसान नहीं है।”
लेकिन उमा का निश्चय दृढ़ था। उसने कहा, “पिताजी, मैं जानती हूँ कि यह कठिन है, लेकिन मैं ब्रह्मचारिणी बनकर तपस्या करूंगी। मैं हजारों वर्षों तक तप करूंगी, लेकिन भगवान शिव को अवश्य पाऊंगी।”
इस प्रकार उमा ने ब्रह्मचारिणी का व्रत लिया। ब्रह्मचारिणी का अर्थ है – वह जो ब्रह्म की साधना में लीन रहे और पूर्ण संयम का पालन करे। उमा ने सभी सांसारिक सुखों का त्याग कर दिया और कठोर तपस्या में लीन हो गई।
पहले वर्ष में ब्रह्मचारिणी उमा ने केवल फल-फूल खाकर तपस्या की। दूसरे वर्ष उन्होंने केवल पत्ते खाकर अपना जीवन बिताया। तीसरे वर्ष में वे केवल पानी पीकर रहीं। और चौथे वर्ष से उन्होंने पानी भी छोड़ दिया और केवल हवा पीकर जीवित रहने लगीं।
इस कठोर तपस्या को देखकर सभी देवता चिंतित हो गए। उनकी तपस्या की शक्ति से तीनों लोक कांप रहे थे। ब्रह्माजी, विष्णुजी और इंद्र देव सभी परेशान थे।
एक दिन ब्रह्माजी ने कहा, “यह कन्या अपनी तपस्या से सारे ब्रह्मांड को हिला रही है। इसकी तपस्या की शक्ति अपार है। हमें भगवान शिव से मिलकर इस समस्या का समाधान करना चाहिए।”
सभी देवता भगवान शिव के पास गए और उनसे प्रार्थना की। भगवान शिव ने कहा, “मैं जानता हूँ कि यह कन्या कौन है। यह स्वयं आदिशक्ति का अवतार है। लेकिन मैं इसकी तपस्या की परीक्षा लेना चाहता हूँ।”
भगवान शिव ने सप्तर्षियों को ब्रह्मचारिणी उमा के पास भेजा। सप्तर्षियों ने उमा से कहा, “बेटी, तुम व्यर्थ में इतनी कठोर तपस्या कर रही हो। भगवान शिव तो महारुद्र हैं, वे किसी से विवाह नहीं करते। तुम अपनी तपस्या छोड़ दो।”
लेकिन ब्रह्मचारिणी उमा ने दृढ़ता से कहा, “हे महर्षियों, मैं अपनी तपस्या नहीं छोड़ूंगी। मैं जानती हूँ कि भगवान शिव अवश्य मेरी तपस्या से प्रसन्न होंगे। मैं तब तक तप करती रहूंगी जब तक वे मुझे स्वीकार नहीं करते।”
सप्तर्षियों ने उमा की दृढ़ता देखकर उन्हें समझाने की और कोशिश की, लेकिन वे असफल रहे। वे वापस भगवान शिव के पास गए और बोले, “प्रभु, यह कन्या अत्यंत दृढ़ संकल्पित है। इसकी तपस्या की शक्ति अपार है।”
इसके बाद हजारों वर्ष बीत गए। ब्रह्मचारिणी उमा की तपस्या और भी कठोर होती गई। उन्होंने अपने शरीर की सुध-बुध छोड़ दी थी। उनका पूरा ध्यान केवल भगवान शिव में लगा हुआ था।
एक दिन जब उमा गहरी तपस्या में लीन थीं, तभी आकाशवाणी हुई, “हे उमा! तुम्हारी तपस्या सफल हुई। तुम्हारी भक्ति और संकल्प की शक्ति ने भगवान शिव को प्रसन्न कर दिया है।”
उसी समय भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने ब्रह्मचारिणी उमा से कहा, “हे देवी! तुम्हारी तपस्या अद्वितीय है। तुमने अपने संकल्प और भक्ति से मुझे प्रसन्न कर दिया है। मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करता हूँ।”
इस प्रकार ब्रह्मचारिणी माता की कठोर तपस्या सफल हुई। उन्होंने अपने दृढ़ संकल्प और पवित्र भावना से भगवान शिव को प्रसन्न किया। बाद में वे माता पार्वती के रूप में भगवान शिव की अर्धांगिनी बनीं।
ब्रह्मचारिणी माता की यह कथा हमें सिखाती है कि दृढ़ संकल्प, धैर्य और सच्ची भक्ति से कोई भी लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। माता ब्रह्मचारिणी तपस्या और संयम की देवी हैं। वे अपने भक्तों को धैर्य, दृढ़ता और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती हैं।
आज भी जब कोई व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में होता है, तो ब्रह्मचारिणी माता की कृपा से उसे धैर्य और शक्ति मिलती है। नवरात्रि के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है और उनसे तपस्या की शक्ति की प्रार्थना की जाती है। सच्चे संकल्प और धैर्य की कहानियाँ भी हमें प्रेरित करती हैं।











