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बकासुर का वध – श्री कृष्ण की वीरता की कहानी
बहुत समय पहले की बात है, जब भगवान श्री कृष्ण गोकुल में अपने मित्रों के साथ खेला करते थे। उस समय एक भयानक राक्षस था जिसका नाम बकासुर था। यह राक्षस बगुले के रूप में रहता था और निर्दोष लोगों को हानि पहुंचाता था।
एक दिन की बात है, नन्द बाबा और यशोदा मैया ने कृष्ण और बलराम से कहा, “बेटा, आज तुम दोनों गायों को चराने के लिए यमुना के किनारे ले जाओ।” कृष्ण और बलराम खुशी से अपने सखाओं के साथ गायों को लेकर यमुना तट पर पहुंचे।
यमुना का पानी आज कुछ अलग लग रहा था। पानी में एक विशाल बगुला बैठा हुआ था, जो देखने में बहुत डरावना था। यह कोई साधारण बगुला नहीं था, बल्कि यह बकासुर राक्षस था जो बगुले का रूप धारण करके बैठा था।
कृष्ण के सखा सुदामा ने कहा, “कृष्ण, यह बगुला बहुत बड़ा और अजीब लग रहा है।” कृष्ण मुस्कराए और बोले, “चिंता मत करो मित्र, मैं देखता हूं कि यह क्या है।”
अचानक वह विशाल बगुला उड़ा और सीधे कृष्ण की ओर आया। उसकी चोंच इतनी बड़ी थी कि वह एक पूरे व्यक्ति को निगल सकती थी। बकासुर ने अपना मुंह खोला और कृष्ण को पूरा निगल लिया।
यह देखकर सभी गोप बालक डर गए। बलराम चिल्लाए, “हे भगवान! कृष्ण को इस राक्षस ने निगल लिया!” सभी बच्चे रोने लगे और नहीं समझ पा रहे थे कि क्या करें।
लेकिन कृष्ण कोई साधारण बालक नहीं थे। वे स्वयं भगवान विष्णु के अवतार थे। बकासुर के पेट के अंदर जाकर कृष्ण ने अपना विशाल रूप धारण किया और राक्षस के गले में अटक गए।
बकासुर को सांस लेने में तकलीफ होने लगी। वह तड़पने लगा और उसे समझ आ गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं है। राक्षस ने कृष्ण को बाहर निकालने की कोशिश की, लेकिन कृष्ण उसके गले में और भी ज्यादा फैल गए।
अंत में बकासुर ने कृष्ण को बाहर निकाल दिया। जैसे ही कृष्ण बाहर आए, उन्होंने तुरंत बकासुर की चोंच को पकड़ लिया। एक हाथ से ऊपरी चोंच और दूसरे हाथ से नीचली चोंच को पकड़कर, कृष्ण ने पूरी शक्ति से उसे फाड़ दिया।
“धड़ाम!” की आवाज के साथ बकासुर का वध हो गया। राक्षस की मृत्यु के साथ ही आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी। देवता गण आकाश से जयकार करने लगे।
सभी गोप बालक खुशी से नाचने लगे। सुदामा ने कहा, “कृष्ण, तुमने हम सबकी रक्षा की है। तुम वास्तव में हमारे रक्षक हो।” कृष्ण मुस्कराए और बोले, “मित्रों, जब भी कोई बुराई आएगी, मैं हमेशा तुम्हारी रक्षा करूंगा।”
जब यह समाचार गोकुल पहुंचा, तो सभी ग्रामवासी खुश हो गए। नन्द बाबा और यशोदा मैया ने कृष्ण को गले लगाया। यशोदा मैया ने कहा, “मेरे लाल, तुमने फिर से सबकी रक्षा की है।”
उस दिन के बाद से यमुना तट पर शांति छा गई। बकासुर के वध की कहानी पूरे ब्रज में फैल गई। लोग समझ गए कि कृष्ण कोई साधारण बालक नहीं हैं, बल्कि वे दिव्य शक्तियों से भरपूर हैं।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि बुराई कितनी भी बड़ी हो, अच्छाई हमेशा जीतती है। भगवान कृष्ण ने दिखाया कि जब हम धर्म के पथ पर चलते हैं, तो भगवान हमारी रक्षा करते हैं। हमें हमेशा सत्य और न्याय का साथ देना चाहिए।
आज भी जब कोई व्यक्ति मुसीबत में होता है और सच्चे मन से भगवान कृष्ण को याद करता है, तो वे अवश्य उसकी सहायता करते हैं। बकासुर का वध इस बात का प्रमाण है कि भगवान अपने भक्तों की हमेशा रक्षा करते हैं। इस तरह की अन्य कहानियों में भी हमें अच्छाई की जीत का संदेश मिलता है।








