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शेर बनाने का अपराध – बेताल पच्चीसी बाईसवीं कहानी

राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लिए हुए श्मशान से वापस लौट रहे थे। रास्ते में बेताल ने फिर से एक कहानी सुनाने की इच्छा प्रकट की।

“राजन्! आज मैं तुम्हें एक ऐसी कहानी सुनाता हूँ जिसमें शेर बनाने का अपराध किसने किया था, यह जानना होगा।” बेताल ने कहा।

प्राचीन काल में कल्याणपुर नामक एक समृद्ध नगर था। वहाँ राजा चंद्रगुप्त का शासन था। उस नगर में विद्यानंद नामक एक महान् विद्वान् रहता था। वह संस्कृत, गणित, ज्योतिष और तंत्र-मंत्र में अत्यंत निपुण था।

विद्यानंद के दो पुत्र थे – सुमित्र और दुर्मित्र। सुमित्र सदाचारी, विनम्र और धर्मपरायण था, जबकि दुर्मित्र अहंकारी, क्रोधी और दुष्ट प्रवृत्ति का था। दोनों भाइयों ने अपने पिता से विद्या सीखी थी।

एक दिन दोनों भाई जंगल में तपस्या करने गए। वहाँ उन्होंने एक मृत शेर देखा। दुर्मित्र ने कहा, “भाई! आओ, अपनी विद्या का प्रयोग करके इस मृत शेर को जीवित करते हैं।”

सुमित्र ने समझाया, “भाई! यह उचित नहीं है। शेर एक हिंसक पशु है। इसे जीवित करना खतरनाक हो सकता है।”

परंतु दुर्मित्र ने उसकी बात नहीं मानी। उसने अपनी तंत्र विद्या का प्रयोग करके मृत शेर को जीवित कर दिया। शेर जीवित होते ही गर्जना करने लगा और आसपास के जानवरों को डराने लगा।

कुछ दिन बाद वही शेर गाँव में आया और एक निर्दोष ग्वाले को मार डाला। ग्वाले की पत्नी रोते-चिल्लाते राजा के पास पहुँची और न्याय की गुहार लगाई।

राजा चंद्रगुप्त ने जाँच कराई। पता चला कि यह वही शेर था जिसे दुर्मित्र ने जीवित किया था। राजा ने दोनों भाइयों को दरबार में बुलाया।

“तुममें से किसने इस शेर को जीवित किया है?” राजा ने पूछा।

दुर्मित्र डर गया और चुप रह गया। सुमित्र ने सच्चाई बताई कि उसके भाई ने शेर को जीवित किया था, लेकिन उसने मना किया था।

राजा ने कहा, “जिसने भी यह कार्य किया है, वह एक निर्दोष की मृत्यु का कारण बना है।”

दुर्मित्र अंततः सामने आया और अपना अपराध स्वीकार किया। राजा ने उसे दंड दिया और कहा कि विद्या का दुरुपयोग करना महापाप है।

सुमित्र को उसकी सच्चाई और धर्मपरायणता के लिए सम्मानित किया गया। उसे राज्य का मुख्य सलाहकार बनाया गया।

कहानी समाप्त करके बेताल ने पूछा, “राजन्! बताओ, शेर बनाने का अपराध किसने किया? क्या दुर्मित्र का, जिसने शेर को जीवित किया? या सुमित्र का, जो रोक सकता था लेकिन नहीं रोका? या विद्यानंद का, जिसने दुष्ट पुत्र को विद्या सिखाई?”

राजा विक्रमादित्य ने उत्तर दिया, “बेताल! मुख्य अपराध दुर्मित्र का है क्योंकि उसने अपनी इच्छा से गलत कार्य किया। सुमित्र ने मना किया था इसलिए वह निर्दोष है। विद्यानंद का भी दोष है कि उसने पुत्र के चरित्र को नहीं सुधारा।”

राजा के उत्तर से प्रसन्न होकर बेताल फिर से पेड़ पर जा लटका।

शिक्षा: विद्या का सदुपयोग करना चाहिए। गलत कार्य करने वाला ही मुख्य अपराधी होता है। माता-पिता को संतान के चरित्र निर्माण पर ध्यान देना चाहिए।

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